4 दिसम्बर 2019

बिजली की सर्व उपलब्धता ने दुनिया बदल दी है, इससे देशों की अर्थव्यवस्थाएं विकसित हुईं हैं और लाखों लोग ग़रीबी के चंगुल से बाहर निकले हैं. हालांकि इस सफलता की एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है - जीवाश्म ईंधन पर बहुत अधिक निर्भर ऊर्जा क्षेत्र वैश्विक कार्बन डायऑक्साइड उत्सर्जन के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से  के लिए ज़िम्मेदार है. ये उन ग्रीनहाउस गैसों में से एक है जो वायुमंडल में गर्मी को क़ैद करके पृथ्वी को गर्म करती हैं - और इसका लगभग दो - तिहाई उत्सर्जन कोयले से आता है.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र के जीवाश्म ईंधन को समाप्त करने के आहवान के बावजूद, सैकड़ों नए कोयला-आधारित बिजली संयत्र अब भी बनाए जा रहे हैं. क्या दुनिया सभी के लिए स्वच्छ, सस्ती और सुलभ ऊर्जा के नए युग के लिए तैयार है?

कोयले का इस्तेमाल करना छोडें

संयुक्त राष्ट्र सभी देशों से कोयले पर निर्भरता समाप्त करने के लिए दबाव बनाने में लगा है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने हाल की घोषणाओं में संगठन की स्थिति को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है. 

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने कहा है कि अगर हम जलवायु संकट समाप्त करने का अवसर चाहते हैं तो कार्बन उत्सर्जन पर टैक्स लगाने होंगे. साथ ही जीवाश्म ईंधन के लिए ख़रबों डॉलर सब्सिडी ख़त्म करना और 2020 तक कोयले से चलने वाले बिजलीघरों का निर्माण बंद करना होगा. 

कई देशों, विशेष रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने संयुक्त राष्ट्र की सलाह पर काम करना शुरू किया है. लेकिन दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते आर्थिक क्षेत्रों में से एक - दक्षिण-पूर्व एशिया अब भी अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है.

नवंबर में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने थाईलैंड में आसियान (एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस) समूह की एक बैठक में कहा था, "जलवायु परिवर्तन के संबंध में कोयला एक बड़ा ख़तरा बना हुआ है."

उन्होंने कहा कि ख़ासतौर पर दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा ख़तरा है.

एशियाई विकास में अब भी कोयले की अहम भूमिका है

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अध्ययनों के अनुसार, अगले 20 वर्षों में इस क्षेत्र के विश्व ऊर्जा चलन का एक प्रमुख मापदण्ड बनने की उम्मीद है. वर्ष 2000 के बाद से दक्षिण पूर्व एशिया में लाखों लोगों तक बिजली पहुंची है और 2030 तक इस क्षेत्र में पूरी तरह बिजली पहुंच जाने की उम्मीद है. 

संयुक्त राष्ट्र समर्थित ‘सभी के लिए टिकाऊ ऊर्जा' (SEforALL) द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक चीन और भारत के बाद दक्षिण पूर्व एशिया में तीसरे सबसे अधिक कोयला बिजली संयंत्र बन रहे हैं.

सभी दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की तुलना में इंडोनेशिया, वियतनाम और फिलीपींस में सबसे बड़ी कोयला संयंत्र पाइपलाइन हैं और इस दौड़ में मलेशिया और थाईलैंड भी बहुत पीछे नहीं हैं.

धनी एशियाई देश भी अपनी सीमाओं के पार कोयला भेज रहे हैं: चीन, जापान, और दक्षिण कोरिया में राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियां दूसरे देशों के कोयला संयंत्रों के लिए धन का सबसे बड़ा स्रोत बनी हुईं हैं: ‘सस्टेनेबल एनर्जी फॉर ऑल’ के शोध से पता चलता है कि कोयले के लिए वित्त का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय स्रोत चीन था और 2015 व 2016 में चीन ने इस क्षेत्र में 1 अरब 70 करोड़ डॉलर से अधिक का वित्त-पोषण किया था.

कम हो रही है कोयले की ताक़त

फिर भी, धीरे-धीरे दुनिया सही दिशा में आगे बढ़ रही है और भविष्य में बनने वाले संयंत्रों की तादाद कम हो रही है. नए कोयला संयंत्रों को मिलने वाले परमिट की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर घटी है और एक हजार से अधिक तो रद्द हो गए हैं.

इससे ज़ाहिर होता है कि कोयला संयंत्रों का निर्माण करने वालों के लिए आर्थिक माहौल कठिन हो रहा है और वैश्विक तापमान वृद्धि यानी ग्लोबल वार्मिंग से निपटने और मानव स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सहमति बन रही है. 

संयुक्त राष्ट्र के एक प्रमुख जलवायु सम्मेलन में देशों ने ग्लोबल वार्मिंग को औद्योगिक युग से पहले के तापमान से ऊपर 1.5°C तक सीमित करने और जलवायु कार्रवाई के लिए वित्तपोषण को बढ़ावा देने के लिए पेरिस समझौते के तहत प्रतिबद्धता ज़ाहिर की थी.

इसके चार साल बाद सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने न्यूयॉर्क में जलवायु कार्रवाई सम्मेलन बुलाया, जहां कई देशों ने जलवायु संकट से निपटने के लिए अतिरिक्त उपायों की घोषणा की.

इनमें कोयला आधारित स्रोतों से उत्पादित बिजली की मात्रा पर सीमाएं लगाना भी शामिल है.

उदाहरण के लिए, अगले कुछ वर्षों में ब्रिटेन में कोयले का इस्तेमाल पूरी तरह ख़त्म होने की उम्मीद है.

दुनिया में कोयले के सबसे बड़े उपयोगकर्ताओं में से एक जर्मनी ने भी 2038 तक इसे बंद करने के लिए सहमति दे दी है.

इसके अलावा योरोपीय संघ के आठ अन्य देशों ने भी वर्ष 2030 के अंत तक कोयले से किनारा कर लेने की घोषणा की है. चिली ने कोयले से चलने वाले अपने सभी बिजली संयत्रों को 2040 तक बंद करने का वादा किया है और उम्मीद है कि दक्षिण कोरिया भी 2022 तक 10 संयंत्र बंद कर देगा.

इस सम्मेलन में 32 देशों, 25 क्षेत्रीय, प्रांतीय और नगरपालिका स्तर की सरकारों व प्रशासनों और 34 व्यावसायिक सदस्यों से बने एक "पावरिंग पास्ट कोल अलायंस" ने जर्मनी और स्लोवाकिया सहित उन नए सदस्यों की घोषणा की जो कोयले से स्वच्छ ऊर्जा के बदलाव को गति देने और कोयला उपयोग पर अंकुश लगाने के वैश्विक प्रयासों का नेतृत्व करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. 

आशा की किरण 

इसके अलावा, ज़्यादा से ज़्यादा देशों और व्यवसायों ने स्वीकार किया है कि अक्षय ऊर्जा का उपयोग न केवल पृथ्वी के लिए उचित है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी लाभदायक है. 

कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ विकल्पों में बदलाव की तक़नीकें पहले से मौजूद हैं.

इससे वो 84 करोड़ लोग भी लाभ उठाएंगे जो आज भी बिजली और स्वच्छ व अक्षय ऊर्जा स्रोतों से वंचित हैं. फिर ये सस्ती भी हैं. 

SEforALL की रीसर्च से पता चलता है कि दुनिया के दो तिहाई हिस्से में अक्षय ऊर्जा बिजली उत्पादन का सबसे सस्ता स्त्रोत बन गया है - नए कोयले और नई प्राकृतिक गैस, दोनों से सस्ता. 2030 तक, लगभग हर जगह वायु और सौर ऊर्जा, कोयला और गैस की जगह ले लेगी. 

कथनी और करनी में तालमेल नहीं

हालांकि, कोयले के उपयोग में कमी और नवीनीकरण के उपयोग में वृद्धि के साथ, स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बदलाव में पर्याप्त तेज़ी नहीं आ रही है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और अनुसंधान भागीदारों के सहयोग से तैयार अपनी तरह की पहली रिपोर्ट - 2019 प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट में कहा गया है कि अब भी देशों की जलवायु प्रतिबद्धताओं और जीवाश्म ईंधन के उनके नियोजित उत्पादन के बीच एक बड़ा अंतर है. 

कोयले के संबंध में ये अंतर सबसे बड़ा है: 2030 तक कई देश तापमान 2°C तक सीमित करने के लिए ज़रूरी उत्पादन से 150% अधिक कोयले का उत्पादन करने की योजना बना रहे हैं.

ये 1.5°C तापमान सीमित करने से तीन गुना अधिक है. 

ये रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले संगठनों में से एक स्टॉकहोम पर्यावरण संस्थान के प्रमुख, मॉन्स निल्सन ने कहा, "जलवायु नीति बनाने के दो दशकों से ज़्यादा बीतने के बावजूद, जीवाश्म ईंधन का उत्पादन स्तर पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है."

एक प्रेस रिलीज़ में उन्होंने कहा, “इस रिपोर्ट से पता चलता है कि समस्या का एक बड़ा हिस्सा ये है कि सरकारें अब भी कोयला, तेल और गैस निष्कर्षण का समर्थन कर रहीं हैं. हम बिल्कुल गर्त में पहुंच चुके हैं – अब और ज़्यादा नीचे जाने की गुंजाइश नहीं बची है.”

2020 में, संयुक्त राष्ट्र ने टिकाऊ विकास के लिए 2030 एजेंडा के लक्ष्य प्राप्त करने के प्रयासों को गति देने के लिए एक दशक की कार्रवाई शुरू की.

जब ऊर्जा की बात आती है, तो सभी के लिए सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा सुनिश्चित करना लक्ष्य होता है. फिलहाल, संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के लिए चुनौती ये है कि वो तेज़ी से नवीनीकरण की दिशा में क़दम बढ़ाएं और हमेशा के लिए कोयले के इस्तेमाल की आदत छोड़ दें. 

 

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