भारत में 'शून्य-बजट' प्राकृतिक खेती से लाभ

26 फ़रवरी 2020

भारत के आंध्र प्रदेश राज्य में 'शून्य-बजट' प्राकृतिक खेती के ज़रिए किसानों की प्रत्यक्ष लागत कम करने का प्रयास किया जा रहा है. इस प्रणाली में स्थानीय और ग़ैर-सिंथेटिक कृषि सामग्री के उपयोग से पैदावार और कृषि स्वास्थ्य को बढ़ावा मिलता है.

खेती भारत की अर्थव्यवस्था का आधार है - देश की 43 प्रतिशत आबादी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. इसके बावजूद भारत के क़रीब 60 फ़ीसदी लोगों को वर्ष 2050 तक भोजन की गंभीर कमी होने की आशंका है.

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव, उर्वरकों और कीटनाशकों के अनियंत्रित इस्तेमाल से भूमि क्षरण, ख़त्म होता भूजल,  महंगे बीज और कर्ज़ पर महंगी ब्याज दर जैसी चुनौतियां भारत के कृषि सैक्टर के सामने मुंह बाए खड़ी हैं.  महंगा कर्ज़ किसानों के ऋण में डूबने और किसान परिवारों की परेशानी का एक बड़ा कारण बनता जा रहा हैं.

ऑस्ट्रेलिया में यूनिवर्सिटी ऑफ दक्षिण ऑस्ट्रेलिया में वरिष्ठ लेक्चरर और कृषि और खाद्य मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के नज़दीकी सहयोगी हरपिंदर संधू का कहना है कि, "1960 के दशक की हरित क्रांति के बाद से प्रचलित उच्च-निवेश कृषि ही इन समस्याओं के कारणों में से एक है. भविष्य में यह संभव नहीं है इसलिए किसान इसका विकल्प तलाश रहे हैं."

जैव-विविधता का अर्थशास्त्र 

आंध्र प्रदेश ने प्रशिक्षण और विस्तार के कार्यक्रम के ज़रिए राज्य के सभी 60 लाख किसानों तक 'शून्य बजट' प्राकृतिक खेती पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है.

यूएन पर्यावरण एजेंसी पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के अर्थशास्त्र (Economics of Ecosystems and Biodiversity) की मेज़बानी करता है जो "प्रकृति के मूल्यों को प्रत्यक्ष" बनाने पर केंद्रित एक वैश्विक पहल है.

कृषि और खाद्य के लिए इस पहल को वर्ष 2014 में शुरु किया गया था ताकि नीतिनिर्धारक कृषि-खाद्य वैल्यू चेन की प्रकृति पर निर्भरता और प्रभावों को बेहतर ढंग से समझ सकें.

यूनेप की इस पहल के समन्वयक सलमान हुसैन ने बताया कि, “शून्य-बजट प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों का कृषि व खाद्य के लिए पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता के अर्थशास्त्र के साथ तालमेल बैठाया जाता है, ताकि प्रति हेक्टेयर उत्पादकता से ध्यान हटाकर समग्र दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित हो और कृषि से मानवीय, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ और लागत के मूल्यों को पहचाना जा सके.”

उनका कहना है कि कृषि में असंख्य सकारात्मक और नकारात्मक बाह्यताएं छिपी हैं जिसमें कीटनाशकों के इस्तेमाल से मानव स्वास्थ्य पर असर और जलाशयों का प्रदू्षण का शिकार होना है.

सलमान हुसैन के मुताबिक “यह हो सकता है कि कृषि उद्यम को भी यह ना पता हो कि वह समाज पर इस तरह की लागत के लिए ज़िम्मेदार है, या शायद वो इसके बारे में जानता हो लेकिन अपने व्यवहार को बदलने के लिए बाज़ार से उसे कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता. दूसरी तरफ़, खेती से समुदायों के लिए जो सकारात्मक योगदान हो सकता है उसे बहुत कम आंका जाता है - जैसेकि सामुदायिक सामंजस्य प्रदान करना और छोटे किसानों के लिए आजीविका का रखरखाव.”

कृषि के आर्थिक निर्णय

“कृषि और खाद्य मूल्यांकन ढांचे के लिए पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र, कृषि और खाद्य प्रणालियों की सही लागतों की जांच करता है. पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता के अर्थशास्त्र ने अभी तक शून्य बजट प्राकृतिक खेती का पूर्ण मूल्यांकन नहीं किया है (हालांकि इस वर्ष के लिए योजना बनाई गई है), लेकिन इस बात के प्रमाण हैं कि इसका सकारात्मक पारिस्थितिक प्रभाव हैं. जैसे मिट्टी की गुणवत्ता, उर्वरता और जल धारण क्षमता पर."

साथ ही उपज परिवर्तनशीलता में कमी और किसानों की आय बढ़ने जैसे सामाजिक-आर्थिक लाभ भी हैं. खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन सहन-क्षमता पर इसके सकारात्मक प्रभावों के भी प्रमाण हैं.

“प्रमुख बात यही है: इनमें से कुछ लाभ आर्थिक निर्णयों में शामिल नहीं होते हैं. हमें ये अंतर पाटने होंगे जिसमें सकारात्मक और नकारात्मक बाह्यताओं का हिसाब हो, वरना स्पष्ट है कि हम अपने भोजन की सही लागत का भुगतान नहीं कर रहे हैं. दूसरे शब्दों में, हमें सही लागत लेखांकन की आवश्यकता है."

“चूंकि शून्य बजट प्राकृतिक खेती का कथित तौर पर सकारात्मक असर हो रहा है तो इससे कृषि और खाद्य मूल्यांकन के लिए पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता के अर्थशास्त्र पर भी प्रभाव होगा. मूल्यांकन का उद्देश्य निर्णय निर्माताओं को यह बताना है कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती से किस हद तक समाज को लाभ हो रहा है, जिससे इसे बढ़ावा देने की क़ीमत समझी जा सके.” 

हुसैन के मुताबिक, “जो लोग शून्य बजट प्राकृतिक खेती की आलोचना करते हैं, उन्हें पहले इसके असंख्य सकारात्मक बाह्य लाभ देखने चाहिएं और उनकी तुलना पारंपरिक प्रणालियों की नकारात्मक बाह्यताओं से करनी चाहिए."

इस प्रक्रिया में कई ऐसे समूहों के भी स्वार्थ निहित बताए गए हैं, जिन्हें भारी रियायत वाली सघन खेती को जारी रखने से लाभ होता है.

बदलाव की अपील

संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन भी उच्च-निवेश, संसाधन-गहन खेती पर निर्भरता घटाने के महत्व पर बल देता है और देशों से उत्पादकता बढ़ाने, टिकाऊ भोजन मुहैया कराने और प्राकृतिक संसाधनों के कुशल उपयोग के लिए कृषिविविधता जैसे दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह कर रहा है.

इसी वजह से यूएन एजेंसी ने आंध्र प्रदेश में शून्य बजट प्राकृतिक खेती को पूरा समर्थन दिया है. वहीं, अब कृषि वैज्ञानिक भी स्थान के हिसाब से विशेष समाधानों की तलाश करने की सिफ़ारिश करने लगे हैं.

संधू कहते हैं, "शून्य बजट प्राकृतिक खेती से स्थानीय स्तर पर इस तरह के समाधान मिल सकते हैं और खेती की पैदावार में सुधार, पर्यावरण की रक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ाने की क्षमता रखती है."

 

यह रिपोर्ट पहले यहां प्रकाशित हुई. 

 

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