अकाल के मंडराते बादल, सुरक्षा परिषद से जल्द कार्रवाई की पुकार 

21 अप्रैल 2020

दुनिया ना सिर्फ़ एक वैश्विक महामारी के ख़तरे का सामना कर रही है बल्कि मानवीय राहत के मोर्चे पर एक विनाशकारी आपदा से भी जूझ रही है. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य राहत एजेंसी (WFP) के प्रमुख डेविड बीज़ली ने मंगलवार को वीडियो लिंक के ज़रिए सुरक्षा परिषद को मौजूदा हालात के बारे में जानकारी देते हुए यह बात कही है और पीड़ितों तक मानवीय राहत पहुँचाने के कार्य में मदद का आहवान किया है.

 विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के कारण दुनिया भर में संक्रमण के 23 लाख 97 हज़ार से ज़्यादा मामलों की पुष्टि हो चुकी है और एक लाख 62 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई है. 

विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डेविड बीज़ली ने कहा है कि महामारी फैलने से दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक का दूसरा सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है.

उन्होंने आगाह किया कि गहराते संकट के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं और चरम मौसम की घटनाओं के बढ़ने की आशंका से दुनिया मानो एक तूफ़ान का सामना कर रही है. 

यूएन एजेंसी के प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि हिंसा और अशांति से प्रभावित देशों में लाखों आम नागरिक भुखमरी के कगार पर हैं और अकाल पड़ने की संभावना बेहद ख़तरनाक और वास्तविक है. 

13 करोड़ से ज़्यादा लोग पहले से ही भुखमरी जैसे हालात का सामना कर रहे हैं और कोरोनावायरस के कारण लगभग 13 करोड़ अतिरिक्त लोग इसका शिकार होने के कगार पर हैं. 

विकट हालात में जीवन गुज़ार रहे 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों को विश्व खाद्य कार्यक्रम से जीवनरक्षक मदद मिल ही है. कुछ साल पहले ज़रूरतमंद लोगों की संख्या क़रीब आठ करोड़ थी. 

“अगर हम जीवनरक्षक सहायता के साथ इन लोगों तक नहीं पहुंच सके जिसकी उन्हें ज़रूरत है, तो हमारा विश्लेषण दर्शाता है कि तीन महीने की अवधि के दौरान हर दिन तीन लाख लोग भूख के कारण मौत का निवाला बन जाएंगे.”

मदद का अनुरोध

यूएन एजेंसी प्रमुख ने बताया कि विश्व खाद्य कार्यक्रम मानवीय राहत अभियानों के लिए बुनियादी ढाँचा मुहैया कराता है और कोविड-19 के ख़िलाफ़ वैश्विक प्रयासों में इसकी भूमिका और भी अहम हो गई है. 

उन्होंने सुरक्षा परिषद से आगे बढ़कर नेतृत्व करने का आहवान करते हुए कहा कि सबसे पहले हमें शांति स्थापना की ज़रूरत है. 

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उन्होंने कहा कि लड़ाई में शामिल सभी पक्षों को नाज़ुक हालात में रह रहे लोगों तक बेरोकटोक ढंग से जीवनदायी सहायता पहुँचने देना संभव बनाना होगा.

इसके अलावा 35 करोड़ डॉलर की धनराशि की आवश्यकता होगी ताकि राहत अभियानों के लिए केंद्रों का नैटवर्क स्थापित किया जा सके और आपूर्ति श्रृंखलाएँ क़ायम रहें. 

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के महानिदेशक क्यू डोन्गयू ने खाद्य संकट पर मंगलवार को जारी रिपोर्ट के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि हिंसा व अशान्ति और बढ़ती खाद्य असुरक्षा में स्पष्ट संबंध है. 

रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2019 में 55 देशो में 13 करोड़ से ज़्यादा लोग अस्थाई रूप से खाद्य असुरक्षा का शिकार हैं और इनमें 60 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग अस्थिरता और हिंसाग्रस्त इलाक़ों में रह रहे हैं. 

उन्होंने यमन का उदाहरण दिया जिसे दुनिया के सबसे ख़राब मानवीय संकट के तौर पर देखा जाता है.

यमन हिंसक संघर्ष से बुरी तरह प्रभावित है और खाद्य असुरक्षा से पीड़ित लोगों की संख्या एक करोड़ 70 लाख का आंकड़ा पार करने की आशंका है. 

उन्होंने चिंता जताई है कि वर्ष 2020 में खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर एक निराशाजनक तस्वीर उभर रही है और इसीलिए जल्द चेतावनी उपलब्ध कराने वाली प्रणाली और तेज़ कार्रवाई का ख़ाका तैयार किया जाना अहम होगा. 

हिंसा, चरम मौसम की घटनाओं, टिड्डियों के झुंड द्वारा फ़सलें नष्ट करने, आर्थिक व्यवधानों और कोविड-19 के कारण बड़ी संख्या में लोगों के खाद्य असुरक्षा का शिकार होने की आशंका है.

लेकिन यूएन एजेंसी प्रमुख ने कहा है कि हालात पर नज़दीकी नज़र रखने और तेज़ कार्रवाई के ज़रिए उसका असर कम किया जा सकता है.

रुकावटें

संयुक्त राष्ट्र में मानवीय राहत मामलों के पूर्व प्रमुख और नार्वेजियन रैफ़्यूजी काउंसिल के महासिचव यैन ऐगेलैन्ड ने सुरक्षा परिषद से अपील की है कि युद्धक्षेत्र में फँसे लोगों तक पहुँचने में ज़मीनी स्तर पर सामने आने वाली बाधाओं पर पार पाने में सहायता की ज़रूरत है. 

“एक मानवीय राहतकर्मी के तौर पर 40 साल में मैंने हिंसक संघर्ष के कारण इतनी बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होते नहीं देखा है.”

“हम लंबे समय तक खिंचने वाले, बर्बर हिंसक संघर्ष और बढ़ती भुखमरी देख रहे हैं. परिवार अपने घर, खेत और रोज़ागर छोड़कर भाग रहे हैं, और वे मेज़बान समुदायों की उदारता पर निर्भर हो रहे हैं जो ख़ुद विकट हालात में हैं.”

उन्होंने मानवीय हालात में सुधार लाने के लिए हर जगह सुरक्षित व बेरोकटोक मानवीय राहत पहुँचाने, मानवीय कूटनीति को मज़बूत बनाने और संरक्षित राहत स्थलों पर हमलों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया है. 

 

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