चार करोड़ लोग दासता के दंश का शिकार

10 सितम्बर 2019

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ उर्मिला भूला ने जिनीवा में मानवाधिकार परिषद में सोमवार को आगाह किया कि दासता के आधुनिक स्वरूप के मामलों के आने वाले दिनों में बढ़ने की संभावना है. इस संबंध में परिषद को एक रिपोर्ट सौंपते हुए उन्होंने कहा कि कामकाज के क्षेत्र में आ रहे बदलावों और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के परिणामस्वरूप ऐसा होगा.

दासता के समकालीन स्वरूपों के विषयों पर यूएन की स्पेशल रैपोर्टियर उर्मिला भूला ने बताया कि विश्व भर में 4 करोड़ से ज़्यादा लोग दासता के शिकार हैं – इनमें एक करोड़ बच्चे हैं.

पर्यावरण को क्षति पहुंचने, प्रवासन और जनसांख्यिकी के बदलते रुझानों से दासता के पीड़ितों की संख्या बढ़ने की आशंका है.

जबरन मज़दूरी कर रहे कुल लोगों की संख्या का 60 फ़ीसदी हिस्सा निजी क्षेत्र में है और महिलाएं व लड़कियां विशेष रूप से इससे प्रभावित होती हैं.

महिला पीड़ितों में 98 फ़ीसदी से ज़्यादा को यौन हिंसा का भी सामना करना पड़ता है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुमान के मुताबिक़ विश्व भर में 2 करोड़ 49 लाख लोगों से जबरन मज़दूरी कराई जा रही है और डेढ़ करोड़ से ज़्यादा लोगों को  बल पूर्वक शादी कराए जाने के बाद जीवन यापन करना पड़ रहा है.

उर्मिला भूला का कहना है कि इस प्रकार के रुझान नींद से जगा देने वाली पुकार का काम करते हैं.

वर्ष 2015 में सदस्य देशों ने टिकाऊ विकास लक्ष्यों के तहत तय किए उद्देश्यों - लक्ष्य 5.2 और 8.7 – को पूरा करने का संकल्प लिया था जिनके ज़रिए तस्करी को जड़ से ख़त्म करने, महिलाओं के प्रति हिंसा रोकने और दासता के आधुनिक स्वरूपों का उन्मूलन करना था. इस संकल्प के चार साल बाद ये हैरान कर देने वाले आंकड़े सामने आए हैं.

मौजूदा समय में जलवायु परिवर्तन की चुनौती इस संकट को और गहरा बना रही है. “जलवायु परिवर्तन की वजह से लोग अपनी आजीविका खो सकते हैं, अच्छे और उपयुक्त कामकाज के अभाव में युवा असुरक्षित रास्तों से सफ़र कर सकते हैं और कामकाजी दुनिया में स्वचालन (ऑटोमेशन) जैसे बदलाव पहले से ही मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे लोगों से काम छीन सकते हैं.”

यूएन विशेषज्ञ का कहना है कि इस वजह से पहले से ही संवेदनशील हालात में रह रहे लोगों के दासता का शिकार होने की आशंका बढ़ जाती है.

जो लोग इस समस्या से बच निकलने में सफल हो जाते हैं उनके लिए भी जीवन कठिन होता है. ‘ह्यमून राइट्स वॉच’ की जांच में पाया गया है कि अगर पीड़ित जान बचाकर अपने घर लौटने में कामयाब भी होते हैं तो उन्हें फिर वैसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, और उसके अलावा तथाकथित कलंक या दोषारोपण भी झेलने पड़ते हैं.

दासता पीड़ितों को ये त्रासदीपूर्ण वास्तविकताएँ झेलनी पड़ती हैं लेकिन उससे परे जाकर भी इसकी एक बड़ी क़ीमत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च में बढ़ोत्तरी, उत्पादकता में कमी और आय का नुक़सान होता है. निसंदेह इससे निपटने के लिए सदस्य देशों को बड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है.

उन्होंने कहा कि कामकाजी उम्र में पहुंच रहे युवाओं के लिए स्थिति और ज़्यादा गंभीर है.

इस दिशा में प्रगति के लिए ज़्यादा से ज़्यादा संसाधन जुटाने और ऐसी सार्वजनिक नीतियां अपनाने पर बल दिया गया है जिनसे प्रभावी ढंग से दासता के समकालीन रूपों को दूर किया जा सके.

 

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