कोविड-19 से लड़ाई में मानवाधिकार भी सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी

26 मार्च 2020

संयुक्त राष्ट्र के अनेक मानवाधिकार विशेषज्ञों ने ज़ोर देकर कहा है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और आपदा उपाय किए जाने के बीच वैश्विक महामारी कोविड-19 का मुक़ाबला करने की जद्दोजहद में हर एक व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों का सम्मान किया जाना बहुत ज़रूरी है. 

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया के तहत काम कर रहे 42 मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक दल ने कहा है, “बिना किसी अपवाद के, हर एक व्यक्ति को जीवनरक्षक सहायता पाने का अधिकार हासिल है और इस अधिकार को सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी देशों की सरकारों की है.”

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि संसाधनों या बीमा योजनाओं की क़िल्लत को बहाना बनाकर मरीज़ों के किसी भी समूह के ख़िलाफ़ किसी भी तरह से और कभी भी भेदभाव नहीं किया जा सकता, “स्वास्थ्य सुनिश्चित करने का अधिकार सभी को हासिल है.” 

मानवाधिकार के इन दूतों का कहना है कि विकलांग लोग, वृद्ध, अल्पसंख्यक समुदाय, देश के भीतर ही विस्थापित लोग और ऐसे लोग जो अत्यंत ग़रीबी में जीवन जीने को मजबूर हैं, साथ ही बंदीगृहों में रखे गए लोग, बेघर, शरणार्थी और अन्य ऐसे लोग हैं जिन्हें सरकारी सहायता की ज़रूरत है.

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा कि बेशक स्वास्थ्य का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए जैव-चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र में प्रगति बहुत अहम है, उतना ही अहम सभी मानवाधिकार उतने ही अहम हैं.

साथ ही ये सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है कि स्वास्थ्य संबंधी नीतियों में ग़ैर-भेदभाव, समावेश, सशक्तिकरण और जवाबदेही लागू की जाए.

रोकथाम, जाँच और उपचार 

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाए गए उपायों का स्वागत किया है.

साथ ही देशों की सरकारों से महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में संक्रमण की पहले से ही रोकथाम, जाँच, उपचार और स्वास्थ्य लाभ की प्रक्रिया के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के तमाम सैक्टरों को ज़रूरी संसाधन मुहैया कराने के लिए पक्के इरादे से काम करने का भी आहवान किया गया है.

लेकिन इस वैश्विक संकट का मुक़ाबला के लिए उससे भी कहीं ज़्यादा करने की ज़रूरत है.

विशेषज्ञों का कहना था, “देशों की सरकारों को सामाजिक संरक्षा मुहैया कराने के लिए ऐसे अतिरिक्त उपाय करने होंगे जिनके ज़रिए उन लोगों तक मदद पहुँच सके जिन्हें इस संकट से बहुत ज़्यादा प्रभावित होने का ख़तरा है.”

“ऐसी आबादी में महिलाएँ भी हैं जो पहले से ही सामाजिक व आर्थिक रूप में हाशिए पर हैं और उन्हें परिवारों की देखभाल का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है, साथ ही लैंगिक भेदभाव पर आधारित हिंसा का भी उन्हें बहुत ज़्यादा ख़तरा रहता है.” 

स्वास्थ्यकर्मियों को अभिनन्दन

संयुक्त राष्ट्र के इन मानवाधिकार विशेषज्ञों उन स्वास्थ्यकर्मियों की सराहना भी की जो इस वैश्विक महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपनी अथक सेवाएँ मुहैया करा रहे हैं.

उन्होंने कहा, “स्वास्थ्यकर्मियों को बहुत दबाव में और लंबे घंटों तक काम करना पड़ रहा है, अपनी ज़िन्दगी को भी ख़तरे में डालना पड़ता है, और संसाधनों की भारी कमी होने की स्थिति में नैतिक अनिर्णय की तकलीफ़देह स्थिति का भी सामना करना पड़ता है.

“स्वास्थ्यकर्मियों को सरकारों, व्यावसायिक समूहों, मीडिया और आम जनता से हर तरह का समर्थन व सहायता की ज़रूरत है.”

सावधानी की दरकार

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 एक गंभीर वैश्विक चुनौती है, साथ ही ये सार्वभौमिक मानवाधिकार सिद्धांतों को फिर से जीवित करने के लिए आगाह करने वाला एक अवसर भी है. 

“ऐसे में ज़रूरी है कि इन ये सिद्धांत और वैज्ञानिक ज्ञान में भरोसा अटूट रहे जिससे नक़ली ख़बरों (फ़ेक न्यूज़), पूर्वाग्रह, भेदभाव, असमानता और हिंसा का मुक़ाबला किया जा सके.”

इस चुनौती का सामना करने में सभी एकजुट हैं. मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट पर पार पाने के प्रयासों के दौरान मानवाधिकार सुनिश्चित करने में बिज़नैस सैक्टर की ख़ासतौर से ज़्यादा ज़िम्मेदारी है. 

मानवाधिकार विशेषज्ञों के बारे में

स्पेशल रैपोर्टेयर्स और स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की नियुक्ति जिनीवा स्थित यूएन मानवाधिकार परिषद द्वारा होती है. इनका काम मानवाधिकारों से संबंधित किसी विशेष मुद्दे या विशेष देश की स्थिति की जाँच करके मानवाधिकार परिषद को रिपोर्ट देना होता है. इन मानवाधिकार विशेषज्ञों की हैसियत मानद होती है, ये संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते, और उन्हें अपने कामकाज के लिए संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन भी नहीं मिलता.  
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों के नाम और उनके पदों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए यहाँ क्लिक करें.

 

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