हिंसक संघर्ष में यौन हिंसा का अंत करने के प्रयासों का दशक

30 अक्टूबर 2019

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हिंसक संघर्ष के दौरान होने वाली यौन हिंसा की रोकथाम करने और उससे निपटने के लिए दस वर्ष पहले एक नए कार्यालय की स्थापना की थी. यूएन उपप्रमुख आमिना जे मोहम्मद ने उस मैंडेट के दस साल पूरे होने के अवसर पर मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि ऐसे अपराधों की रोकथाम करने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए संकल्प का होना बेहद आवश्यक है.

यूएन उपमहासचिव ने कहा कि 2009 के आदेशपत्र (मैंडेट) ने स्पष्ट संदेश दिया कि उथल-पुथल और हिंसा के दौरान होने वाली यौन हिंसा मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का भयावह उल्लंघन है.  

उनके मुताबिक़ इस आदेशपत्र के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा युद्ध के दौरान बलात्कारों का अंत करने और जीवित बच गए पीड़ितों के सामाजिक चरित्र हनन की रोकथाम करने के लिए गहन प्रयास किए गए. हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा को सुरक्षा और समावेशी शांति के लिए ख़तरा क़रार दिया गया.

यूएन उपमहासचिव ने सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों, जांच प्रक्रिया के ढांचों और विशेष प्रतिनिधि के कार्यालय की स्थापना का ज़िक्र करते हुए बताया कि पिछले एक दशक में यौन हिंसा पीड़ितों की मांगों के मद्देनज़र एक वैश्विक मानदंड फ़्रेमवर्क और संस्थागत व्यवस्थाएँ तैयार की गई हैं.

हिंसक संघर्ष में यौन हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने इस अवसर पर बुधवार को एक नए ‘ग्लोबल फ़ंड फ़ॉर सर्वाइवर्स’ की आधिकारिक शुरुआत की.

मुआवज़े की दरकार

विशेष प्रतिनिधि ने कहा कि दुनिया भर में पीड़ितों से मुलाक़ात करने के दौरान बातचीत में दो मांगें प्रमुखता से उभर कर आती हैं: अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए; और पीड़ितों को जीवन फिर से शुरू करने के लिए सहायता व समर्थन मिले.

पीड़ितों को सबसे अधिक मुआवज़े की आवश्यकता होती है लेकिन यही उन्हें सबसे कम मिलता है. “इस मैंडेट के लिए एक नए दशक का उदय होना इन्हीं मांगों को पूरा करने और पीड़ितों को सबसे पहले रखने का समय है.”

इस कोष के ज़रिए दुनिया भर में हिंसक संघर्षों में यौन हिंसा के पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जाएगा.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि राजनैतिक साहस के सबसे बड़े प्रतीक अक्सर वो होते हैं जिनके पास ताक़त और संसाधनों तक पहुंच नहीं होती और जिन्हें सबसे अधिक ख़तरों का सामना करना होता है.

“जीवित बच गए पीड़ितों पर केंद्रित और अधिकार आधारित कार्रवाई के लिए स्थिति के अनुरूप और ज़्यादा प्रासंगिक समाधानों की आवश्यकता है. इसका अर्थ पीड़ितों को आवाज़ और विकल्प देना, निर्णय लेने की उनकी क्षमता बहाल करना, सहनशीलता का निर्माण करना और ऐतिहासिक रिकॉर्ड में उनके अनुभव स्थापित करना है.”

हिंसक संघर्ष में यौन हिंसा को ‘इतिहास की सबसे बड़ी चुप्पी’ क़रार देते हुए उन्होंने कहा कि इस ख़ामोशी से अपराधियों का बचाव किया गया जबकि पीड़ितों को सहारा देने वाली व्यवस्थाओं से दूर रखा गया.

अपने संबोधन के समापन में विशेष प्रतिनिधि पैटन ने आयोजन में उपस्थित लोगों से इस पल को हाथ से ना जाने देने और निर्णायक कार्रवाई की अपील करते हुए कहा कि यौन हिंसा को दैनिक ख़बरों से हटाकर इतिहास के पन्नों तक ही सीमित कर देना होगा.

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नादिया मुराद और डॉ. डेनिस मुक्वेगे ने ग्लोबल फ़ंड का समर्थन करते हुए कहा है कि उनकी अर्थपूर्ण अंतर्दृष्टि को शामिल किया जाना चाहिए.”

नादिया मुराद यज़ीदी मूल की हैं और इराक़ में दाएश लड़ाकों के हाथों बलात्कार का शिकार हुई थीं, संयुक्त राष्ट्र की सदभावना दूत नादिया मुराद ने कहा कि जीवित बचे पीड़ितों को समाधान का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

लिंग आधारित हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले कॉंगो लोकतांत्रिक गणराज्य में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. डेनिस मुक्वेगे ने कहा कि यह कोष न्याय का स्थान नहीं ले सकता है और अपराधियों को उनकी करनी की सज़ा चुकानी होगी.

“ग्लोबल सर्वाइवर्स फ़ंड एक ऐसे सीधे रास्ते की स्थापना करता है जिससे उनकी मुआवज़े तक पहुंच हो.”

उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे लोगों, परिवारों और समुदायों के जीवन में बदलाव लाने में सहायता मिलेगी.

 

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