भारत में जैव विविधता संरक्षण के नये आयाम

10 फ़रवरी 2020

भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा समर्थित एक परियोजना ने जैव विविधता के बेहतर उपयोग के ज़रिए ग्रामीण आजीविका सुधारने में सफलता हासिल की है.  2011 से सितंबर 2019 तक चली इस परियोजना को राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (India’s National Biodiversity Authority) ने कार्यान्वित किया है और वैश्विक पर्यावरण सुविधा (Global Environment Facility) ने धनराशि प्रदान की है. 

भारत को दुनिया के लिए कई मायनों में उदाहरण माना जा सकता है. ख़ासतौर पर जिस तरह ये देश अरब 30 करोड़ लोगों की आबादी को स्थायी रूप से भोजन उपलब्ध कराता है, वो एक मिसाल है. लेकिन चुनौती ये है कि भूमि, मिट्टी और जल संसाधनों और देश की समृद्ध विविधता को नष्ट किए बिना या फिर दिल्ली जैसे शहरों में प्रदूषण की धुंध पैदा किए बिना, किस तरह ये उपलब्धि बरक़रार रखी जा सकती है. 

भारत के राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की मदद से ग्रामीणों की आजीविका में बेहतरी के नये मानदंड स्थापित किए हैं. 

जैव विविधता पर कन्वेंशन के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, व्यापक क़ानूनी और संस्थागत प्रणाली स्थापित करने में भारत काफ़ी आगे रहा है.

आनुवांशिक संसाधनों को लोगों के लिए उपलब्ध कराना और लाभ के निष्पक्ष, समान बंटवारे के कन्वेंशन का तीसरा उद्देश्य, भारत में जैव विविधता अधिनियम 2002 और नियम 2004 के तहत लागू किया जा रहा है.

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण कन्वेंशन के प्रावधान लागू करने के अपने काम के लिए विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है.

इसकी पहुंच बढ़ाने और लाभ-साझाकरण प्रावधानों के संचालन के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के जैव-विविधता रजिस्टर (People Biodiversity Registers) और जैव विविधता प्रबंधन समितियों का नेटवर्क तैयार किया जाता है. 

2002 के अधिनियम के आधार पर बनी ये जैव विविधता प्रबंधन समितियां, स्थानीय स्तर की वैधानिक निकाय हैं, जिनमें लोकतांत्रिक चयन प्रक्रिया के तहत कम से कम दो महिला सदस्यों की भागीदारी ज़रूरी होती है.

ये समितियां शोधकर्ताओं, निजी कंपनियों, सरकारों जैसे प्रस्तावित उपयोगकर्ताओं की जैव-संसाधनों तक पहुंच संभ बनाने और सहमति बनाने में मदद करती हैं.

इससे जैव विविधता रजिस्टरों और जैविक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ उपयोग के फ़ैसलों के ज़रिए, उपलब्ध संसाधनों का स्थायी उपयोग और संरक्षण सुनिश्चित किया जाता है.

प्रोजेक्ट का शीर्षक है – ‘जैविक विविधता अधिनियम और नियमों के कार्यान्वयन को सुदृढ़ करने व उसकी पहुँच और लाभ साझाकरण प्रावधान पर ध्यान.’ (Strengthening the Implementation of the Biological Diversity Act and Rules with a Focus on its Access and Benefit Sharing Provisions).

परियोजना का उद्देश्य जैविक संसाधनों तक बेहतर पहुंच बनाना, उनके आर्थिक मूल्य का आकलन करना और स्थानीय लोगों के बीच उनके लाभों को बेहतर ढंग से साझा करना है.

इसे देश के 29 राज्यों में से 10 राज्यों - आंध्र प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, गोवा, कर्नाटक, ओडिशा, तेलंगाना, और त्रिपुरा में चलाया जा रहा है. 

कम ही लोग जानते होंगे कि भारत में जैव विविधता के कई आकर्षक वैश्विक केंद्र हैं.

उदाहरण के लिए, सिक्किम में पक्षियों की 422 प्रजातियाँ और तितलियों की 697 प्रजातियां, फूलों के पौधों की साढ़े चार हज़ार प्रजातियां, पौधों की 362 प्रजातियां और सुंदर ऑर्किड फूलों की समृद्ध विविधता है.

जैव स्रोतों के आर्थिक मूल्य का आकलन 

परियोजना के अंतर्गत लाभ बांटने की संभावनाओं के निर्धारण के लिए स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार योग्य जैव-संसाधनों के आर्थिक मूल्य का आकलन और परिमाणन किया गया.

परियोजना पर काम करने वाले यूएनईपी जैवविविधता विशेषज्ञ मैक्स ज़िएरन कहते हैं, “इससे भारत में जैविक संसाधनों के संभावित उपभोक्ताओं को पहले से ही इंगित करने, बाज़ार मूल्य श्रृंखलाओं का आकलन करने और उपभोक्ता कितना मूल्य देने को तैयार हैं – इस सबका निर्धारण करने में मदद मिली. इसमें जैविक संसाधनों के आर्थिक उपयोग के लिए संभावित नवीन अनुसंधान और निवेश की सुविधा भी दी गई है.”

इस प्रक्रिया से राष्ट्रीय और राज्य-स्तर के निर्णायकों को संरक्षण कार्रवाई को प्राथमिकता देने में भी मदद मिलेगी.

उदाहरण के लिए, उपयुक्त आर्थिक साधनों (करों, शुल्क या रॉयल्टी) के आवेदन, संसाधनों की कमी के कारण लागत का अनुमान, पुनर्स्थापना या संरक्षण के प्रयासों के साथ स्थायी मानकों को स्वीकार करने और स्थानीय आजीविका के माध्यम से लाभ सृजन का समर्थन करने का अंदाज़ा लगाना सुगम होगा.

इस परियोजना में अब तक फ्लोरा, जीव और पारंपरिक ज्ञान पर 140 जैव-विविधता रजिस्टरों में इकट्ठे किए आँकड़ों की जांच करने के लिए 315 जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ बनाई गई हैं.

पारंपरिक स्थानीय ज्ञान के विस्तार में मदद करने के लिए, परियोजना ने प्रत्येक राज्य में 25 युवा वनस्पति वैज्ञानिक प्रशिक्षित किए हैं.

मैक्स ज़िएरन ने बताया, "नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी के नेतृत्व में ये परियोजना, आयुर्वेदिक दवा निर्माण एजेंसियों, शिक्षाविदों, निजी अनुसंधान प्रयोगशालाओं और बॉयोसोर्स-आधारित उद्योगों के बीच परामर्श सक्षम करने में सफल रही है - जिसमें जैविक संसाधनों के कुछ बेहद नवीन उपयोग शामिल हैं." 

उन्होंने बताया, “इससे उनकी समझ बनी और अनुसंधान और संभावित उत्पाद विकास में निवेश करने की इच्छा पुख़्ता हुई. अभी तक प्रदाताओं के बीच 400 से अधिक पहुंच और लाभ-साझाकरण समझौतों पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं. इनमें अधिकतर स्थानीय समुदाय और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ उपयोगकर्ता शामिल हैं. इन समझौतों से शुरुआती राजस्व में राज्य जैव विविधता कोष के लिए 18 लाख अमेरिकी डॉलर की रक़म जुटाई गई है.”

यह लेख पहले यहां प्रकाशित हुआ. 

 

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