लड़ाई-झगड़ों में पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने के चलन को रोकना होगा

6 नवंबर 2019

अगर दुनिया को इस पृथ्वी और इस पर बसने वाले सभी इंसानों और जीव-जंतुओं के लिए एक टिकाऊ भविष्य का लक्ष्य हासिल करना है तो युद्धों और संघर्ष के हालात में पर्यावरण को महफ़ूज़ रखने के लिए ज़्यादा कार्रवाई करनी होगी. ये चेतावनी भरे शब्द संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की मुखिया इन्गा एंडरसन ने बुधवार को युद्ध व सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने से रोकने के लिए मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौक़े पर कहे.

इस दिवस पर दिए अपने संदेश में इन्गा एंडरसन ने कहा कि विभिन्न क़ानूनी दस्तावेज़ों द्वारा सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रावधान के बावजूद पर्यावरण अब भी दुनिया भर में सशस्त्र संघर्षों का ख़ामोश पीड़ित व शिकार बना हुआ नज़र आता है.

उन्होंने कहा कि कहीं भी आमतौर पर ऐसा नहीं देखा गया है कि सिर्फ़ पर्यावरण कारक किसी हिंसक संघर्ष की वजह बने हों.

“जबकि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और उससे संबंधित अन्य नुक़सानदेह कारक संघर्षों के तमाम पहलुओं में नज़र आते हैं. इनमें हिंसा भड़काना और उसे जारी रखना जिससे शांति की संभावनाएँ धूमिल होती हैं.”

इन्गा एंडरसन का कहना था, “पानी की उपलब्धता और उसका बहाव, भूमि क्षरण, बाढ़र और प्रदूषण, साथ ही संसाधनों के खनन में प्रतिस्पर्धा वास्तव में तनाव बढ़ाने की क्षमता रखते हैं जिनसे असल संघर्ष भड़क सकते हैं. ऐसे ही हालात जंगलों के क्षरण, भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण जैसे संसाधनों की हानि के मुद्दों से संबधित भी हैं.”

एजेंट ओरेंज और आईसिल

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार किसी युद्ध में पर्यावरण को निशाना बनाने और उसे एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर लोगों में पहली बार चिंता वियतनाम युद्ध के दौरान देखी गई थी. उस दौरान जहरीला एजेंट ओरेंज इस्तेमाल किया गया था जिसने बड़े पैमाने पर जंगलों का नीश करके उन्हें संक्रमित भी कर दिया था.

इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी हल्ला हुआ जिसके बाद दो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी संधियाँ वजूद में आईं: पर्यावरणीय सुधार कन्वेंशन 1976 और जिनेवा कन्वेंशंस में एक संशोधन, जिसमें युद्ध के दौरान संबद्ध पक्षों को एक मानक आचरण का पालन करना होता है. ये संशोधन एक साल बाद यानी 1977 में वजूद में आया था.

यूएनईपी ने याद करते हुए कहा कि 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत में तेल के कुओं को बड़े पैमाने पर तबाह किए जाने से बहुत ही ज़्यादा प्रदूषण पैदा हुआ था. उसके बाद युद्ध काल में पर्यावरण की संरक्षा के लिए और भी ज़्यादा सख़्त प्रावधान करने का आहवान किया गया था.

उसके बाद से पर्यावरण का नुक़सान बिना रुके ही जारी रहा है. मसलन, 1999 में कोसोवो संघर्ष के दौरान दर्जन भर से भी ज़्यादा औद्योगिक ठिकानों पर बमबारी की वजह से ज़हरीले रसायनिक पदार्थों का विसर्जन हुआ जिनकी वजह से आसपास का वातावरण में संक्रमण फैल गया.

अभी हाल के समय में आइसिल के लड़ाकों ने इराक़ में अपने दबदबे वाले इलाक़ों से भागते समय तेल के कुओं में आग लगा दी. उन कुओं से ऐसे ज़हरीले पदार्थों का विसर्जन हुआ जिन्हें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने गैसों का मिश्रण क़रार दिया है और जिन्होंने वहाँ के वातावरण को ज़हरीला बना दिया.

पृथ्वी को हर हाल में बचाना होगा

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इन्गा एंडरसन ने कहा कि हाल के दशकों में शांति और सुरक्षा के बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की समझ व अवधारणा में कुछ बुनियादी बदलाव देखे गए हैं.

ग़ैर-सरकारी गुटों की मौजूदगी और सक्रियता बढ़ने के बाद अब अब सुरक्षा को सिर्फ़ परंपरागत सैनिक ख़तरों के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता.

उनका कहना था, “इस बदलते सुरक्षा समीकरण में कुछ इस तरह बदलाव करने की ज़रूरत है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय संघर्ष को हल करने की प्रक्रिया या प्रबंधन में ख़ुद को शामिल महसूस कर सके.”

“संघर्ष को होने से पहले ही रोकने से लेकर शांति स्थापना व शांति क़ायम रखने तक के प्रयासों में प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की भूमिका को हर स्तर पर ध्यान में रखना बेहद ज़रूरी है.”

इनगा एंडरसन का कहना था कि यूएन पर्यावरण कार्यक्रम युद्धों का पर्यावरण पर होने वाले नुक़सान का जायज़ा लेने के लिए 1999 से काम कर रहा है. इन प्रयासों में अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों में उन ख़ामियों की पहचान करना भी शामिल है जिनके ज़रिए युद्ध काल में पर्यावरण की हिफ़ाज़त करने के प्रावधान किए गए हैं.

उनका कहना था, “अलबत्ता, अगर हमें टिकाऊ विकास लक्ष्य हासिल करने हैं तो हमें पर्यावरण के लिए संकटों और युदधों द्वारा दरपेश ख़तरों को कम करने के लिए ज़्यादा मुस्तैदी और तेज़ी से काम करना होगा. ऐसा करके अंततः हम अपनी स्वास्थ्य और जीविका बचा पाएंगे.”

 

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