नेत्र समस्याओं और दृष्टिबाधिता का बढ़ता दायरा

8 अक्टूबर 2019

विश्व में दो अरब से ज़्यादा लोग नेत्र समस्याओं और दृष्टिबाधिता से पीड़ित हैं और आने वाले दशकों में आंखों की सही ढंग से देखरेख किए जाने की ज़रूरत का दायरा वैश्विक स्तर पर बढ़ेगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ओर से मंगलवार को एक नई रिपोर्ट जारी की गई है जो नेत्रों से जुड़ी समस्याओं पर अब तक की पहली रिपोर्ट है. रिपोर्ट के अनुसार एक अरब से ज़्यादा लोग ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं जिनका इलाज संभव है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी  ने अपनी रिपोर्ट में ऐसे तथ्य साझा किए हैं जो दर्शाते हैं कि आंखों की समस्याएं जीवनशैली में आए बदलावों से भी बढ़ रही हैं. इनमें विशेष तौर पर टीवी, मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन पर ज़्यादा समय बिताने से होने वाली समस्याएं भी शामिल हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन में डॉक्टर अलरकोस सिएज़ा ने जिनीवा में पत्रकारों को बताया कि युवा भी इस जोखिम से अछूते नहीं हैं. “कमज़ोर नज़र से पीड़ित बच्चों की संख्या बढ़ने का एक बड़ा कारण यह है कि बच्चे अब ज़्यादा समय घर से बाहर नहीं बिताते हैं. यह एक ऐसा रुझान है जो चीन सहित कुछ अन्य देशों में दिखाई दे रहा है.”

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के डॉक्टर स्टुअर्ट कील ने बताया कि घर के अंदर रहने की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि आंखों के लेंस को आराम ही नहीं मिल पाता.

चीन से मिले वैज्ञानिक तथ्यों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि घर के बाहर बिताए जाने वाले समय और बाद में होने वाली कमज़ोर दृष्टि की समस्याओं में स्पष्ट संबंध है.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी कि रिपोर्ट ‘वर्ल्ड रिपोर्ट ऑन विज़न’ के अनुसार दृष्टिबाधिता का बोझ निम्न और मध्य आय वाले देशों में ज़्यादा दिखाई देता है.  

महिलाओं के अलावा प्रवासी, आदिवासी, ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे समुदायों और विकलागों में यह समस्या व्याप्त है.

स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने बताया कि “आंखों की समस्याएं और दृष्टिबाधिता व्यापक रूप से फैली हुई हैं और अक्सर उनका इलाज नहीं हो पाता. यह अस्वीकार्य है कि 6.5 करोड़ लोग नेत्रहीन हैं या मंद दृष्टि से पीड़ित हैं जबकि मोतियाबिंद के ऑपरेशन के ज़रिए उनका बहुत जल्द इलाज किया जा सकता है. 80 करोड़ से ज़्यादा लोगों को रोज़मर्रा के काम करने में भी संघर्ष करना पड़ता है क्योंकि उनके पास नज़र का चश्मा नहीं है.”

ट्रेकोमा सहित अन्य आम नेत्र समस्याओं से निपटने में आठ देशों को हाल के दिनों में सफलता मिली है और यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने इसका स्वागत किया है.

रिपोर्ट दर्शाती है कि आने वाले दशकों में जनसंख्या वृद्धि और बुढ़ापे के साथ-साथ जीवनशैली में परिवर्तन व शहरीकरण से नेत्र विकारों, दृष्टिबाधिता और नेत्रहीनता से पीड़ित लोगों की संख्या में नाटकीय ढंग से बढ़ने की आशंका है.

रिपोर्ट में ख़ास तौर पर रोकथाम की अहमियत को रेखांकित किया गया है क्योंकि एक अरब से ज़्यादा लोग ऐसी दृष्टि समस्याओं से पीड़ित हैं जिन्हें समय पर इलाज करके दूर किया जा सकता है.

दृष्टिबाधिता और नेत्रहीनता की समस्याओं पर क़ाबू पाने के लिए 14.3 अरब डॉलर की धनराशि का अनुमान जताया गया है.  

निम्न आय वाले क्षेत्रों – पश्चिमी और पूर्वी सब-सहारा अफ़्रीका और दक्षिण एशिया – में ऐसी समस्याओं की रोकथाम विशेष रूप से अहम है क्योंकि यहां नेत्रहीनता की दर उच्च आय वाले देशों की तुलना में औसतन आठ गुना ज़्यादा है.

आंखों की जिन समस्याओं का इलाज शुरुआती चरणों में किया जा सकता है उनमें मधुमेह (डायबिटीज़) के कारण होने वाले नेत्र विकार, मोतियाबिंद और ग्लोकॉमा प्रमुख हैं.

डॉक्टर सिएज़ा ने बताया कि “दृष्टिबाधिता को बढ़ती उम्र के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि अगर सही ढंग से देखरेख की जाए, जैसे ग्लोकॉमा के मामले में,  तो ग्लोकॉमा से होने वाली दृष्टिबाधिता की रोकथाम की जा सकती है. या अगर आपकी मोतियाबिंद की सर्जरी हो जाए तो मोतियाबिंद से होने वाली दृष्टिबाधिता को रोका जा सकता है.”

रिपोर्ट में सर्वजन के लिए उच्च गुणवत्ता वाली आंखों की देखरेख पर ज़ोर दिया गया है और इस कवरेज में रहने के स्थान या आय जैसी बाधाओं के आड़े ना आने की बात कही गई है.

इसे सुनिश्चित करने के लिए यह ज़रूरी होगा कि देशों की राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं में इलाज को ज़रूरी हिस्से के रूप में शामिल किया जाए और उसे सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्य से जोड़ा जाए.

आम तौर पर दृष्टिबाधिता और नेत्रहीनता का कारण बनने वाली नेत्र समस्याएं – मोतियाबिंद, ट्रेकोमा – राष्ट्रीय रोकथाम रणनीतियों का हिस्सा हैं लेकिन अन्य विकारों के प्रति लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए.

 

 

 

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