अनगिनत ख़तरों से जूझने को मजबूर हैं हाथ से मैला ढोने वाले सफ़ाईकर्मी

औगाडौगौ, बुर्किना फासो में लैट्रीन साफ़ करने के लिए गढ्ढे में उतरा एक सफ़ाई कर्मचारी.
WaterAid/Basile Ouedraogo
औगाडौगौ, बुर्किना फासो में लैट्रीन साफ़ करने के लिए गढ्ढे में उतरा एक सफ़ाई कर्मचारी.

अनगिनत ख़तरों से जूझने को मजबूर हैं हाथ से मैला ढोने वाले सफ़ाईकर्मी

स्वास्थ्य

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि विकासशील देशों में स्वच्छता कर्मचारियों की दुर्दशा पर तात्कालिक कार्रवाई होनी चाहिए.  मंगलवार, 19 नवंबर, को 'विश्व शौचालय दिवस' से ठीक पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने शौचालय, सीवर और सेप्टिक टैंक साफ़ करने वाले करोड़ों लोगों के लिए ख़तरों को उजागर किया है. यूएन एजेंसी ने कहा है कि सफ़ाई कर्मचारियों के अधिकार, उनका स्वास्थ्य और सम्मान ख़तरे में है. 

यूएन एजेंसी का कहना है कि ये कर्मचारी एक ज़रूरी सेवा दे रहे हैं, लेकिन इससे उनके ख़ुद के स्वास्थ्य पर बुरा असर होता है और समाज भी उन्हें बहिष्कृत कर देता है. 

एक नई रिपोर्ट पर आधारित जारी बयान में आगाह किया गया है, "ये कर्मचारी अक्सर बिना किसी उपकरण या सुरक्षा के काम करते हैं और मानव कचरे के सीधे संपर्क में आते हैं, जिससे उनमें ख़ुद भी अनगिनत स्वास्थ्य समस्याओं और बीमारियों का ख़तरा पैदा हो जाता है."

रिपोर्ट में कहा गया है, "सफ़ाई कार्मचारियों की दुर्दशा तभी सामने आती है जब या तो ये महत्वपूर्ण सेवाएँ ठप हो जाएँ और नालियों, सड़कों, नदियों, और समुद्र तटों पर मल इकट्ठा हो जाए, या फिर कभी सफ़ाई करते हुए मज़दूरों की मौत होने की इक्का-दुक्का ख़बरें मीडिया में आ जाएं.”

भारत के बंगलूरु शहर में सफ़ाई कर्मचारी को गढ्ढे से बाहर निकालते हुए.
WaterAid/CS Sharada Prasad
भारत के बंगलूरु शहर में सफ़ाई कर्मचारी को गढ्ढे से बाहर निकालते हुए.

कथित कलंक के शिकार 

अंतरराष्ट्रीय श्रम  संगठन (ILO), विश्व बैंक (World Bank) और वॉटरएड (WaterAid) के साथ साझा रूप से प्रकाशित इस रिपोर्ट - "Health, Safety and Dignity of Sanitation Workers: An Initial Assessment" में कम और मध्य आय वाले देशों के नौ सफ़ाई कर्मचारियों के जीवन का अध्ययन किया गया है, जो गढ्ढे और टैंक साफ़ करने, मल हटाने और सीवर के रख-रखाव का काम करते हैं. 

समाज में उचित स्थान ना होने के कारण भी स्वच्छता कर्मचारियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. 

रिपोर्ट में इन कर्मचारियों को "अदृश्य, अशिक्षित और बहिष्कृत" बताते हुए कहा गया है कि सफ़ाई कर्मचारियों को कई चुनौतियों का सामना इसलिए भी करना पड़ता है क्योंकि उनके काम की अहमियत को कोई स्वीकार ही नहीं करता. 

हालांकि इनमें से कुछ कर्मचारियों को स्वास्थ्य लाभ, पेंशन और क़ानूनी सुरक्षा वाली पक्की नौकरियां प्राप्त है, लेकिन में ज़्यादातर लोग समाज के "सबसे कमज़ोर, हाशिए पर धकेले हुए ग़रीब और पीड़ित" तबके से आते हैं. 

ख़तरनाक वातावरण में काम करते हुए जिन विषैले जैविक और रासायनिक एजेंटों से इनका सामना होता है, उसका ज़िक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि “इन्हें जो काम दिया जाता है वो बेहद "निम्न-श्रेणी का, थकाने वाला और जोखिम से भरपूर" है. 

सबसे अधिक ख़तरे में असंगठित कर्मचारी 

भारत के बंगलूरु शहर में हाथ से लैट्रीन साफ करता सफ़ाई कर्मचारी.
WaterAid/CS Sharada Prasad
भारत के बंगलूरु शहर में हाथ से लैट्रीन साफ करता सफ़ाई कर्मचारी.

रिपोर्ट में ज़ोर देकर कहा गया है कि स्वच्छता रखने के अलावा ये भी ज़रूरी है कि जो लोग हमारे स्वास्थ्य की रक्षा करने वाली स्वच्छता सेवाएँ चलाते हैं, उन्हें सुरक्षित और गरिमामय वातावरण दिया जाए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र के बाक़ी लोगों की तुलना में सफ़ाई क्षेत्र के अनौपचारिक कार्यकर्ता कहीं ज़्यादा असुरक्षित हैं. 
 
इन अनौपचारिक स्वच्छता कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन मिलता है और ये स्वास्थ्य सेवा जैसे लाभों से वंचित रहते हैं. साथ ही इनकी सुरक्षा के लिए क़ानून और प्रवर्तन नीतियां भी बेहद कमज़ोर हैं. 

ख़राब निवेश और बुनियादी ढांचे के अभाव में इनमें से लाखों लोग हर साल पानी की कमी, साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता से जुड़ी बीमारियों के मरीज़ हो जाते हैं. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार केवल साफ़-सफ़ाई की कमी की वजह से ही सालाना लगभग चार लाख 32 हज़ार लोगों की मौत डायरिया की चपेट में आकर हो जाती है.

साथ ही, हैज़ा, पेचिश, टायफ़ायड, हेपेटाइटिस-ए और पोलियो सहित अन्य बीमारियों के संक्रमण फैलने का एक बड़ा कारण सफ़ाई की कमी रही है. 

विकासशील देशों में दिशानिर्देशों की कमी

वर्ष 2015 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा स्थापित 17 टिकाऊ विकास लक्ष्यों में से एक, टिकाऊ विकास लक्ष्य-6 का उद्देश्य वर्ष 2030 तक सभी के लिए साफ़ पानी, सही व उपयुक्त शौचालय और साफ़-सफ़ाई उपलब्ध कराना है. 

सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र, स्वच्छता कार्यकर्ताओं के सुरक्षा मानकों को विभिन्न देशों की राष्ट्रीय स्वच्छता नीतियों और जोखिम-मूल्यांकन और प्रबंधन में शामिल करने में मदद दे रहा है.  

रिपोर्ट में दक्षिण अफ़्रीका का उदाहरण देते हुए उन क्षेत्रों को भी रेखांकित किया गया जहां सफ़ाई के काम को आधिकारिक तौर पर स्वीकार करके उसे औपचारिक रूप दिया गया है – या फिर जहां सार्वजनिक और निजी कर्मचारियों को इस कार्य के लिए उचित उपकरण और प्रशिक्षण दिया जाता है और राष्ट्रीय श्रम मानकों का पूर्ण पालन होता है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी का मानना है, "कई चुनौतियां का सामना तो स्वच्छता कर्मचारियों को इसलिए भी करना पड़ता है क्योंकि समाज उन्हें और उनके काम को उचित मान्यता नहीं देता."

दुनिया में कुछ ही विकासशील देश ऐसे हैं जहां सफ़ाई कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए उचित नीतियां हैं.

स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, "जहां क़ानून मौजूद भी हैं, वहां उन्हें लागू करने के लिए वित्तीय या तकनीकी साधनों की कमी होती है, और फिर ज़्यादातर अनौपचारिक और असंगठित होने की वजह से भी विविध प्रकार की चुनौतियां सामने आती हैं.”