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कोविड-19: दुष्प्रचार व झूठी सूचनाएँ बन गई हैं - 'Disinfodemic'

वनाउतू नामक प्रशांति द्वीप में यूनीसेफ़ के एक जागरूता अभियान में बच्चे कोविड-19 के बारे में जानकारी हासिल करते हुए - हाथ साफ़ रखकर इस महामारी से कैसे सुरक्षित रहा जा सकता है.
© UNICEF Pacific/Toangwera
वनाउतू नामक प्रशांति द्वीप में यूनीसेफ़ के एक जागरूता अभियान में बच्चे कोविड-19 के बारे में जानकारी हासिल करते हुए - हाथ साफ़ रखकर इस महामारी से कैसे सुरक्षित रहा जा सकता है.

कोविड-19: दुष्प्रचार व झूठी सूचनाएँ बन गई हैं - 'Disinfodemic'

स्वास्थ्य

दुनिया भर में निराधार और झूठ पर आधारित जानकारी की इतनी भरमार हो गई है कि बहुत से टिप्पणीकार अब उस ग़लत जानकारी की तूफ़ानी बौछार का हवाला देने लगे हैं. कोविड-19 महामारी से संबंधित ग़लत सूचनाओं व दुष्प्रचार के इस तूफ़ान को ‘डिस्इन्फ़ोडेमिक’ कहा गया है यानी ये भी किसी महामारी से कम नहीं है. 

ये भी डर बढ़ रहा है कि भ्रामक प्रचार के कारण बहुत सी ज़िन्दगियाँ ख़तरे में पड़ रही हैं, इनके कारण बहुत से लोग अपने लक्षणों का इलाज ग़ैर-साबित तरीक़ों से इस उम्मीद के साथ कर रहे हैं कि इससे वो ठीक हो जाएंगे. 

संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन – UNESCO ने दुष्प्रचार व ग़लत सूचनाओं का मुक़ाबला करने की इस मुहिम में बढ़त ली ली है जिसके तहत वायरस के बारे में तथ्यों की जानकारी को आगे बढ़ाया जाएगा.

दुष्प्रचार से कुछ भी अछूता नहीं

यूनेस्को ने कोरोनावायरस से पहले ही इस तरह की चेतावनियाँ जारी की थीं कि हाल के वर्षों में सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों ने किस तरह राजनैतिक, टैक्नॉलॉजिकल, आर्थिक और सामाजिक बदलाव पर असर डाला है.

इनमें सोच-समझकर और संगठित तरीक़े से चलाए गए वो दुष्प्रचार अभियान भी शामिल ते जिन्होंने वातावरण को दूषित कर दिया.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जागरूता फैलाने के लिए बहुत सारी सामग्री उपलब्ध कराई है.
WHO
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जागरूता फैलाने के लिए बहुत सारी सामग्री उपलब्ध कराई है.

इस तरह के दुष्प्रचार अभियानों के कारण तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता के लिए, और ख़ासतौर से महामारी से लड़ाई के मौजूदा माहौल में लोगों की ज़िन्दगियों के लिए जोखिम पैदा कर दिया है. 

यूनेस्को में संचार व सूचना संबंधी नीतियों और रणनीतियों की ज़िम्मेदारी संभालने वाली एजेंसी के डायरेक्टर गाई बर्जेर ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में कहा कि कोविड-19 के बारे में ग़लत जानकारी व दुष्प्रचार बहुत आम बात बन गई है. 

उनका कहना है, “कोविड-19 संकट के मामले में ऐसा कोई क्षेत्र अछूता बचा नज़र नहीं आता जिसे दुष्प्रचार ने अपनी चपेट में ना लिया हो. कोरोनावायरस के जन्म से लेकर रोकथाम व इलाज के ग़ैर-साबित तरीक़ों तक, और सरकारों, कंपनियों, मशहूर हस्तियों और अन्य लोगों की प्रतिक्रियाएँ भी इसी माहौल से घिरी नज़र आती हैं.”

गाई बर्जेर का कहना था, “बहुत ज़्यादा भय, अनिश्चितताओं और आनजानेपन के माहौल में मनगढ़ंत जानकारियों को जड़ जमाने और पनपने के लिए उर्वरक ज़मीन मिल जाती है. बहुत बड़ा ख़तरा ये है कि झूठ का एक टुकड़ा अगर जड़ जमाने में कामयाब हो जाता है तो वो वास्तविक तथ्यों के बड़े हुजूम की अहमियत को नकार सकता है.”

“जब दुष्प्रचार दोहराया और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, और ऐसा करने वालों में प्रभावशाली व्यक्ति भी शामिल होते हैं, बहुत गभीर ख़तरा ये है कि जो सूचना व जानकारी सच्चाई पर आधारित होती है, उसका बहुत कम असर होता है.”

मिथक व ग़ैरसाबित दवाइयों को बढ़ावा देने का जोखिम

समस्या की विशालता के पैमाने के कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोनावायरस पर सलाह संबंधी अपने ऑनलाइन पन्ने पर मिथक या भ्रान्तियों संबंदी एक अलग अध्याय शामिल किया है. ध्यान रहे कि कोविड-19 का मुक़ाबला करने के लिए ये एजेंसी संयुक्त राष्ट्र के अभियान की अगुवाई कर रही है. 

इन भ्रान्तियों व मिथकों में ऐसे दावे भी शामिल हैं कि अल्कोहॉल पेय पीने, अत्यधिक तापमान का सामना करने या दूसरी तरफ़ अत्यधिक ठंडे मौसम से कोरोनावायरस का ख़ात्मा हो सकता है.

गाई बर्जेर ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि युवाओं और अफ्रीकी मूल के लोगों या जो लोग ग्रीष्म मौसम वाले स्थानों पर रहते हैं या ऐसे देशों में जहाँ गर्मियों का मौसम आने वाला है, उन्हें चिन्ता करने की कोई बात नहीं है, ये धारणा बिल्कुल ग़लत है. (इन धारणाओं में कुछ दुष्प्रचार तो नस्लवादी व ख़ुद से अन्य लोगों के बारे में नफ़रत फैलाने वाला भी है.)

उनका कहना है कि ऐसी धारणाओं के परिणामस्वरूप लापरवाही का माहौल बन सकता है जिससे बहुत सारी ज़िन्दगियाँ असमय ही ख़त्म हो सकती हैं. 

यूनेस्को पदाधिकारी ने दुष्प्रचार या ग़लत जानकारी फैलाने के एक नुक़सानदेह उदाहरण की तरफ़ भी ध्यान दिलाया. इन मामलों में लोगों या मरीज़ों को ऐसी दवाएँ खाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है जो किसी अन्य मर्ज़ के इलाज के लिए बनी हैं और कोविड-19 के ख़िलाफ़ उनके प्रयोग के लिए अभी उनका चिकित्सा परीक्षण नहीं हुआ है. 

अच्छा, बुरा और नादान

गाई बर्जेर का कहना था कि ये बड़े दुख की बात है कि कुछ लोगों ने अपना एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए दुष्प्रचार फैलाने के मक़सद से इस महामारी की स्थिति का दुरुपयोग भी किया है: “ग़लत सूचनाएँ फैलाने व दुष्प्रचार के उद्देश्य अनेक हैं, इनमें राजनैतिक इरादे, ख़ुद को बढ़ावा देना और एक बिज़नैस मॉडल के रूप में ख़ुद की तरफ़ ध्यान खींचना जैसे मामले शामिल हैं.

जो ऐसा करते हैं, वो लोगों की भावनाओं, डर, पूर्वाग्रहों और अज्ञानता का ग़लत फ़ायदा उठाते हैं. साथ ही एक ऐसी वास्तविक स्थिति का मतलब समझाने व निश्चितता लाने का दावा करते हैं जोकि बहुत जटिल, चुनौतीपूर्ण और तेज़ गति से बदलने वाली है.”

साथ ही उनका ये भी कहना है कि जो भी लोग झूठ फैला रहे हैं, उनमें ऐसा नहीं है कि सभी इरादतन ऐसा कर रहे हैं. नेक इरादों वाले लोग भी अनजाने में संदेहास्पद सामग्री फैला रहे हैं. उन्होंने चेतावनी के अंदाज़ में कहा कि कारण कोई भी हों, परिणाम तो समान ही हैं: “इन भिन्न इरादों से निपटने के लिए भिन्न तरीक़ों की ज़रूरत है,

लेकिन हमें इस सच्चाई से नज़र नहीं हटानी चाहिए कि, नीयत को अगर एक तरफ़ रख दिया जाए तो भी, झूठी जानकारी व सूचनाएँ फैलाने का असर आमजन तक झूठी जानकारी पहुँचने और उन्हें अशक्त बनाने के रूप में होता है, जिसके जानलेवा परिणाम हो सकते हैं.”

सच का विस्तार और सच की माँग

ऐसे माहौल में, ऐसा क्या किया जा सकता है जिसके ज़रिए सच्ची, सहायक और संभवतः जीवन बचाने वाली सूचना को ज़्यादा प्रमुख जगह मिले. 

गाई बर्जेर का कहना है कि यूनेस्को का जवाब होगा कि सच पर आधारित सूचनाओं व जानकारी को बेहतर बनाया जाए, ये सुनिश्चित करने के लिए कि माँग की सही आपूर्ति हो:

“हम स्पष्ट रूप में कह रहे हैं कि अफ़वाहों पर क़ाबू पाने के प्रयासों के तहत सरकारें और ज़्यादा पारदर्शी हों, व सूचना पाने के अधिकार संबंधी क़ानूनों व नीतियों के अनुरूप ख़ुद ही आगे आकर ज़्यादा आँकड़े पेश करें. संकट की इस घड़ी में भरोसे के लिए आधिकारिक सूत्रों के ज़रिए सूचनाएँ व जानकारी उपलब्ध होना बहुत अहम है.”

उनका ये भी कहना है, “अलबत्ता ये जानकारी व सूचनाएँ समाचार मीडिया द्वारा दी जा रही सूचना व जानकारी का विकल्प नहीं हैं. इसलिए हम सरकारी अधिकारियों को ये समझाने की कोशिश भी बढ़ा रहे हैं कि दुष्प्रचार के ख़िलाफ़ लड़ाई के एक औज़ार के रूप में स्वतंत्र और प्रोफ़ेशनल पत्रकारिता सुनिश्चित की जाए. ऐसा इसलिए भी क्योंकि समाचार मीडिया खुले रूप में सार्वजनिक पटल पर काम करता है...”

गाई बर्जेर का कहना है कि यूनेस्को ने ख़ासतौर से सरकारों से आग्रह किया है कि “अभिव्यक्ति यानि विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता पर कोई पाबंदियाँ ना लगाई जाएँ जिनसे स्वतंत्र प्रैस की अहम भूमिका पर कोई आँच आए.

साथ ही दुष्प्रचार के ख़िलाफ़ एक ताक़त के रूप में पत्रकारिता को पहचान दी जाए, भले ही चाहे वो ऐसी सत्यापित सूचनाएँ व प्रासंगिक जानकारी मुहैया कराए जिनसे सत्ता में बैठे लोगों को परेशानी हो सकती हो.”

यूनेस्को प्रामाणिक तथ्यों की माँग पूरी करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य के बारे में यथासंभव व भरोसेमंद जानकारी, मीडिया, चैनलों और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी एजेंसियों की भागीदारी में मुहैया करा रहा है.

यूनेस्को लोगों को आलोचनात्मक नज़रिया अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने पर भी काम कर रहा है कि जो भी जानकारी या सूचनाएँ उन तक ऑनलाइन माध्यमों से पहुँचती हैं, उनकी जाँच अवश्य कर लें. इससे वो झूठी जानकारी पर विश्वास करने और उसे आगे फैलाने से बच सकेंगे.