कोविड-19 से पनप रही है नफ़रत, यूएन विशेषज्ञ की चेतावनी

30 मार्च 2020

अल्पसंख्यक मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ फ़र्नान्ड डे वैरेनेस ने ध्यान दिलाया है कि विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के कारण उपजी अन्य चुनौतियों का भी ख़याल रखा जाना ज़रूरी है. उन्होंने आगाह किया कि हाल के दिनों में चीनी और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है और प्रवासियों को स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रखने की कोशिशें भी हो रही हैं. 

अल्पसंख्यक मामलों पर यूएन के विशेष रैपोर्टेयर फ़र्नान्ड डे वैरेनेस ने सोमवार को जारी अपने बयान में कहा कि, “कोविड-19 सिर्फ़ स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा नहीं है; यह एक ऐसा भी वायरस हो सकता है जो विदेशियों के प्रति नापसंदगी और डर, नफ़रत और बहिष्करण को बढ़ाए.” 

उन्होंने बताया कि राजनैतिक दलों के नेता और समूह इस बीमारी से उपजे भय को भुनाने और कुछ ख़ास समुदायों को बलि का बकरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इससे उनके ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है. 

इन घटनाओं में चीन और अन्य एशियाई समुदायों के लोगों पर शारीरिक हमले हुए हैं, नफ़रत भरे संदेशों में कोरोनावायरस फैलाने के लिए रोमा और हिस्पेनिक समुदायों पर दोष मढ़ा गया है और कुछ नेताओं ने प्रवासियों को मेडिकल सेवाएं मुहैया ना कराए जाने की मांग की है. 

मानवाधिकारों की रक्षा

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ फ़र्नान्ड डे वैरेनेस ने बताया कि देशों को दर्शाने की ज़रूरत है कि सभी व्यक्तियों, विशेषकर वंचितों और संवेदनशील हालात में रहने को मजबूर लोगों, के मानवाधिकारों की रक्षा की जाएगी. 

“इस बीमारी से लड़ते समय इसके स्याह पक्षों से भी निपटना होगा. प्रवासियों, आदिवासी समुदायों, अल्पसंख्यकों सहित निर्बलों और वंचितों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए राज्यसत्ताओं और हम सभी के द्वारा मज़बूत कार्रवाई तात्कालिक रूप से आवश्यक है.”

कोविड-19 के पहले मामले की पुष्टि दिसंबर 2019 में चीन के वूहान शहर में हुई थी लेकिन उसके बाद दुनिया के लगभग हर देश में  भर में अब तक कोरोनावायरस के सवा छह लाख से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं और 30 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है. “

"कोरोनावायरस का फैलना हम सभी के स्वास्थ्य के लिख ख़तरा है और यह भाषा, धर्म और जातीयता में भेद नहीं करता. लेकिन कुछ अन्य की तुलना में ज़्यादा संवेदनशील हालात में हैं.”

उन्होंने हर जगह लोगों से आग्रह किया है कि एशियाई व अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ उभरते भेदभाव और नफ़रत भरे संदेशों का प्रतिरोध करने के लिए आवाज़ उठानी चाहिए. इसके लिए उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने संदेशों के साथ #IAmNotAVirus का इस्तेमाल करने के लिए कहा है. 

जेलों, हिरासत केंद्रों में लोगों की सुरक्षा

इस बीच जेलों, आप्रवासन हिरासत केंद्रों, शरणार्थी शिविरों में कोविड-19 फैलने के ख़तरों से निपटने के लिए सभी देशों से समुचित प्रयास किए जाने का आग्रह किया जा रहा है

यातना की रोकथाम के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की एक सहसमिति ने सोमवार को हिदायत जारी करते हुए कहा कि जेलों और बंदीगृहों में रह रहे लोगों की भी इस बीमारी से रक्षा की जानी चाहिए.

समिति के प्रमुख सर मैल्कम एवन्स ने बताया कि, “संक्रमण की रोकथाम के लिए सरकारों को ऐहतियाती और आपात उपायों को लागू करना होगा ताकि बंदियों के लिए उपयुक्त स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंधन हो और वे अपने परिवारों व बाहरी दुनिया से भी संपर्क रख सकें.”

इन क़दमों में बंदीगृहों में क़ैद लोगों की संख्या घटाने के लिए उन्हें जल्द या अस्थाई रूप से रिहा करने और बेहद गंभीर मामलों को छोड़कर अन्य अपराधियों को जमानत पर छोड़ने के प्रावधान का उल्लेख है.

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं.

 

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