कोविड-19: विश्व अर्थव्यवस्था के एक फ़ीसदी तक सिकुड़ने की आशंका

1 अप्रैल 2020

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के कारण विश्व अर्थव्यवस्था इस साल एक फ़ीसदी तक सिकुड़ सकती है. संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग (UNDESA) का एक नया विश्लेषण दर्शाता है कि अगर लोगों की आवाजाही और आर्थिक गतिविधियों पर पाबंदियों की मियाद बढ़ती है और पर्याप्त वित्तीय उपाय नहीं किए गए तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कोरोनावायरस का असर और भी ज़्यादा व्यापक हो सकता है. 

यूएन विभाग का विश्लेषण बताता है कि लाखों-करोड़ों की संख्या में श्रमिकों के सामने रोज़गार का संकट खड़ा हो गया है क्योंकि लगभग हर देश ने अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बंद कर दिया है. अगर हालात यूं ही जारी रहे तो वर्ष 2020 के अंत तक वैश्विक अर्थव्यवस्था 0.9 फ़ीसदी सिकुड़ जाएगी. 

रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 से अर्थव्यवस्था पर असर की गंभीरता इस बात पर निर्भर करेगी कि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में लोगों की आवाजाही और आर्थिक गतिविधियों पर पाबंदी कितने लंबे समय तक जारी रहती हैं.

हालात की गंभीरता को वित्तीय स्फूर्ति प्रदान करने वाले उपायों की व्यापकता और प्रभाव से कम किया जा सकता है. 

यूएन में आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के अवर महासचिव लियू झेनमिन ने ज़ोर देकर कहा कि, “निडर नीतिगत उपायों को बिना किसी देरी के अपनाने की ज़रूरत है, ना सिर्फ़ महामारी पर क़ाबू पाने और ज़िंदगियां बचाने के लिए बल्कि हमारे समाजों में सबसे निर्बलों की आर्थिक बर्बादी से रक्षा करने और आर्थिक वृद्धि व वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए.”

योरोप और उत्तर अमेरिका में तालाबंदी होने से लोगों की आवाजाही पर भारी असर पड़ा है जिससे सेवा क्षेत्र प्रभावित हुआ है. इनमें ख़ास तौर से फुटकर व्यापार, विलास एवं अतिथि सत्कार, मनबहलाव और परिवहन उद्योग शामिल हैं. इन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्थाओं में ये उद्योग 25 फ़ीसदी से ज़्यादा रोज़गार के अवसर प्रदान करते हैं. 

लेकिन व्यवसायों में राजस्व हानि के कारण बेरोज़गारी के भी तेज़ी से बढ़ने की आशंका है. उच्च-आय वाले कई देशों में भी आबादी के एक बड़े हिस्से के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं है और तीन महीने बाद उन्हें भी संघर्ष करना पड़ सकता है. 

एक अनुमान के मुताबिक कोरोनावायरस से बुरी तरह प्रभावित इटली और स्पेन में आबादी का क्रमश: 27 फ़ीसदी और 40 फ़ीसदी हिस्से के पास पर्याप्त बचत नहीं है ताकि वे रोज़गार ना होने की स्थिति में तीन महीने से ज़्यादा जीवन-यापन कर सकें.  

हालात में बेहतरी के लिए एक वित्तीय पैकेज की आवश्यकता बताई गई है जिसमें स्वास्थ्य ख़र्चों को सर्वोपरि रखते हुए वायरस के फैलाव पर क़ाबू रखने का प्रयास किए जाएं. साथ ही विश्वव्यापी महामारी से प्रभावित परिवारों को आय संबंधी सहायता प्रदान की जानी होगी ताकि गहरी आर्थिक मंदी की आशंका को कम किया जा सके. 

विकसित देशों में ख़राब हालात 

कोविड-19 के आर्थिक प्रभाव दुनिया भर में फैल रहे हैं. विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक गतिविधियों पर पाबंदियों से होने वाले असर व्यापार व निवेश के रास्ते आने वाले दिनों में विकासशील देशों में पहुंच जाएंगे. 

योरोपीय संघ और अमेरिका में उपभोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले ख़र्च में तेज़ गिरावट आई है जिसका असर विकासशील देशों से उपभोक्ता सामानों के आयात पर पड़ेगा. वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में भी गिरावट आने की आशंका है जिसका असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (ग्लोबल सप्लाई चेन्स) पर पड़ने की आशंका है. 

रिपोर्ट बताती है कि बेहद ख़राब परिदृश्य में वैश्विक जीडीपी वर्ष 2020 में 0.9 फ़ीसदी सिकुड़ जाएगी जबकि पहले उसमें 2.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होने का अनुमान जताया गया था. 

अगर आर्थिक गतिविधियों पर लगाई गई पाबंदियां इस साल की तीसरी तिमाही में भी जारी रहती हैं  और आय व उपभोक्ता ख़र्च के मोर्चे पर दी जाने वाली वित्तीय मदद विफल रहती है तो अर्थव्यवस्था और भी ज़्यादा सिकुड़ने की आशंका है. 

वर्ष 2009 में वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान विश्व अर्थव्यवस्था में 1.7 फ़ीसदी की कमी आई थी. पर्यटन, माल निर्यात और पूंजी के देश से बाहर जाने पर कमज़ोर विकासशील देशों पर असर पड़ेगा, विशेषकर वे देश जो पर्यटन और माल निर्यात पर निर्भर हैं. 

उदाहरण के तौर पर पर्यटकों की संख्या में अचानक तेज़ गिरावट आई है जिससे लघुद्वीपीय विकासशील देशों (small island developing States) में लाख़ों की संख्या में श्रमिक प्रभावित हुए हैं जो आजीविका के लिए पर्यटन सैक्टर पर निर्भर हैं. 

टिकाऊ विकास पर असर 

विश्वव्यापी महामारी से सेवा क्षेत्र में कम मज़दूरी पाने वाले उन लाखों-करोड़ों श्रमिकों पर भी पड़ेगा जो अक्सर श्रम सुरक्षा प्रावधानों के अभाव में ऐसे माहौल में काम करते हैं जहां अन्य श्रमिकों से ऐहतियाती दूरी रखना संभव नहीं होता.

आय के मोर्चे पर उन्हें मदद का नितांत अभाव है जिससे उनके ग़रीबी के चक्र में फंसने की आशंका बढ़ गई हैं.

कई विकसित देशों में पहले ही आय असमानता का स्तर बहुत ऊंचा है. स्कूलों के बंद होने का असर शिक्षा क्षेत्र में पहले से मौजूद खाई पर पड़ेगा जिसके और गहरा होने का डर है जिसके नतीजे लंबे समय बाद दिखाई दे सकते हैं. 

रिपोर्ट दर्शाती है कि जैसे-जैसे कोविड-19 से हालात ज़्यादा ख़राब हो रहे हैं वैसे-वैसे गहराई तक घर कर चुकीं वो आर्थिक बेचैनियां बढ़ रही हैं जिन्हें धीमे आर्थिक विकास और ज़्यादा असमानता से हवा मिलती है.

 

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