युद्धापराध के आरोपों की जांच जवाबदेही तय करने में 'एक अहम क़दम'

31 दिसम्बर 2019

संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ माइकल लिन्क ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) के उस फ़ैसले का स्वागत किया है जिसमें फ़लस्तीन में कथित युद्धापराधों की आपराधिक जांच पर विचार करने की बात कही गई है. यूएन विशेषज्ञ ने कहा कि पांच दशक से फ़लस्तीनी इलाक़ों पर चले आ रहे इसराइली क़ब्ज़े की जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया में यह एक बेहद महत्वपूर्ण क़दम होगा. 

विशेष रैपोर्टेयर ने स्पष्ट किया कि आईसीसी अभियोजक चरमपंथी संगठन हमास और अन्य फ़लस्तीनी हथियारबंद गुटों पर मानवता के ख़िलाफ़ अपराध के आरोपों की भी जांच करना चाहती हैं.

क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़ों में मानवाधिकारों की स्थिति पर विशेष रैपोर्टेयर माइकल लिन्क ने बताया कि, “52 साल से जारी क़ब्ज़े में जवाबदेही मोटे तौर पर अब तक तय नहीं हो पाई है.”

20 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) की शीर्ष अभियोजक फ़ेतू बेनसूदा ने संतुष्टि जताई थी कि फ़लस्तीन में हालात पर जांच आगे बढ़ाने के लिए ठोस आधार है.

विशेष रैपोर्टेयर के मुताबिक़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने वैसे तो संयुक्त राष्ट्र के सैकड़ों प्रस्तावों को  पारित कर फ़लस्तीनी इलाक़ों में इसराइली क़ब्ज़े की निंदा की है लेकिन आलोचना से अलग इसराइल को इसके नतीजे नहीं भुगतने पड़े हैं.

“अब जवाबदेही की संभावना क्षितिज पर अंतत: दिखाई दे रही है.”

“एक ऐसी दुनिया में जहां मानवाधिकारों और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए समर्पण भाव हो, वहां यह ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय आईसीसी अभियोजन के जांच आगे बढ़ाने के निर्णय का समर्थन करे न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र संबंधी मुद्दे पर प्री-ट्रायल चैम्बर से अनुकूल आदेश की मांग करे.”  

आईसीसी अभियोजक बेनसूदा पिछले पांच साल से वर्ष 2014 में ग़ाज़ा में कार्रवाई, ग़ाज़ा सीमा के पास प्रदर्शनकारियों की मौत सहित अन्य मामलों की शुरुआती पड़ताल के दौरान जुटाए गए तथ्यों को परखती रही हैं.

फ़तू बेनसूदा का कहना है कि औपचारिक जांच से पहले वह प्री-ट्रायल चैम्बर से एक आदेश का आग्रह करेंगी ताकि इस बात की पुष्टि हो सके कि पश्चिमी तट, पूर्वी येरुशलम और ग़ाज़ा उसके अधिकार क्षेत्र में आता है.

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने माना कि इस विषय में न्याय का पहिया बेहद धीमी गति से आगे बढ़ा है और न्याय मिलने में देरी, न्याय ना मिलने जैसा है.

साथ ही उन्होंने प्री-ट्रायल चैम्बर से न्यायिक अधिकार-क्षेत्र का मुद्दा जल्द से जल्द सुलझाने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा कि अगर युद्धापराधों के आरोपों की जांच अगर औपचारिक रूप से शुरु की जाती है तो फिर इस जांच को त्वरित ढंग से आगे बढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए.

उनके मुताबिक़ यह इसलिए भी ज़रूरी है ताकि हिंसक संघर्ष के पीड़ितों को उनके जीवनकाल में न्याय मिल पाए.

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं.

 

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