भारत में नीले रंग में सराबोर होकर मनाया गया बाल दिवस

27 नवंबर 2019

विश्व बाल दिवस पर पूरे भारत में युवाओं और बच्चों के साथ आयोजित विशेष कार्यक्रमों के अलावा, देश की प्रमुख इमारतों को ‘ब्लू’ यानी नीला करके बाल अधिकारों के लिए प्रतिबद्धता जताई गई.  बुधवार  20 नवंबर को विश्व बाल दिवस और संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा बाल अधिकार कन्वेंशन को अपनाए जाने के 30 वर्ष पूरे होने पर, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) ने भारत में कई कार्यक्रम आयोजित किए. 

यूनीसेफ़ के समारोह की शुरुआत हुई - भारतीय संसद में देश के प्रत्येक बच्चे के लिए राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन के साथ. इसमें देश भर से बाल सांसद और बालाधिकारों के पैरोकारों ने शिरकत की.  

ये सभी बाल सांसद और बालाधिकार पैरोकार, राष्ट्रीय बाल अधिकार अभियान - "नाइन इज़ माइन" का हिस्सा हैं. इन बच्चों ने बाल अधिकारों के रक्षक और चैंपियन के रूप में अपने अनुभव बांटे और ख़ास इस मौके के लिए रचा गया एक बालाधिकार रैप गीत गाया.

© UNICEF/UNI228993/India Country Office
20 नवंबर 2019 को विश्व बाल दिवस भारत में भी नीले रंग में सराबोर होकर मनाया गया. बाल अधिकार संधि के 30 वर्ष पूरे होने के विषय पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए.

 बच्चों के लिए इस वैश्विक कार्रवाई के वादे के प्रति अपनी वचनबद्धता ज़ाहिर करने के लिए भारत में राज्य सरकारों, नागरिक समाज, समुदाय के नेताओं और विशेष रूप से बच्चों और युवाओं ने यूनीसेफ़ के साथ मिलकर जश्न मनाया.

इस अवसर पर बच्चों के अधिकारों को समर्थन देने के लिए देश की ऐतिहासिक इमारतों और स्मारकों को ‘ब्लू’ यानी नीले रंग से सराबोर किया गया.

भारत में यूनीसेफ़ की प्रतिनिधि डॉक्टर यासमीन अली हक़ ने कहा, "विश्व बाल दिवस आनन्द का दिन है जो एक गंभीर संदेश भी देता है. भारत और दुनिया भर में बच्चे अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं. विश्व बाल दिवस पर वो हमसे पूछ रहे हैं, “आप क्या करेंगे?”

इस वर्ष विश्व बाल दिवस बहुत ख़ास है क्योंकि इस दिन उस ऐतिहासिक घटना के 30 साल पूरे हुए हैं जब विश्व के सभी नेताओं ने समान उद्देश्य से एकजुट होकर बाल अधिकार कन्वेंशन (सीआरसी) अपनाया था.

ये बाल विकास और अधिकारों पर एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिससे दुनिया के लाखों बच्चों का जीवन बदलने में मदद मिली है.

भारत ने 1992 में सीआरसी की पुष्टि की थी और इसके बाद से ही देश में कई सुधारों के ज़रिए बच्चों को उनका अधिकार दिलाने के क्षेत्र में काफ़ी प्रगति हुई है.

उदाहरण के लिए:

1990 के दशक की तुलना में अधिक लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा मिल रही है. इन स्कूलों में 1990 में लड़कियों की उपस्थिति दर 6 -10 प्रतिशत से बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई है. 

"भारत जद्दोजहद कर रहा है और कठिन लड़ाई जीत रहा है - जैसे कि बच्चों की जीवन दर में सुधार, लाखों लोगों का ग़रीबी उन्मूलन और ये सुनिश्चित करना कि अब पहले से कहीं अधिक बच्चे स्कूल जाएं," डॉ. यास्मीन अली हक़ के शब्द.

"ये उपलब्धियां इसका प्रमाण हैं कि जहां राजनैतिक इच्छाशक्ति, लोगों का समर्थन और सामूहिक दृढ़ संकल्प हैं, वहां बच्चों के जीवन में सुधार होता है. लेकिन जहां हम बच्चों के लिए इस बड़ी जीत का जश्न मना रहे हैं, वहीं हमें ये भी याद रखना चाहिए कि अभी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है.”

तीस साल हो गए हैं लेकिन बाल अधिकार नहीं बदले हैं, उनकी कोई समाप्ति तिथि नहीं है. लेकिन बचपन बदल गया है.

दुनिया में तेज़ी से पर्यावरण और तकनीकी परिवर्तन आने के कारण बच्चों को अब नए ख़तरों से जूझना पड़ रहा है. 1989 में कोई विश्वव्यापी वेब नहीं था, जलवायु परिवर्तन को पूरी तरह से समझा नहीं गया था और आबादी को विस्थापित करने वाले संघर्ष बहुत ही कम थे.

भारत में यूनीसेफ़, नागरिक समाज और समुदायों व सरकार के साथ सभी स्तरों पर काम करता है. साथ ही, बाल अधिकारों की लगातार सामने आती चुनौतियों से निपटने के लिए ख़ुद युवा और बच्चे, ख़ासतौर पर सबसे ग़रीब और कमज़ोर तबके के लोगों को शामिल करता है. लाखों बच्चे आज भी स्वास्थ्य देखभाल, पोषण, शिक्षा और हिंसा से सुरक्षा से वंचित हैं.

कुपोषण, स्टंटिंग (नाटापन) और एनीमिया अब भी भारत के बच्चों के लिए एक बड़ी समस्या है. भारत में हर साल पैदा होने वाले एक करोड़ बच्चों का बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण नहीं होता. 

  • साठ लाख बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और जो स्कूल में हैं भी, उन्हें भी निम्न स्तर की शिक्षा ही प्राप्त है.
  • जन्म से ही लड़कियों को बुनियादी स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
  • बाल विवाह व्यापक है और हर साल लगभग डेढ़ करोड़ लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में ही कर दिया जाता है.

 डॉक्टर यासमीन अली हक़ ने कहा, "ये ज़रूरी है कि राष्ट्रीय नेता बच्चों और युवाओं से सीधे उनके अनुभवों के बारे में सुनें जो बाल अधिकारों के रक्षक हैं. उनकी मांग है कि हर बच्चे की बात सुनी जाए और भारत में कोई भी बच्चा पीछे न रहे."

यूनीसेफ़ हर व्यक्ति को बाल अधिकारों के लिए अपना समर्थन दिखाने के लिए प्रतिज्ञा लेने हेतु आमंत्रित कर रहा है कि वो जागरूक होकर बाल अधिकारों के लिए छोटे क़दम उठाएं.

शिक्षा, लिंग समानता, स्वच्छता और पीने के पानी तक पहुंच, बाल श्रम और बाल विवाह की समाप्ति हर बच्चे का मूल अधिकार है.

पूरे भारत में लोग ऑनलाइन जाकर बाल अधिकारों के लिए प्रतिबद्धता दर्ज करा रहे हैं. आप भी https://help.unicef.in/childrights पर अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर कर सकते हैं.   

भारत में विश्व बाल दिवस की गतिविधियां

 ‘गांधीवादी चुनौती ’के तीस विजेताओं के नाम विश्व बाल दिवस पर घोषित किए गए. इनमें कक्षा 6-12 के 3800 से अधिक छात्रों और लगभग तीन हज़ार अटल टिंकरिंग लैब स्कूल के छात्रों ने भाग लेकर दो श्रेणियों में प्रविष्टियाँ दीं – ‘आर्ट एंड इनोवेशन’ और 'विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार.'

नीति आयोग के सहयोग से आयोजित इस प्रतिस्पर्धा में युवाओं को विश्व चुनौतियों के समाधान के लिए गांधीवादी सिद्धांतों से प्रेरित समाधान बनाने थे.

यूनीसेफ़ ने भारत सरकार के साथ मिलकर देश भर के युवाओं और नागरिकों को एक ऑनलाइन क्विज़ के माध्यम से बाल अधिकारों के बारे में अधिक जागरूक करने के प्रयास किया. 

यूनीसेफ़ सीआरसी कार्यशालाओं के माध्यम से भारत के विश्वविद्यालयों के 15 से अधिक पत्रकारिता कॉलेजों से मास कम्युनिकेशन के छात्रों और शिक्षकों को आकर्षित कर रहा है, ताकि मीडिया को बाल अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मज़बूत किया जा सके.

अनेक विश्व विद्यालयों ने इन कार्यशालाओं में शिरकत की जिनमें इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय - इग्नू, भारतीय जनसंचार संस्थान,  मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी और दिल्ली विश्वविद्यालय शामिल थे.

 

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