महासभा अध्यक्ष के अनूठे हथौड़े की अनूठी कहानी

16 सितम्बर 2019

अगर आप संयुक्त राष्ट्र महासभा की कार्यवाही को नज़दीकी से देखते होंगे तो आपने ध्यान दिया होगा कि महासभा के अध्यक्ष कार्यवाही संचालित करने के लिए एक हथौड़े का इस्तेमाल करते हैं. ये आइसलैंड की तरफ़ से एक अनूठा तोहफ़ा है और इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है.

आइसलैंड के लोकतंत्र को दुनिया भर में सबसे प्राचीन माना जाता है, देश की संसद – एलथिंग पहल बार 930 में बैठी थी. इसलिए उसे आधुनिक संसदों की ‘पूर्वज’ कहा जाता है.

अपनी लोकतांत्रिक विरासत को देखते हुए आइसलैंड के लोगों ने फ़ैसला किया कि जो व्यक्ति ‘विश्व संसद’ – संयुक्त राष्ट्र - की अध्यक्षता करते हैं, उनके पास आइसलैंड मूल का एक प्रतीक (हथौड़ा) होना चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय स्थित इमारत में अनेक कान्फ्रेंस हॉल बने हुए हैं जिनमें छोटे आकार के हथौड़ा रखे हुए हैं. लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा के हॉल में, जहाँ संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देश विश्व मामलों पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा होते हैं, वहाँ पर इस्तेमाल किया जाने वाला ये हथौड़ा काफ़ी बड़े आकार का है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. ये कुछ सुनहरे रंग का नक्काशीदार हथौड़ा है जो कलाकृति जैसा नज़र आता है.

UN Photo/Manuel Elias
महासभा के 72वें सत्र के अध्यक्ष मीरोस्लैफ़ लैजाक ने 73वें सत्र की अध्यक्ष मारिया फ़र्नेंडा एस्पिनोसा को ये प्रतीक सौंपा. (सितंबर 2018)

महासभा अध्यक्ष का हथौड़ा इस विश्व संसद के सत्रों का अभिन्न अंग है. महासभा में बैठकों की शुरुआत और समाप्ति की घोषणा; किसी एजेंडा की स्वीकृति की घोषणा; अधिकारियों का चुनाव; और प्रस्तावों के पारित होने की घोषणा भी इसी हथौड़े की चोट के ज़रिए की जाती है. अक्सर जब महासभा के सत्र में शोरशराबा होने लगता है तो इस हथौड़े से ही चोट करके व्यवस्था क़ायम करने की जाती है.

संयुक्त राष्ट्र में आइसलैंड के पूर्व स्थाई प्रतिनिधि जलमार हन्नेस्सन ने इस हथौड़े के इतिहास को इन शब्दों में बयान किया था:

“1952 में जब न्यूयॉर्क की पूर्वी नदी के किनारे पर संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की मौजूदा इमारत का उदघाटन किया गया था तो आइसलैंड के प्रथम स्थाई प्रतिनिधि श्री थॉर थॉर्स ने महासभा के अध्यक्ष को ये हथौड़ा भेंट किया था. इसीलिए इस प्रतीक का नाम ‘थॉर्स का हथौड़ा’ पड़ गया.”

उस हथौड़े ने आठ वर्ष तक महासभा की सेवा की. लेकिन अक्तूबर 1960 में ये प्रतीक दुनिया भर में सुर्ख़ियों में छा गया. क्योंकि... ये टूट गया. अगर नपे-तुले शब्दों में कहा जाए तो ये उस समय के महासभा के अध्यक्ष फ्रेडरिक बोलैंड ने तोड़ा था, जो आयरलैंड मूल के थे.

राजदूत बोलैंड सोवियत नेता निकिता ख़्रुश्चेव को शांत करना चाहते थे, विशेषतौर पर उन्हें मेज़ पर अपने जूते पटकने से रोकना चाहते थे.

महासभा हॉल में बहुत शोर हो रहा था और बोलैंड सदन में शांति और व्यवस्था क़ायम करना चाहते थे. इस प्रक्रिया में उन्होंने जब हथौड़े से मेज़ पर ज़ोर से चोट की तो वो टूट गया.

प्रेस रिपोर्टों में कहा गया था कि इस घटनाके बाद, बहुत से प्रतिनिधिमंडलों ने, बोलैंड के साथ एकजुटता दिखाते हुए और उनकी समीक्षा के लिए उन्हें दर्जनों प्रतीक चिन्ह भेजे.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र में आइसलैंड से ये अनुरोध करने का फ़ैसला किया गया कि बिल्कुल वैसा ही हथौड़ा बनाएँ जो टूट गया था. राजदूत हन्नेस्सन ने बताया कि मूल हथौड़े के मुक़ाबले उसके स्थान पर भेंट किए गए प्रतीक चिन्ह ने लगभग आधी सदी तक संयुक्त राष्ट्र की सेवा की है.  

उनका कहना था, “लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं हो जाती है. 2005 में मालूम हुआ कि ये हथौड़ा ग़ायब हो गया. संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने हमें इस बारे में सूचित किया. हमने तुरंत अपना जवाब भेजा कि आइसलैंड हथौड़ी की दूसरी प्रति बनाने के लिए तैयार है. इस बार इबारत लिखने वाली एक मशहूर नक्काशीदार कलाकार थीं जिनका नाम था – सिगरिदूर क्रिस्टजैन्सडोट्टिर.”

आइसलैंड सरकार ने इन कलाकार से हथौड़े के साथ पहले हुई घटना पर ध्यान देते हुए, ख़ासतौर से नया प्रतीक कुछ मज़बूत बनाने का अनुरोध किया. इस बार उन्होंने ये प्रतीक बनाने के लिए नाशपाती का पेड़ चुना. क्या ये सही चुनाव था, अब वर्ष 2019 आ चुका है, बाक़ी तो वक़्त ही बताएगा.

इस हथौड़े में आइसलैंडिक और लैटिन भाषा में कुछ इबारत लिखी एक छोटी सी तख़्ती लगाई गई है. ये आइसलैंडिक कथाओं का एक अंश है जिनका मूल 10वीं सदी में है.

आइसलैंड के राजदूत का कहना था कि इस अवधि के दौरान आइसलैंड ने ईसाइयत को अपनाया जिसने अंदरूनी लड़ाई-झगड़ों और संघर्षों को ख़त्म करके देश का एकीकरण किया. और तब के एक नेता ने कहा था: ‘समाजों का निर्माण क़ानूनों के बुनियाद पर होना चाहिए.’ ये वाक्य इस वक़्त महासभा के इस हथौड़े पर उकेरे गए हैं.”

ये हथौड़ा दरअसल शांति का कोई औज़ार या उपकरण नज़र नहीं आता है, जैसाकि आप और हम सोचते होंगे, जैसाकि घुमंतियों के दौर में परंपरा होती थी. लेकिन जैसाकि इतिहास हमें बताता है, यहाँ तक कि न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में स्थित विश्व संसद में, विश्व नेताओं को शांति का संदेश देने के लिए अक्सर पुरातनपंथी शक्ति का प्रदर्शन ज़रूरी नज़र आता है.

 

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