दक्षिण सूडान: लोगों को जबरन भुखमरी में धकेलना 'हो सकता है युद्धापराध'

20 फ़रवरी 2020

दक्षिण सूडान के विभिन्न इलाक़ों में जातीय और राजनैतिक कारणों से लोगों को जानबूझकर भुखमरी का शिकार बनाने और महिलाओं व पुरुषों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के मामले सामने आए हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा गठित एक आयोग ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि ऐसे मामले युद्धापराध के दायरे में परिभाषित हो सकते हैं, लेकिन गंभीर हालात के बीच दक्षिण सूडान में राजनैतिक कुलीन वर्ग आम लोगों की पीड़ाओं से बेपरवाह है.

वर्षों के हिंसक संघर्ष के बाद राष्ट्रीय एकता वाली सरकार के गठन के लिए तयशुदा अवधि जल्द ही समाप्त हो रही है जिसको ध्यान में रखते हुए एक बड़े क्षेत्र में अंतर-सामुदायिक हिंसा और भयावह मानवाधिकार उल्लंघनों के प्रति चेतावनी जारी की गई है.

दक्षिण सूडान में मानवाधिकारों पर तीन-सदस्यों वाले आयोग के सदस्य प्रोफ़ेसर एंड्रयू क्लैपहैम ने बताया कि फ़सलों को नष्ट करने और बोरेवैल के ज़रिए जल की सुलभता को ख़त्म करने जैसे मामलों को भुखमरी के युद्धापराध की श्रेणी में रखा जा सकता है, क्योंकि इसके पीचे मंशा नागरिक अबादी को भूखमरी का शिकार बनाने की थी. इसके लिए सरकार और विरोधी गुटों, दोनों पक्षों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.

आयोग की ये रिपोर्ट जिनीवा स्थित मानवाधिकार परिषद में 9 मार्च को पेश की जाएगी.

रिपोर्ट बताती है कि सरकार और हथियारबंद गुट ऐसी नीतियों के लिए ज़िम्मेदार हैं जिनसे वाउ और यूनिटी राज्यों में लोगों को भुखमरी का शिकार होना पड़ा है.

यह एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसका मक़सद ‘शत्रु समुदायों’ को संसाधनों से वंचित रखने और आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना है.

UN Commission on Human Rights in South Sudan / Twitter screen grab
दक्षिण सूडान में मानवाधिकारों पर यूएन कमीशन के सदस्य (बाएं से) यासमीन सूका, एंड्रूयू क्लैपहैम और बार्ने अफ़ाको.

रिपोर्ट दर्शाती है कि देश के विभिन्न हिस्सों में अकाल की स्थिति गंभीर हो गई है और हज़ारों की संख्या में आम नागरिकों को भोजन सहित अन्य ज़रूरतों वाली चीज़ों तक तक पहुंच नहीं बची है.

जांचकर्ताओं ने बताया है कि सैनिकों और विपक्षी लड़ाकों को किस तरह इनाम लेने की अनुमति दी गई और समुदायों को पैतृक स्थानों से जबरन हटा दिया गया. इस वजह से प्रभावित लोगों के पास संघर्ष में किसी एक पक्ष का दामन थामने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था.  

सरकारी सुरक्षा बलों और विपक्षी गुटों के वफ़ादार लड़ाकों ने बहर अल-ग़ज़ल, यूनिटी और जोन्गलेई राज्यों के कई गांवों पर हमले किए जिनसे बड़ी संख्या में लोग विस्थापन के लिए मजबूर हुए हैं.

आयोग ने वाराप, पश्चिमी बहर अल-ग़ज़ल और यूनिटी राज्यों में हिंसक अभियानों पर सबूत एकत्र किए हैं जहां सरकारी सुरक्षा बलों और विपक्षी मिलिशिया द्वारा जबरन पुरुषों और लड़कों को भर्ती किए जाने की रिपोर्टें मिली हैं.  

यौन हिंसा का क्रूर रूप

मानवाधिकार परिषद के लिए दक्षिण सूडान पर आयोग की यह चौथी रिपोर्ट है जिसमें सचेत किया गया है कि हिंसक संघर्ष से संबंधित यौन हिंसा “व्यापक और विस्तृत” है.

दक्षिण सूडान में यौन व लिंग-आधारित हनन के मामलों में न्याय व जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ढांचा अब भी तैयार नहीं है, दोषियों द्वारा अपराधों से इनकार और पीड़ितों को कलंकित किया जाना अब भी एक बड़ी चुनौती है.

प्रोफ़ेसर क्लैपहैम ने जिनीवा में पत्रकारों को बताया कि दक्षिण सूडान में जवाबदेही नदारद होने व दंडमुक्ति की भावना के मज़बूती से घर करने के कारण हिंसा होती है, और मौजूदा व अतीत के उल्लंघनों पर कार्रवाई ना होने से यह जारी है.

“सूडान में स्थिरता लाने और माहौल को लोकतांत्रिक बनाने के लिए इस स्थिति को बदलने की ज़रूरत है.”

WFP/Gabriela Vivacqua
रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी सुरक्षा बलों और विपक्षी गुटों ने जानबूझकर लोगों को भुखमरी का शिकार बनाने की कोशश की.

सरकारी ख़ज़ाने की लूट

जांचकर्ताओं के मुताबिक भारी भ्रष्टाचार के कारण राष्ट्रीय राजस्व प्राधिकरण को लाखों अमेरिकी डॉलर का नुक़सान हुआ है और ऐसे मामलों में वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने आर्थिक अपराध किए हैं. .

आयोग की प्रमुख यासमीन सूका ने बताया, “उच्च-पदस्थ अधिकारियों ने अपने आधिकारिक पद का इस्तेमाल राज्यसत्ता के संसाधनों के आबंटन और सरकारी ख़रीद के निर्णयों को प्रभावित करने में किया. निजी लाभ और मुनाफ़े के लिए सार्वजनिक धन का ग़लत इस्तेमाल हुआ.”

दक्षिण सूडान में 14 लाख से ज़्यादा आम नागरिक घरेलू रूप से विस्थापित हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें ऐसे शिविरों में रहना पड़ रहा है जहां उनकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं होती और इसलिए उन्हें मानवीय राहत सहायता पर निर्भर होना पड़ता है.

इसके अलावा, हिंसक संघर्ष के कारण 22 लाख से ज़्यादा लोगों को शरण की तलाश के लिए मजबूर होना पड़ा है.

आयोग की सिफ़ारिशों में स्पष्ट किया गया है कि स्थाई शांति के लिए राज्यों की संख्या व सीमाओं के निर्धारण पर सहमति अहम होगी क्योंकि इससे देशभर में सत्ता का बंटवारा संभव हो सकेगा.

दक्षिण सूडान विश्व का सबसे नया देश है लेकिन अपनी स्थापना के समय से ही अस्थिरता और संघर्ष में झुलसता रहा है.

राष्ट्रपति साल्वा कीर और उनके राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी व पूर्व उपराष्ट्रपति रिएक मचार ने वर्ष 2018 में एक नए शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

उस समय आशा व्यक्त की गई थी कि आपसी सहमति के ज़रिए संकट को समाप्त करने के साथ लाखों बेघरों व भुखमरी का शिकार लोगों के लिए बेहतर व सुरक्षित हालात सुनिश्चित किए जा सकेंगे.

2019 के बाद से हिंसा में कुछ कमी आई है लेकिन मानवाधिकार उल्लंघन के मामले लगातार सामने आते रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र की तीन एजेंसियों ने चेतावनी जारी है कि दक्षिण सूडान में 65 लाख, यानी देश की आधी आबादी से ज़्यादा लोगों को मई और जुलाई महीनों के बीच गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है.

 

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