दक्षिण सूडान: डर के माहौल में चुनौतियों को समझने की कोशिश

16 अक्टूबर 2019

दक्षिण सूडान के लासू में हिंसक वारदातों के बढ़ने से स्थानीय जनता के सामने पेश आ रही चुनौतियों को समझने और उनके समाधान तलाश करने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल ने इलाक़े का दौरा किया है. इस प्रतिनिधिमंडल में संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNMISS) के फ़ोर्स कमांडर ब्रिगेडियर शैलेश तिनाइकर और दक्षिण सूडान में भारत के राजदूत एसडी मूर्ति शामिल थे.

येई नगर से 32 किलोमीटर दूर स्थित लासू में दक्षिण सूडान की सेना और नेशनल साल्वेशन फ्रंट के मुखिया थॉमस सिरिलो के वफ़ादार लड़ाकों के बीच झड़पों का केंद्र बना हुआ है.

इन झड़पों की जद में आम लोग भी आ रहे हैं जिस कारण जान बचाने के लिए उन्हें अपने घर छोड़ कर भागना पड़ रहा है. इस कोशिश में कई लोगों की अब तक मौत हो चुकी है.

येई लासू मार्ग पर हाल के महीनों में हत्याओं, लूटपाट और वाहन जलाने की घटनाएं भी बढ़ी हैं जिनके बाद प्रतिनिधिमंडल ने इस इलाक़े का दौरा किया.

इन घटनाओं में चार लोगों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए हैं.

गोजा क्षेत्र के उप-प्रमुख अलीशा लुबारी ने प्रतिनधिमंडल के साथ मुलाक़ात के बाद कहास, “आप जो लासू में देख रहे हैं वैसा इन गांवों में बिलकुल भी नहीं है. हम यहां बंदियों की तरह रह रहे हैं. मैं और मेरा परिवार उतना ही खाते-पीते हैं जिससे जीवित रह सकें. मुझे उम्मीद है कि जल्द ही शांति पुनर्स्थापित कर दी जाएगी.”

दुश्मनी समाप्त करने के लिए सितंबर 2018 में हुए समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले और ना करने वाले पक्षों पर दबाव बढ़ा जिसके बाद लासू में तनाव भरी शांति पसरी है.

UNMISS/Nektarios Markogiannis
दक्षिण सूडान में शांति प्रयासों के तहत जुलाई 2019 में बाल सैनिकों को रिहा किया गया.

प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान लासू में कुछ आम लोग खेती-बाड़ी करते हुए, बच्चे स्कूल जाते हुए और स्वास्थ्य केंद्र खुले दिखाई दिए. लेकिन कई लोगों को आने वाले दिनों भारी हिंसा होने का डर बना हुआ है.

देश में 12 नवंबर तक राष्ट्रीय एकता वाली सरकार का गठन होना है लेकिन अगर इस काम में देरी हुई या फिर सरकार का गठन समावेशी और पारदर्शी ढंग से नहीं हुआ तो हिंसा भड़कने का जोखिम बढ़ जाएगा.

उपप्रमुख अलीशा लुबारी ने कहा कि शांति समझौते में शामिल पक्षों को दक्षिण सूडान की जनता की व्यथा को समझना होगा जिन्हें हिंसक संघर्ष से कभी छुटकारा नहीं मिल पाया है.

“शांति महसूस करने का अर्थ बंदूकों के शांत होने से नहीं बल्कि प्रमुख हिस्सेदारों के इस क़ाबिल होने से है कि वे जीवन की बुनियादी ज़रूरतों जैसे स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा और आवाजाही की आज़ादी मुहैया करा सकें.”

येई-लासू मार्ग को येई नगर की जीवनरेखा के तौर पर देखा जाता है क्योंकि यह उसे मोरसाक, उम्बासी, मितिका और लासू जैसे महत्वपूर्ण ग्रामीण बाज़ारों से जोड़ता है. ये सभी बाज़ार हाल के दिनों में फिर से खुल गए हैं.

यूएन मिशन के फ़ोर्स कमांडर ब्रिगेडियर जनरल शैलेश तिनाइकर ने बताया कि इस व्यापार मार्ग पर आम जनता जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, मिशन उसे भली-भांति समझता है और शांतिरक्षक इन हालात में हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठेंगे.

“यह देखना दुखद है कि घनी आबादी वाले गांव अब ख़ाली हो गए हैं और वहां रहने वाले अब हिंसा से बचकर शरणार्थी या घरेलू विस्थापित बन गए हैं.”

उनके मुताबिक़ इन गांवों में सुरक्षा और शांति प्रक्रिया के प्रति अनिश्चितता व्याप्त है.

फ़ोर्स कमांडर ने भरोसा दिलाया कि व्यापार मार्ग पर बढ़ते अपराधों पर अंकुश लगाने और सुरक्षा बढ़ाने के लिए सुरक्षा दलों की गश्त बढ़ाई गई हैं ताकि आम नागरिकों में भरोसा बहाल किया सके और वे गांव लौट सकें.

उन्होंने यूएन मिशन की ओर से लासू की जनता के नाम अपील जारी करते हुए कहा कि सरकार का गठन जल्द से जल्द होना चाहिए जिसमें समझौते पर हस्ताक्षर ना करने वालों की भी भागीदारी होनी चाहिए.

उनके मुताबिक़ अगर शांति प्रक्रिया और ज़्यादा लंबी खिंचती है तो तो ज़्यादा लोग असुरक्षित महसूस करेंगे, जो देश के लिए और भी बुरा होगा.

दक्षिण सूडान में भारत के राजदूत एसडी मूर्ति ने बताया कि हिंसा की वजह से देश के विकास के लिए धनराशि का इंतज़ाम करने में मुश्किलें आ रही हैं.

 

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