वैश्विक जलवायु कार्रवाई में ग्रामीण महिलाएँ एक शक्तिबल

15 अक्टूबर 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि दुनिया भर में ग्रामीण महिलाएँ व लड़कियाँ जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के वैश्विक प्रयासों में एक ताक़तवर माध्यम हैं.  

मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के अवसर पर अपने संदेश में महासचिव ने कहा कि ग्रामीण महिलाओं की बात सुनना और उन्हें वज़न देना जलवायु परिवर्तन के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए बहुत अहम है. महासचिव ने तमाम देशों की सरकारों, कारोबारी संस्थानों और सामुदायिक नेताओं से भी इस दिशा में सक्रिय होकर काम करने का आग्रह किया है.

वर्ष 2019 के लिए इस दिवस पर मुख्य थीम रही -जलवायु  सहनशीलता का निर्माण करती  ग्रामीण महिलाएं व लड़कियाँ. अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस हर वर्ष 15 अक्टूबर को मनाया जाता है.

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि ग्रामीण महिलाएँ ऐसे ज्ञान और कला-कौशल की खान होती हैं जिनसे प्राकृतिक व निम्न कार्बन वाले समाधानों का इस्तेमाल करने में समुदायों की मदद हो सकती है. संयुक्त राष्ट्र जलवायु आपदा संबंधी मुद्दों और उनके ऐसे समाधानों को बहुत महत्वपूर्ण समझता है.

महासचिव का कहना था, "ग्रामीण महिलाएँ खेतीबाड़ी की नई तकनीकें अपनाने, संकट की स्थिति में सबसे पहले कार्रवाई करने वाली और हरित ऊर्जा उत्पन्न करने वाली पहली कार्यकर्ता होती हैं. इस रूप में ग्रामीण महिलाएँ एक मज़बूत शक्तिबल हैं जो वैश्विक प्रगति की अलख जलाने में सक्षम हो सकती हैं."

अंतरराषट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) का कहना है कि वैश्विक स्तर पर हर तीन में से एक महिला कृषि क्षेत्र में काम करती है.

दुनिया भर में जहाँ भी और जब भी सूखा पड़ने या लू चलने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं तो सबसे पहला और ज़्यादा असर खेतीबाड़ी पर ही पड़ता है.

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन का कहना है कि 2006 से 2016 के दशक में विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन संबंधीआपदाओं से जितना नुक़सान हुआ उसमें लगभग एक चौथाई कृषि क्षेत्र में था. 

यूएन प्रमुख ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि महिलाएं खेतों को फ़सल बोने के लिए तैयार करती हैं, फसल, पानी और ज़रूरी ईंधन एकत्र करती हैं और पूरे परिवार का भरण - पोषण करने में टिकाऊ मदद करती हैं.

इसके बावजूद महिलाओं को समुचित भूमि, धन, उपकरण, बाज़ार और निर्णय लेने के अवसर हासिल नहीं हैं.

महासचिव का कहना था, "जलवायु आपदा से ये असमानताएं और बढ़ती हैं जिनके कारण ग्रामीण महिलाएँ व लड़कियाँ और भी ज़्यादा पीछे रह जाती हैं." जलवायु संबंधी आपदाओं के हालात में विशेष रूप में महिलाएँ ही ज़्यादा नुक़सान उठाती हैं. 

लिंग असमानता को दूर करना

अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष का अनुमान है कि वैश्विक आबादी का लगभग 40 फ़ीसदी हिस्सा और लगभग तीन अरब लोग विकासशील देशों के ग्रामीण इलाक़ों में बसते हैं.

इस आबादी का भी बड़ा हिस्सा अपनी जीविका के लिए छोटे स्तर वाली खेताबाड़ी पर निर्भर होता है जो परिवारों के स्तर पर की जाती है. 

एजेंसी का मानना है कि दुनिया के सामने इस समय भुखमरी, ग़रीबी, युवाओं में बेरोज़गारी और जबरन प्रवासन जैसी समस्याओं का टिकाऊ हल तलाश करने के लिए ग्रामीण आबादी में निवेश करना ही दीर्घकालीन व टिकाऊ उपाय है.

लिंग समानता को बढ़ावा देना भी संगठन की एक प्राथमिकता है क्योंकि संगठन का कहना है कि जब महिलाएँ सशक्त होती हैं तो परिवारों, समुदायों और देशों - सभी को फ़ायदा होता है.

यही बात संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश के इस संदेश में भी नीहित है जिसमें उन्होंने जलवायु आपदा का सामना करने के लिए की जाने वाली तैयारियों में ग्रामीण महिलाओं को भरपूर समर्थन देने का आहवान किया है.

महासचिव ने कहा है, "जलवायु संकट द्वारा पेश ख़तरों का सामना करने में कामयाबी हासिल करने के लिए असरदार उपायों में से एक - लिंग आधारित असमानता को ख़त्म करना भी शामिल है."

"सशक्त महिलाएं जलवायु आपदा की चुनौतियों का सामना करने में ज़्यादा सक्षम होती हैं. साथ ही वो निम्न कार्बन टैक्नोलॉजी अपनाने में भी अहम भूमिका निभाती हैं, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी व जागरूता बढ़ाने और कार्रवाई करने के लिए आग्रह करने में भी आगे रहती हैं."

 

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