जलवायु परिवर्तन: ज़मीन, हवा, वातावरण, हर कहीं बढ़ रहा है संकट

10 मार्च 2020

संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा व व्यापक जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन पर्यावरण के सभी पहलुओं पर बहुत बड़ा असर डाल रहा है, साथ ही जलवायु संकट दुनिया भर की आबादी के स्वास्थ्य और रहन-सहन को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहा है.

 

इस रिपोर्ट का नाम है वर्ष 2019 में वैश्विक जलवायु की स्थिति जिसे संयुक्त राष्ट्र की मौसम संस्था विश्व मौसम संगठन ने तैयार किया है. इस रिपोर्ट में बड़ी संख्या में साझीदारों के नेटवर्क से आँकड़े पेश किए गए हैं.

रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के भौतिक चिन्हों का लेखा-जोखा तैयार किया गया है. मसलन - ज़मीनी और समुद्री सतहों पर बढ़ती गर्मी, समुद्रों का जल स्तर बढ़ना और हम पर्वतों का पिघलना - साथ ही सामाजिक व आर्थिक विकास, मानव स्वास्थ्य, प्रवासन और विस्थापन, खाद्य सुरक्षा, और भूमि व जल परिस्थितिकि तंत्रों पर इसके प्रभाव.

1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य से भटकाव

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इस रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा है कि विश्व अभी इस सदी के आख़िर तक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक या जैसाकि पेरिस समझौते में कहा गया है कि 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य को पाने में रास्ते से बहुत भटका हुआ है. 

Queensland Fire and Emergency Services
ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड में जंगल में लगी आग पर क़ाबू पाने का प्रयास करते दमकलकर्मी.

याद रहे कि सदस्य देशों ने 2015 में पेरिस समझौते को मंज़ूर किया था जिसमें वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का आहवान किया गया है.

रिपोर्ट कहती है कि हाल के वर्षों और दशकों में तापमान के अनेक रिकॉर्ड टूटे हैं. रिपोर्ट में पुष्टि की गई है कि वर्ष 2019 रिकॉर्ड पर दूसरा सबसे गरम वर्ष था, और 2010-2019 रिकॉर्ड पर सबसे गर्म दशक दर्ज किया गया. 

1980 के बाद से सभी दशक लगातार गरम होते देखे गए हैं जबकि 1850 के बाद से सभी दशक उतने ज़्यादा गरम नहीं थे.

विश्व मौसम संगठन के महासचिव पैट्टरी तालस का कहना है कि सबसे गरम वर्ष अभी तक 2016 रहा लेकिन ये रिकॉर्ड भी जल्द ही टूटने की संभावना है. "ग्रीन हाउस गैसों का स्तर चूँकि लगातार बढ़ रहा है, तापमान वृद्धि भी जारी रहेगी.

हाल ही में दशक के मौसम के पूर्वानुमान में कहा गया है कि अगले पाँच वर्षों के दौरान वैश्विक स्तर पर तापमान का एक नया रिकॉर्ड सामने आ सकता है. ये केवल समय की बात है कि कब होगा."

पैट्टरी तालस ने यूएन न्यूज़ के साथ एक बातचीतम में रकहा कि समाजों में ये समझ व्यापक रूप से बढ़ रही है - वित्तीय क्षेत्र से लेकर युवाओं तक में - कि जलवायु परिवर्तन आज के दौर में मानव जाति के सामने नंबर एक समस्या है. "इसलिए अनेक अच्छे संकेत भी हैं कि हमने सही दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर दिया है."

"पिछले वर्ष विकसित देशों में अर्थव्यवस्था में वृद्धि के बावजूद उत्सर्जन में गिरावट दर्ज की गई थी, इसलिए हम ये साबित होता है कि आर्थिक विकास को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी से अलग किया जा सकता है.

बुरी ख़बर ये है कि बाक़ी दुनिया में, उत्सर्जन में पिछले साल बढ़ोत्तरी हुई. इसलिए हमें अगर इस समस्या को हल करना है तो हमें सभी देशों को साथ लेकर चलना होगा."

पैट्टरी तालस का कहना था कि बहुत से देश अब भी अपनी प्रतिबद्धताएँ पूरी तरह नहीं निभा रहे हैं जो उन्होंने 2015 में हुए पेरिस समझौते को मंज़ूरी देकर की थीं.

"इसके कारण विश्व के सामने इस शताब्दी के अंत तक तापमान वृद्धि चार से पाँच डिग्री सेल्सियस तक होने का जोखिम पैदा हो गआ है: अगर हम जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम करने के प्रति गंभीर हैं तो महत्वकांक्षाओं का स्तर बढ़ाने की सख़्त ज़रूरत है."

भड़की कार्बनडाय ऑक्साइड

पैट्टरी तालस ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि वर्ष 2020 का जनवरी महीना अभी तक का किसी भी वर्ष का सबसे ज़्यादा गरम जनवरी महीना रिकॉर्ड किया गया है. साथ ही उत्तरी गोलार्द्ध में बीती सर्दी का मौसम असाधारण रूप से नरम रहा.

WMO/Gonzalo Javier Bertolotto Quintana
अंटार्कटिका के प्रिंस गुस्ताव चैनल में पानी पर तैरती हिम चादरें. वहाँ 28 किलोमीटर लंबी प्रिंस गुस्ताव हिम चादर हुआ करती थी. हाल के वर्षों और दशकों में ये हिम चादरें पिघल गई हैं.

अंटार्कटिका में जारी मौजूदा गर्मी के कारण बहुत बड़े पैमाने पर हिम पर्वत पिघल रहे हैं और हिमनदों (ग्लेशियरों) में दरारें पड़ रही हैं. परिणामस्वरूप समुद्रों का जल स्तर बढ़ रहा है. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी भीषण आगों के कारण कार्बन डाय ऑक्साइड में उछाल आया और दुनिया भर में धुआँ और प्रदूषक तत्व बड़े पैमाने पर फैले.

ऑस्ट्रेलिया में 2018-2019 के दौरान ग्रीष्म मौसम अभी तक की सबसे ज़्यादा गरम दर्ज की गई. 18 दिसंबर को वहाँ का तापमान 41.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया.

ऑस्ट्रेलिया ही एक मात्र ऐसा देश नहीं था जो अत्यधिक गर्मी या भीषण जंगली आग से प्रभावित हुआ. अनेक यूरोपीय देशों में भी तापमान वृद्धि के रिकॉर्ड टूटे जिनमें फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल थे.

यहाँ तक कि नॉर्डिक्स देशों भी रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया जिनमें फ़िनलैंड भी शामिल था, जहाँ राजधानी हेलसिंगी में 33.2 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया. नॉर्डिक्स देशों में मुख्य रूप से डेनमार्क, फ़िनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन नामक देश शामिल हैं.

साइबेरिया और अलास्का सहित उच्च अक्षांश वाले अनेक क्षेत्रों में ऊँचे स्तर वाली आग संबंधी गतिविधियाँ देखी गईं. ऐसा ही आर्कटिक के कुछ हिस्सों में भी देखा गया जबकि इससे पहले वहाँ ऐसा आमतौर पर नहीं देखा जाता था.

इंडोनेशिया और पड़ोसी देशों में 2015 में अनेक स्थानों पर अनेक बार आग लगी, दक्षिण अमेरिका में भी 2010 के बाद से आग संबंधी गतिविधियाँ उच्च स्तर पर रही हैं.

समुद्र के गरम होने के विशाल प्रभाव

वर्ष 2019 के दौरान ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ता रहा, जिससे समुद्रों में भी तापमान वृद्धि हुई, और इस तरह की गतिविधियों से समुद्रों का जल स्तर भी बढ़ रहा है. इससे समुद्र की लहरों में बदलाव हो रहा है, तैरते हिम पहाड़ पिघल रहे हैं, और सुमुद्री जीवन के पारिस्थितिकि तंत्र में नाटकीय बदलाव हो रहे हैं.

समुद्रों में रसायनों की मात्रा बढ़ी है और ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है जिसका समुद्री जीवन पर नकारात्मक प्रभाव हो रहा है, साथ ही जो लोग समुद्री पारिस्थिकि तंत्र पर निर्भर करते हैं, उनके रहन-सहन पर भी असर पड़ रहा है.

धुर्वों पर समुद्रों में हिम कम हो रहा है और ग्लेशियर 32वें वर्ष में लगातार सिकुड़ रहे हैं.

वर्ष 2002 से 2016 के बीच ग्रीनलैंड में लगभग 260 गीगाटन प्रतिवर्ष की दर से हिम ख़त्म हो गया है. सबसे ज़्यादा वर्ष 2011-2020 के दौरान लगभग 458 गीगाटन हम पिघला था. वर्ष 2019 में 329 गीगाटन बर्फ़ बिघला है जोकि औसत से ज़्यादा था.

अभूतपूर्व बाढ़ और सूखा

वर्ष 2019 में दुनिया भर में चरम मौसम की अनेक घटनाएँ हुईं जो अपने आप में बहुत बड़े पैमाने की थीं.  भारत, नेपाल, बांग्लादेश और म्याँमार में मॉनसून के मौसम में इतनी बारिश हुई कि वो लंबे समय के भी औसत से ज़्यादा थी.   

WFP/Nihab Rahman
बांग्लादेश के कॉक्सेज़ बाज़ार में मौजूद शरणार्थी शिविर में रहने वाले लोगों के लिए यूएन विश्व खाद्य कार्यक्रम ने भारी बारिश के बाद व्यापक खाद्य सहायता कार्यक्रम चलाया.

दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में जनवरी में बाढ़ आई, जबकि ईरान में मार्च और अप्रैल आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई. संयुक्त राज्य अमेरिका में बाढ़ से लगभग 20 अरब डॉलर का नुक़सान आँका गया जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में पानी की भारी क़िल्लत देखी गई.

ऑस्ट्रेलिया में 2019 रिकॉर्ड पर सबसे ज़्यादा सूखा रहा, और दक्षिण अफ्रीका, मध्य अमेरिका व दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में बहुत कम बारिश हुई.

मानवीय नुक़सान

जलवायु परिवर्तन के कारणों का दुनिया भर की इंसानी आबादी के स्वास्थ्य पर भी भारी असर पड़ रहा है: रिपोर्ट दिखाती है कि वर्ष 2019 में तापमान में अत्यधिक वृद्धि के कारण जापान में 100 से ज़्यादा और फ्रांस में 1462 लोगों की मौतें हुईं.

वर्ष 2019 में तापमान वृद्धि के कारण डेंगु वायरस का फैलाव भी बढ़ा जिसके कारण मच्छरों को कई दशकों से बीमारियों का संक्रमण फैलाना आसान रहा है.

भुखमरी में अनेक वर्षों तक गिरावट दर्ज किए जाने के बाद अब इसमें बढ़ोत्तरी देखी गई है और इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन व चरम मौसम की घटनाएँ हैं: वर्ष 2018 में भुखमरी से लगभग 82 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे.

हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका के देश वर्ष 2019 में विशेष रूप में ज़्यादा प्रभावित हुए, जहाँ की ज़्यादातर आबादी पर जलावायु संबंधी चरम घटनाओं, विस्थापन, संघर्ष व हिंसा का बड़ा असर पड़ा.

उस क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा और उसके बाद वर्ष के आख़िर में भारी बारिश हुई. इसी कारण टिड्डियों का भी भारी संकट पैदा हुआ जो पिछले लगभग 25 वर्षों में सबसे भीषण था.

दुनिया भर में लगभग 67 लाख लोग प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपने घरों से विस्थापित हुए, इनमें विशेष रूप से तूफ़ानों और बाढ़ों का ज़्यादा असर था.

विशेष रूप से ईरान, फ़िलीपीन्स और इथियोपिया में आई भीषण बाढ़ों का ज़िक्र करना ज़रूरी होगा. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2019 में लगभग दो करोड़ 20 लाख लोगों के देश के भीतर ही विस्थापित होना पड़ा जोकि वर्ष 2018 ये संख्या लगभग एक करोड़ 72 लाख थी.

 

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