11 अक्टूबर 2019

पृथ्वी पर हर एक इंसान का पेट भरने लायक पर्याप्त भोजन का उत्पादन हो रहा है, लेकिन फिर भी विश्व के कुछ हिस्सों में भुखमरी बढ़ती जा रही है और 82 करोड़ से ज़्यादा लोग "लगातार कुपोषण का शिकार" बने हुए हैं. दुनिया में हर इंसान को पर्याप्त भोजन मिले – ये सुनिश्चित करने के लिए आख़िर क्या क़दम उठाए जा रहे हैं?

तेज़ आर्थिक विकास और पिछले दो दशकों में कृषि उत्पादकता में हुई वृद्धि के कारण दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या आधी रह गई है जिन्हें खाने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं है. मध्य और पूर्वी एशिया, लातिन अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्रों ने चरम भुखमरी को मिटाने में काफ़ी प्रगति की है.

लेकिन दुनिया भर की आबादी में लगभग दो अरब की बढ़ोत्तरी भी हुई है. हाल के रुझानों से पता चलता है कि भुखमरी की समस्या बनी हुई है: ख़ासतौर पर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में, जहां अल्पपोषण और गंभीर खाद्य असुरक्षा बढ़ने के नए संकेत मिले हैं.

उप-सहारा अफ्रीका में कुपोषित लोगों की संख्या 2014 के 19 करोड़ से बढ़कर 2017 में 23 करोड़ से अधिक हो गई है. इस क्षेत्र में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का आधा कारण कुपोषण ही है, यानि प्रति वर्ष लगभग 31 लाख बच्चों की मौत.

ऐसे में ‘ज़ीरो हंगर’ (भुखमरी का अंत) के 2030 के लक्ष्य को प्राप्त करना - दूसरे शब्दों में यह सुनिश्चित करना कि दुनिया में किसी भी कोने में, कोई भी भूखा न रहे - एक बड़ी चुनौती है.

OCHA/Giles Clarke
यमन के धुबाब में एक भोजन वितरण केंद्र.

विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) द्वारा हाल ही में जारी आँकड़ों के अनुसार बढ़ती भुखमरी के कारणों में पर्यावरणीय क्षरण और सूखे की स्थिति शामिल हैं - इन दोनों पर जलवायु परिवर्तन और हिंसक संघर्ष का असर पड़ता है.

कृषि में जैव विविधता की कमी भी चिंता का कारण है, और इसे समरूप भोजन के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, जो भोजन की उपलब्धता को सीमित करता है, जिससे कुपोषण और ग़रीबी बढ़ती है.

वर्तमान कृषि उत्पादन केवल 12 फ़सलों के आसपास घूमता है और दुनिया भर में संभावित खाद्य पदार्थों की अनेक क़िस्में होने के बावजूद, भोजन से प्राप्त 60 प्रतिशत कैलोरी केवल चार फसलों से आती है: चावल, गेहूं मक्का और सोया.

अच्छी ख़बर ये है कि दुनिया भर में खाद्य उत्पादन संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए नवाचार (इनोवेशन) और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके कुछ उदाहरण यहां दिए गए हैं.

पापुआ न्यू गिनी में सुअर मांस को बढ़ावा

पापुआ  न्यू गिनी में सुअर देश की संस्कृति और अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वहां कोई भी उत्सव सुअर के मांस के बिना पूरा नहीं होता. मांस की बढ़ती वैश्विक मांग का मतलब है कि किसानों को अब स्थानीय बाजारों के साथ-साथ विदेशी बाज़ारों में बिक्री का अवसर भी मिल रहा है.

हालांकि, इसके लिए उन्हें यह साबित करना पड़ता है कि उनका पशुधन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानकों पर खरा उतरता है और इस स्तर पर नवीनतम डिजिटल तकनीक से मदद मिल सकती है.

इसके लिए पहली बार एक डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लगया गया है जो सुअरों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी की पुष्टि करता है. इसमें उनकी वंशावली से लेकर, उनके खान-पान, दवाईयों की जानकारी शामिल है, जिससे आयातक और उपभोक्ता ख़रीदे जाने वाले मांस की गुणवत्ता पर विश्वास कर सकें.

FAO/Gerard Sylvester
जिवाका प्रांत में स्थानीय किसानों को सुअरों के लिए ब्लॉकचेन तकनीक के इस्तेमाल को समझाया जा रहा है.

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (UNFAO) और अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संगठन (ITU) की मदद से तैयार की गई ये प्रणाली जिवाका क्षेत्र में संचालित की जा रही है.

वहां ब्रॉडबैंड नेटवर्क में सुधार किया जा रहा है ताकि किसान अधिक आसानी से स्मार्टफ़ोन सब्सिडी का उपयोग कर, पशुधन रिकॉर्ड्स को अपडेट कर सकें, जिन्हें ऑनलाइन, क्लाउड में संग्रहीत किया जाता है.

भारत में रसायनों से छुटकारा

हालांकि शुरूआत में भारत में फ़सल की पैदावार बढ़ाने और अकाल से लाखों लोगों को बचाने का श्रेय उर्वरकों और अन्य रसायनों को दिया गया था, लेकिन अब उनकी भूमिका संदेहास्पद बन गई है.
उर्वरकों को अब मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, परिणामस्वरूप उत्पाद क्षमता में स्थिरता, स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों और उच्च लागत की वजह से किसानों को क़र्ज़ में धकेलने जैसे कारणों के लिए दोषी ठहराया जा रहा है.

हर साल हज़ारों किसानों की आत्महत्याएं इसका एक दुखद परिणाम बनकर सामने आईं हैं.

आंध्र प्रदेश में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम "ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती" (Zero Budget Natural Farming) नामक एक तकनीक के ज़रिए, खेत से रसायनों को हटाने के लिए तैयार की गई एक पहल का समर्थन कर रहा है. उम्मीद जताई गई है कि इसके ज़रिए स्थानीय खाद्य प्रणालियों को लंबे समय तक परिवर्तित और संरक्षित करने और किसानों के कल्याण में मदद मिलेगी.

कृषि का यह रूप नवीनतम वैज्ञानिक ज्ञान का लाभ उठाकर, रसायनों पर निर्भरता ख़त्म करता है. "ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती" की मुख्य तकनीकों में  – बीजों पर गोमूत्र और गोबर से बने फार्मूले की कोटिंग करना; मिट्टी में इन सामग्रियों को डालना; फसलों और फसल अवशेषों से ज़मीन को ढकना जैसे उपाय शामिल हैं.

UNDP India
भारत में महिलाएं जैविक खेती के लिए आगे आ रही हैं.

कार्यक्रम में शामिल किसानों को जैव विविधता बढ़ाने और मिट्टी को फिर से जीवंत करने के लिए घरेलू और आसानी से उपलब्ध संसाधनों से बहुत सहायता मिल सकती है, जिससे लागत में कटौती और आय में वृद्धि होती है. आंध्र प्रदेश सरकार ने 2024 तक इस योजना को लगभग 60 लाख किसानों तक पहुंचाने की योजना बनाई है, जिससे ये भारत का पहला "प्राकृतिक कृषि" राज्य बन जाएगा.

मिस्र में भोजन की बर्बादी रोकने के लिए अभियान

वैश्विक स्तर पर उत्पादित भोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा या तो खो जाता है या बर्बाद हो जाता है.

ये एक ऐसी विकट स्थिति है जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष लगभग 1 ख़रब डॉलर का नुक़सान होता है.

विश्व खाद्य कार्यक्रम अक्तूबर के आरंभ में शुरू किए गए अपने #StopTheWaste जागरूकता अभियान जैसी पहलों के माध्यम से नुक़सान कम करने की कोशिश कर रहा है.

अभियान का उद्देश्य वैश्विक आंदोलन का निर्माण करना है और खाने की बर्बादी रोकने के लिए सरल समाधानों पर प्रकाश डालना है.

मिस्र में लगभग आधे टमाटर और अंगूरों का एक तिहाई हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही कृषि के ख़राब तरीक़ों के कारण बर्बाद हो जाता है.
खाद्य और कृषि संगठन (UNFAO), मिस्र की सरकार और सहकारी समितियों के साथ मिलकर उत्पादन के दौरान अकुशल प्रबंधन और अतिरिक्त उत्पादन से होने वाले खाद्य नुक़सान को सीमित करने के तरीक़ों की तलाश कर रहा है. इस साझेदारी से सामने आए कुछ व्यावहारिक समाधानों की रूपरेखा इस वीडियो में दी गई है.

‘ज़ीरो हंगर’ का लक्ष्य पाने के लिए पांच समाधान

हालांकि भुखमरी का हल ढूंढने की कोई जादुई छड़ी नहीं है लेकिन फिर भी विश्व खाद्य कार्यक्रम ने इस मुद्दे को पांच चरणों के समाधान के रूप में रेखांकित किया है:

  • सबसे कमज़ोर वर्ग के लिए अधिक सुरक्षा - ग़रीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, जिससे सबसे ग़रीब 2 अरब लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बल मिलेगा
  • बुनियादी ढांचे में सुधार - उपभोक्ताओं और आपूर्तिकर्ताओं को बेहतर सड़कें, भंडारण सुविधाएं और विद्युतीकरण प्रदान करने से ख़रीद और बिक्री में आसानी होगी
  • भोजन की बर्बादी कम करना - प्रत्येक वर्ष उत्पादित भोजन का लगभग एक तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष लगभग 1 ख़रब का घाटा होता है
  • विविध फसलें उगाना - फ़िलहाल भोजन से प्राप्त कुल कैलोरी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा केवल चार फ़सलों से आता है - चावल, गेहूं मक्का और सोया. जलवायु परिवर्तन की स्थिति में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक स्तर पर खाद्य पदार्थों के उत्पादन की आवश्यकता होगी
  • बच्चों के पोषण पर ध्यान देना - नाटेपन की रोकथाम और स्वस्थ विकास के लिए शिशु के पहले एक हज़ार दिनों में अच्छा स्वास्थ्य और पोषण बहुत ज़रूरी है.

 

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