'स्थायी शांति के लिए अहम' है संक्रमणकालीन न्याय प्रक्रिया

13 फ़रवरी 2020

हिंसक संघर्षों व सामूहिक अत्याचारों के बाद देशों व समाजों के आगे बढ़ने के लिए पीड़ितों के कष्टों की शिनाख़्त और न्याय का सुनिश्चित होना ज़रूरी है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने शांति निर्माण और उसे बनाए रखने में संक्रमणकालीन न्याय (transitional justice) की भूमिका पर सुरक्षा परिषद में चर्चा के दौरान यह बात कही.

संक्रमणकालीन न्याय प्रक्रिया से तात्पर्य 'सत्य निरुपण व मेलमिलाप आयोग' (truth and reconciliation commission) सहित उन तंत्रों से है जिनके ज़रिए पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया जाता है.

यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने जिनीवा से टेलीकांफ्रेंसिंग के ज़रिए बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि, “हम जानते हैं कि स्थाई शांति न्याय, विकास और मानवाधिकारों के सम्मान से जुड़ी है. हम जानते हैं कि हथियारों के शांत होने और अत्याचार के अपराधों के रुकने से ही शांति स्थापित नहीं होती.”

“घटनाओं की पुनरावृत्ति के डर के बग़ैर जीवन की फिर से शुरुआत करने के लिए और समाज को आगे ले जाने के लिए पीड़ा की शिनाख़्त ज़रूरी है, राज्यसत्ता की संस्थाओं में भरोसा बहाल होने के साथ न्याय होना चाहिए.”

उन्होंने बताया कि यूएन मानवाधिकार प्रमुख और चिली की नागरिक व पूर्व राष्ट्रपति के तौर पर वह संक्रमणकालीन न्याय की परिवर्तनकारी शक्ति का अनुभव कर चुकी हैं.

इन प्रक्रियाओं से कष्टों व दरारों को दूर करने में मदद मिलती है और हिंसा व अत्याचार का शिकार रहे लोगों, विशेषकर महिलाओं, आदिवासी व वंचित समुदायों का सशक्तिकरण संभव हो पाता है.

“मैं अभी-अभी कॉंगो लोकतांत्रिण गणराज्य में एक मिशन से लौटी हूं जहां कासाई क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र समर्थित विचार-विमर्श के ज़रिए कई पीड़ितों को सत्य, मेलमिलाप, मुआवज़े और भविष्य में हिंसक संघर्षों की रोकथाम जैसे विषयों पर अपनी बात कहने का अवसर मिला है. ”

“इन चर्चाओं से प्रांतीय शांति, न्याय और मेलमिलाप आयोग की स्थापना के लिए ज़मीन तैयार हुई है.”

कोलंबिया में सच की तलाश

कोलंबिया में सत्य परीक्षण और सहअस्तित्व पर स्थापित एक आयोग के अध्यक्ष के तौर पर फ़ादर फ़्रासिस्को द रॉउ ने भी इस चर्चा में अपना पक्ष रखा.

कोलंबिया में सरकारी सुरक्षा बलों और विद्रोही गुट एफ़एआरसी (FARC) के बीच पांच दशकों तक चली हिंसा में ढाई लाख लोगों से ज़्यादा आम नागरिकों की मौत हुई. वर्ष 2016 में संयुक्त राष्ट्र के समर्थन से दोनों पक्षों में एक शांति समझौता हो गया था.

इस आयोग को हज़ारों की संख्या में पीड़ितो, नागरिक प्रशासन व सैन्य संस्थाओं के कर्मचारियों की गवाही प्राप्त हुई है.

MONUSCO
यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त हाल ही में कॉंगो लोकतांत्रिक गणराज्य के दौरे से लौटी हैं.

दुभाषिए की मदद से सुरक्षा परिषद को संबोधित करते हुए फ़ादर रॉउ ने बताया कि, “सच्चाई संक्रमणकालीन न्याय के रास्ते का प्रवेश द्वार बन गई है. यह उन देशों में साझा भविष्य का सामूहिक रूप से निर्माण करने की भी नींव है जहां युद्ध के कारण दरार आ गई है.”

फ़ादर रॉउ ने बताया कि सच्चाई की तलाश के कई रूपों में की जा सकती है. न्यायिक प्रणाली क़ानून के मुताबिक दोषियों की शिनाख़्त करती है, वहीं आयोग “नैतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक सच्चाई” को सभी पक्षों की गवाही के ज़रिए समझने का प्रयास करता है.

दक्षिण अफ़्रीका का अनुभव

फ़ादर रॉउ ने बताया कि सार्वजनिक तौर पर पीड़ितों की गरिमा की पहचान करने और दोषियों के ज़िम्मेदारी स्वीकारने से हिंसक संघर्षों की रोकथाम की जा सकती है. दक्षिण अफ़्रीका इसी का एक उदाहरण है.

रंगभेदी नीतियों के उस दौर में बड़ी संख्या में दक्षिण अफ़्रीकी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया था जिनमें कई कार्यकर्ताओं ने पुलिस मुख्यालय की खिड़कियों से बाहर कूदकर, फ़ाइलों की अलमारी पर अपने सिर पटक कर या फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी.

मानवाधिकार वकील यासमीन सूका वर्ष 1995 में स्वर्गीय नेलसन मंडेला द्वारा स्थापित आयोग में शामिल थीं. उस समय नेलसन मंडेला देश की पहली लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार का नेतृत्व कर रहे थे.

उन्होंने बताया कि इन मौतों की तहक़ीकात को फिर से शुरु किया गया है जिससे पीड़ित परिवारों को न्याय की उम्मीद बंधी है.

साथ ही सूडान के पूर्व राष्ट्रपति ओमर अल बशीर के मामले को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को हस्तांतरित किए जाने की घोषणा हुई और अब उन्हे जनसंहार व युद्धापराध के मामलों का सामना करना पड़ेगा.

यासमीन सूका के मुताबिक यह दंडमुक्ति को समाप्त करने की अहमियत को प्रदर्शित करता है जो सीधे तौर पर क़ानून के राज की पुनर्बहाली से भी जुड़ा है.

 

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