ख़सरा के बढ़ते मामलों से बढ़ती चिंता

5 दिसम्बर 2019

विश्व भर में ख़सरा के कारण वर्ष 2018 में एक लाख 40 हज़ार से ज़्यादा मौतें हुई हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने आशंका जताई है कि 2019 में इस बीमारी से होने वाली मौतों और संक्रमण के मामले पिछले साल की तुलना में कहीं अधिक हो सकते हैं. यूएन एजेंसी के मुताबिक़ विश्व की जनसंख्या में वैक्सीन कवरेज 95 फ़ीसदी से कम रहने पर बीमारी के व्यापक रूप से फैलने का जोखिम बना रहेगा.  

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक़ टीकाकरण के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर फैलाई गई भ्रांतियों का असर ख़सरा के बढ़ते मामलों के रूप में सामने आया है.

प्रशांत द्वीपीय देश समोआ में स्थानीय जनसंख्या के महज़ 31 फ़ीसदी हिस्से के पास ही बीमारी से बचने के लिए प्रतिरक्षा क्षमता है.

समोआ में हालात एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा कर रहे हैं – अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर भारी बोझ है और ज़रूरतमंदों का उपचार करने में वे संघर्ष कर रहे हैं.

विशेष रूप से पांच साल से कम उम्र के बच्चों ख़तरे के अलावा मुधुमेह जैसी लंबी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए भी जोखिम बढ़ गया है.

अब तक 60 से ज़्यादा लोगों की मौतें होने की ख़बर है जिनमें अधिकतर नवजात शिशु और बच्चे हैं.

इस बीमारी के व्यापक रूप से फैलने के बाद से अब तक 4,200 से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं.

गुरुवार को सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर कामबंदी की घोषणा की है ताकि पहले सभी के लिए सामूहिक टीकाकरण का अभियान पूरा किया जा सके.

विश्व स्वास्थ्य संगठन में निदेशक डॉक्टर केट ओब्रायन ने बताया, “सोशल मीडिया में ग़लत सूचनाओं के फैलने से बच्चों के टीकाकरण के विषय में अभिभावकों के फ़ैसले प्रभावित हो रहे हैं. और इसका प्रभाव यह है कि बच्चे ख़सरा का शिकार हो रहे हैं और उनमें से कुछ की मौत हो रही है.”

एक ‘सामूहिक विफलता’

“हम सभी को पता है कि ख़सरा की रोकथाम के लिए सुरक्षित, प्रभावी, क़िफ़ायती और व्यापक रूप से उपलब्ध एक वैक्सीन है और इसका उपयोग पिछले 50 सालों से हो रहा है."

"करोड़ों लोगों को यह टीका लगाया गया है और यह एक सामूहिक विफलता ही है कि अब इतने बड़े पैमाने पर ये बीमारी फैल रही है, और ख़सरा के मामलों व उससे होने वाली मौतों की संख्या बढ़ रही है. इसकी एक वजह यह है कि लोगों को वैक्सीन नहीं मिली.”

वैश्विक स्तर पर ख़सरे से बचाव के लिए टीकाकरण की कवरेज का औसत 86 फ़ीसदी है. वर्ष 2000 में यह 72 प्रतिशत था और टीकाकरण का दायरा बढ़ने से माना जाता है कि दो करोड़ से ज़्यादा जिंदगियाँ बचाने में मदद मिली है.

इस सदी की शुरुआत से लेकर वर्ष 2018 तक ख़सरे से प्रतिवर्ष होने वाली मौतों की संख्या पांच लाख 35 हज़ार से घटकर लगभग एक लाख 42 हज़ार रह गई है जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जाता है.

लेकिन पिछले एक दशक में वैक्सीन कवरेज को बेहतर बनाने में कम ही प्रगति हुई है.

डॉक्टर ओब्रायन का कहना है कि हम एक ऐसे रास्ते पर हैं जो ग़लत दिशा में जा रहा है. “यह सिर्फ़ 2018 की बात नहीं है. हम वर्ष 2019 में भी ऐसे मामलों की संख्या में वृद्धि देख रहे हैं जो 2018 की संख्या को पार कर जाएंगे.”

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के ताज़ा आंकड़े दर्शाते हैं कि ख़सरा के संदिग्ध और पुष्ट मामलों की संख्या 2019 में 2018 की तुलना में ज़्यादा है.

डॉक्टर ओब्रायन ने ज़ोर देकर कहा कि बीमारी के फैलने के बाद उससे निपटने के बजाय ज़रूरी टीकाकरण कार्यक्रमों को मज़बूत बनाना होगा ताकि ऐसे हालात हर महीने या साल बार-बार ना देखने पड़ें.

इस चुनौती से निपटने के लिए असरदार टीकाकरण कार्यक्रमों की सुनिश्चितता ज़रूरी है. इस वैक्सीन की दो ख़ुराक दी जाती है जिनमें पहली नवजात शिशु को जल्द से जल्द देनी होती है.

स्वास्थ्य संगठन ने आगाह किया है कि कुछ दो देशों में दूसरी ख़ुराक वाली नीति नहीं है और इसलिए राष्ट्रीय प्रतिरक्षा कार्यक्रमों में वैश्विक मानकों के अनुरूप इसका पालन करने की अपील की गई है.

बताया गया है कि इससे ख़सरा के ख़िलाफ़ सामुदायिक स्तर पर प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करने में मदद मिलेगी.

ख़सरा से मुख्य रूप से ग़रीब लोग बहुत ज़्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि ये कुपोषित व कमज़ोर रोग प्रतिरोधी क्षमता वाले बच्चों को ज़्यादा चपेट में लेती है. 

ख़सरा की वजह से बहुत सी स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएँ भी हो जाती हैं जिनमें अंधापन, एनसेफ़लाइटिस, डायरिया, कानों का संक्रमण और न्यूमोनिया भी शामिल हैं. 

विश्व में ख़सरा के कारण होने वाली मौतों की संख्या में वर्ष 2000 के बाद से गिरावट आई है लेकिन अब भी अधिकतर मामले उन देशों में सामने आते हैं जहां बच्चों को वैक्सीन नहीं दी जाती.

सब-सहारा अफ़्रीकी देशों में यह समस्या ख़ासतौर पर देखने को मिलती है.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक़ वर्ष 2018 में इस बीमारी के सबसे ज़्यादा मामले काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य, लाइबेरिया, मैडागास्कर, सोमालिया और यूक्रेन में देखने को मिले.

लेकिन ग़रीब देशों के अलावा अब अमीर देशों में भी यह बीमारी सिर उठा रही है.

इस बार अमेरिका में बीमारी के मामले पिछले 25 सालों में सबसे ज़्यादा हैं, साथ ही टेन, अल्बानिया और ग्रीस जैसे योरोपीय देशों में नए मामले सामने आए हैं.

 

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