'विविधता एक संपदा है, नाकि विभाजन की वजह'

15 नवंबर 2019

एक ऐसे दौर में जब चरमपंथ और कट्टरता के मामले ज़्यादा दिखाई दे रहे हैं, जब “नफ़रता का विष” मानवता के एक हिस्से में ज़हर घोल रहा है, उस समय में सहिष्णुता की भूमिका बेहद आवश्यक हो गई है. संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक संस्था - यूनेस्को की प्रमुख ने ‘अंतरराष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस’ पर जारी अपने संदेश में यह बात कही है.

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की महानिदेशक ऑड्री अज़ोले ने अपने संदेश मे कहा है कि, “सहिष्णुता का अर्थ महज़ सुस्ती से खड़े रहने या पुरुषों, महिलाओं, संस्कृतियों और आस्थाओं में भिन्नताओं के प्रति असंवेदनशील बने रहने भर से कहीं ज़्यादा है.” उनके मुताबिक़ यह एक मानसिक अवस्था है, एक जागरूकता और ज़रूरत है.

वर्ष 1996 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सदस्य देशों को हर वर्ष 16 नवंबर को ‘अंतरराष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस’ दिवस मनाने का सुझाव दिया था जिसका उद्देश्य संस्कृतियों व समुदायों में आपसी समझ को बढ़ावा देना था.

अज़ोले ने ज़ोर देकर कहा कि सहिष्णुता का अर्थ “यह समझना है कि सांस्कृतिक विविधता संपदा का ही एक स्वरूप है, विभाजन का कारक नहीं.”

इसके तहत यह समझा जाना होगा कि अपने तात्कालिक और प्रतीत होने वाले मतभेदों से परे हर संस्कृति, सार्वभौमिकता का एक घटक है और मानवता की साझा ज़ुबान है.

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफ़ी अन्नान के शब्दों को दोहराते हुए कहा कि सहिष्णुता एक ऐसा गुण जो शांति को संभव बनाता है.

अपनी स्थापना के समय से ही यूनेस्को का लक्ष्य “अक्सर समाजों को तबाह करने वाली असहिष्णुता से निपट कर शांति निर्माण करने का रहा है.”

यूनेस्को हर प्रकार के नस्लवाद और भेदभाव से लड़ाई कर इस लक्ष्य को हासिल करने के प्रयासों में जुटा है.

यूनेस्को प्रमुख ने अपने संदेश में सभी से सहिष्णुता और शांति के संदेश का प्रसार करने की पुकार लगाई.

असहिष्णुता से लड़ाई में ज़रूरी बातें:

  • क़ानून: मानवाधिकार क़ानूनों को सख़्ती से लागू करने, नफ़रत से प्रेरित अपराधों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव पर अंकुश लगाने और दोषियों को दंडित करने की ज़िम्मेदारी सरकारों की है.
  • शिक्षा: बच्चों को सहिष्णुता, मानवाधिकारों, और अन्य जीवनशैलियों के बारे में बताने के लिए घरों व स्कूलों में विशेष प्रयास किए जाने चाहिए.
  • सूचना की सुलभता: ऐसी नीतियाँ बनाना आवश्यक है जिनसे प्रैस की आज़ादी और बहुलतावाद को बढ़ावा मिलता हो ताकि जनता तथ्यों और राय में भेद कर सके.
  • वैयक्तिक जागरूकता: लोगों को अपने व्यवहार और समाज में अविश्वास व हिंसा के घातक चक्र में संबंध के प्रति जागरूक होना होगा. इसके तहत लोगों को स्वयं से सवाल करना होगा कि क्या वे अपने से भिन्न समुदायों को नकार देते हैं और अपनी समस्याओं का ठीकरा दूसरों पर फोड़ते हैं.
  • स्थानीय समाधान: अहिंसक कार्रवाई के औज़ारों में नफ़रत भरे प्रोपेगेंडा का भंडाफोड़ करना, समस्याओं से सामूहिक रूप से निपटने के लिए समूह बनाने और ज़मीनी स्तर पर नैटवर्क तैयार करना है ताकि असहिष्णुता के पीड़ितों के साथ एकजुट हुआ जा सके.

 

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