28 जनवरी 2020

संयुक्त राष्ट्र ने भारत की गुलाबी नगरी जयपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव की पृष्ठभूमि में जलवायु परिवर्तन से तत्काल निपटने की अहमियत को फिर दोहराया है. भारत में संयुक्त राष्ट्र की रेज़ीडेंट कोऑर्डिनेटर रेनाटा डेज़ालिएन ने जलवायु आपात स्थिति पर एक सत्र के दौरान बताया कि जलवायु संकट पर असरदार कार्रवाई के लिए संयुक्त राष्ट्र अपनी सीमाओं से परे जाकर प्रयासों में जुटा है.

खाद्य उत्पादन के लिए ख़तरे का सबब बनने वाले मौसमी बदलाव से लेकर, समुद्री जल के बढ़ते स्तर और तबाही लाने वाली बाढ़ के जोखिम तक, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अभूतपूर्व रूप से वैश्विक स्तर पर देखे जा सकते हैं.

जलवायु परिवर्तन को मौजूदा दौर का एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा माना जाता है जिससे करोड़ों की संख्या में लोगों का जीवन और आजीविका के साधन प्रभावित होने की आशंका है.

इसी चुनौती के मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र ने सोमवार को साहित्य महोत्सव के दौरान जलवायु आपदा पर एक सत्र का आयोजन किया जिसका उद्देश्य संकट का हल निकालने के तरीक़ों पर चर्चा करना था.

भारत में यूएन की रेज़ीडेंट कोऑर्डिनेटर रेनाटा डेज़ालिएन से जब पूछा गया कि जलवायु संकट से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्याप्त क़दम क्यों नहीं उठा रहा है तो उन्होंने कहा, “यूएन कोई विश्व पुलिस नहीं है. यूएन एक विश्व सरकार भी नहीं है. इसलिए संयुक्त राष्ट्र के लिए तय अधिकार और क्षमता सीमित है. असल में हम कई मोर्चों पर अपनी सीमाओं से परे जाकर काम कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के बारे में बताने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा ये है कि हम दुनिया को राज़ी करने के काम में जुटे हैं – लोगों को बुनियादी रूप से सही बात के लिए राज़ी करना.”

उन्होंने ध्यान दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विज्ञान को सामने लाने में अग्रणी भूमिका निभाई है.

“1988 में जब जलवायु परिवर्तन में किसी की दिलचस्पी नहीं थी, तब और उसके बाद हर पॉंच साल पर संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन पर एक पैनल की स्थापना की. अब इस मामले में विज्ञान स्पष्ट है और एक अंतर-सरकारी निकाय के तौर पर हम देशों को एक साथ लाते हैं ताकि वैज्ञानिक तौर पर परखी जा चुकी इस चुनौती का समाधान तलाश किया जा सके.”

UN India/Yangerla Jamir
बाएं से दाएं: संचालक और ऑब्ज़र्वर रीसर्च फ़ाउंडेशन के प्रमुख समीर सरन; आगा खां रूरल सपोर्ट प्रोग्रैम के सीईओ अपूर्व ओज़ा; सौर ऊर्जा इनोवेटर सोनम वांगचुक; यूएन रेज़ीडेंट कोऑर्डिनेटर रेनाटा डेज़ालिएन.

जलवायु संकट से बुरी तरह प्रभावित लद्दाख़ क्षेत्र में रह रहे लोगों की हैरान कर देने वाले अनुभव भी इस सत्र में सुने गए.  

सौर ऊर्जा के क्षेत्र में नवाचार लाने वाले शिक्षाविद और लद्दाख़ में ‘हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑल्टरनेटिव्स’ के प्रबंध निदेशक सोनम वांगचुक ने बताया, “हिमालय के पहाड़ों में, विशेषकर लद्दाख़ में, हमारे ग्लेशियर पिघल रहे हैं. और वैसे तो हमें हमेशा पानी की कमी रही है, अब हम वसंत के मौसम में भी सूखे का सामना कर रहे हैं.”

“मैं ऐसे दो गॉंवों को जानता हूं जहां लोगों को पानी की वजह से पूरा गॉंव खाली करना पड़ा. सूखे के साथ पतझड़ में अचानक बाढ़ भी आती है. 2006 में अचानक आई बाढ़ में एक गॉंव बह गया था जिसमें कई लोगों की मौत हुई थी. मैंने वॉलंटियर के तौर पर काम करते हुए लोगों से पूछा कि आख़िरी बार अचानक बाढ़ कब आई थी तो उन्हें याद नहीं था.”

“उसी गॉंव में फिर से 2010, 2015 और 2017 में अचानक बाढ़ आई इसलिए अब यह अक्सर हो रहा है.”

उन्होंने मैदानी क्षेत्रों और शहरों में रह रहे लोगों से ज़िम्मेदार बनने और सरल जीवन जीने की अपील की है ताकि पहाड़ों में रहने वाले लोग जीवित तो रह पाएं.

आजीविका बदलने की मजबूरी

ऑनलाइन जर्नल ‘परी’ की प्रबंध संपादक नमिता वायकर आगामी यूएनडीपी मानव विकास रिपोर्ट के लिए जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से संवेदशनील समुदायों की व्यथा-कथा को आकार दे रही हैं.

उन्होंने बताया कि तटीय इलाक़ों में रहे लोगों को प्रत्यक्ष रूप से कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

“तमिलनाडु में ऐसे समुदाय हैं जहां समुद्री शैवाल पर निर्भर किसानों को अपनी आजीविका बदलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि समुद्री शैवाल अब लुप्त हो रहे हैं. इसी तरह दिल्ली जैसी जगह पर, मछुआरे मृत मछलियों को पकड़ रहे हैं. उन्होंने मुझे जो बताया वह हृदय-विदारक था.”

“इसलिए सीवर और औद्योगिक कचरे को जलाशयों से दूर रखने के लिए तत्काल मानवीय हस्तक्षेप की ज़रूरत है. एक और मछुआरे ने मुझे बताया कि पहले वे कुछ ऐसी मछलियाँ पकड़ा करते थे जो अब सिर्फ़ डिस्कवरी चैनल पर ही दिखाई देती हैं. यह उदाहरण स्थिति की गंभीरता को बयान करता है.”

UN India/Yangerla Jamir
बाएं से दाएं: यूएन रेज़ीडेंट कोऑर्डिनेटर रेनाटा डेज़ालिएन; ऑनलाइन जर्नल परी की प्रबंध संपादक नमिता वायकर; लेखिका व फ़िल्मकार शुभांगी स्वरूप; अभिनेत्री व एसडीजी एडवोकेट दीया मिर्ज़ा.

लेखिका और फ़िल्मकार शुभांगी स्वरूप अपनी कहानियों में जलवायु परिवर्तन की थीम को पिरोती हैं और उनका मानना है कि कला के ज़रिए पारिस्थितिकी तंत्रों की मदद की जा सकती है.

“हमारी कहानियों में प्रकृति और ब्रह्मांड की अहमियत को नहीं देखा जाता है. इसलिए मैंने एक उपन्यास लिखने का प्रयास किया जिसमें भूगर्भीय दरार वृतान्त का हिस्सा है. यह अन्डमान से शुरू होकर, म्यॉंमार, नेपाल तक जाता है और लद्दाख़ में इसका अंत होता है. मैंने कहानी बताते समय महसूस किया कि स्थानीय मुद्दों का हल निकालते समय राजनैतिक सीमाएं कितनी बकवास है.”

जलवायु और आजीविका?

आगा खॉं रूरल सपोर्ट प्रोग्रैम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अपूर्व ओज़ा ने जलवायु परिवर्तन के प्रयासों से अर्थशास्त्र और मुनाफ़े को बाहर निकालने की पैरवी की.

“हर बात को आर्थिक नज़रिए से मापने पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित है. मैं जब किसी प्रस्ताव को लिखता हूँ तो पूछा जाता है कि क्या इससे किसानों की आय दोगुनी होगी. मैं सिर्फ़ यही कह सकता हूं कि इससे प्रकृति की रक्षा होगी, पर्यावरण बनाए रखा जा सकेगा और भूजल का दोहन नहीं किया जाएगा. लेकिन मैं यह गारंटी नहीं दे सकता कि उनकी आय दोगुनी हो जाएगी. मैं सिर्फ़ उनकी प्रगति की गारंटी दे सकता हूं.”

सत्र के दौरान प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेत्री और टिकाऊ विकास पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त पैरोकार दीया मिर्ज़ा ने लोगों से पूछा, “क्या आपके पास समय है? हमारे पास महज़ एक दशक है. महिलाओं को सुनिए, माताओं को सुनिए, बच्चों को सुनिए. और अगर आप विज्ञान को नहीं समझते तो प्रकृति को देखिए.”

संदेश स्पष्ट था: पर्यावरण के नज़रिए से टिकाऊ विश्व का निर्माण सभी की ज़िम्मेदारी है – और कला व सांस्कृतिक सैक्टर इसका अपवाद नहीं हैं.

थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रीसर्च फॉउंडेशन के प्रमुख और सत्र का संचालन करने वाले समीर सरन ने कहा कि अगर जलवायु परिवर्तन का मुद्दा कहानियों का हिस्सा बनता है तो इस चुनौती से निपटने के लिए कारगर क़दम उठाने की प्रेरणा मिलेगी. “हम अपने बारे मे जो कहानी कहते हैं वह हमारी कार्रवाई को निर्धारित करती है. और अगर हमारी कहानियां हरित हैं तो हमारा भविष्य भी हरित और समृद्ध होगा.”

जयपुर में पांच दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में हर साल दो हज़ार से ज़्यादा वक्ता और चार लाख से ज़्यादा पुस्तक प्रेमी शिरकत करते हैं.

इस महोत्सव के 13वें संस्करण में नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बैनर्जी, पुलित्ज़र विजेता फ़ोरेस्ट गैन्डर, पत्रकार क्रिस्टीना लैंब, न्यूयॉर्कर के पत्रकार डैक्स्टर फ़िलकिन्स, मैन बुकर पुरस्कार विजेता हॉवर्ड जैकबसन और शशि थरूर व जावेद अख़्तर सहित अन्य लोकप्रिय भारतीय लेखकों ने विचारों के आदान-प्रदान और संवाद में हिस्सा लिया.

 

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