हर 40 सेकंड में एक आत्महत्या, अब भी!

9 सितम्बर 2019

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि देशों में राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य सुधारों में प्रगति होने के बावजूद हर 40 सेकंड में आत्महत्या से एक व्यक्ति की मौत हो जाती है. संगठन के निदेशक ने दुनिया भर में आत्महत्याओं के अनुमानों के बारे में सोमवार को एक नई रिपोर्ट जारी करते हुए ये बात कही.

हर साल 10 सितंबर को आत्महत्याएँ रोकने के लिए विश्व दिवस मनाया जाता है. इस मौक़े पर जिनीवा में बात करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख डॉक्टर टैड्रोस एडेहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा कि हर किसी व्यक्ति की मौत परिवारों, उनके दोस्तों और सहयोगियों के लिए एक दर्दनाक हादसा होता है. अच्छी बात ये है कि बहुत सी आत्महत्याओं को अहतियाती उपायों के साथ रोका जा सकता है.

उनका कहना था कि सभी देशों को आत्महत्याएँ रोकने वाली सिद्ध रणनीतियों को अपने राष्ट्रीय स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यक्रमों में टिकाऊ तरीक़े से शामिल करना चाहिए.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
दुनिया भर में आत्महत्याओं के बारे में कुछ तथ्य व आँकड़े

इस मुद्दे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहली रिपोर्ट वर्ष 2014 में आई थी. तब से आत्महत्याओं को एहतियाती उपायों को अपनी राष्ट्रीय रणनीति में शामिल करने वाले देशों की संख्या बढ़कर 38 हो गई है. अलबत्ता, अभी ये संख्या उस लक्ष्य से बहुत कम है, और सरकारों को इसके लिए अपनी प्रतिबद्धता पक्की करनी होगी.

युवाओं में दूसरा सबसे बड़ा कारण

दुनिया भर में हर वर्ष लगभग 8 लाख लोगों की मौत आत्महत्या से होती है और हर एक मौत से पहले कम से कम बीस बार ख़ुदकुशी करने की कोशिश की जाती है. आत्महत्या से होने वाली मौतों की संख्या युद्धों और हत्याओं की वजह से होने वाली कुल मौतों से भी ज़्यादा होती हैं.

स्वास्थ्य एजेंसी का कहना है कि ख़ुदकुशी 15 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवाओं के बीच मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है. इस उम्र के लोगों की सबसे ज़्यादा मौतें सड़क हादसों में होती हैं.

दुनिया भर में 79 फ़ीसदी आत्महत्याएँ निम्न से मध्य आय वाले देशों में होती हैं, हालाँकि उच्च आय वाले देशों में आत्महत्याओं की दर सबसे ज़्यादा है. धनी देशों में महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ख़ुदकुशी के मामले तीन गुना ज़्यादा होते हैं जबकि ग़रीब देशों में महिलाओं और पुरुषों में आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या लगभग बराबर है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार उच्च आमदनी वाली देशों में आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध देखा गया है, अलबत्ता आत्महत्या के ज़्यादातर मामले संकट की स्थिति में बहुत घबराहट और मायूसी के लम्हों में होते हैं.

संगठन की रिपोर्ट में विस्तृत आँकड़े पेश करते हुए कहा गया है, “संघर्ष, संकट, आपदा, हिंसा, उत्पीड़न, किसी तरह का नुक़सान और अकेलेपन का अहसास जैसी स्थितियाँ आत्महत्या के मामलों से बहुत नज़दीक से जुड़ी हुई नज़र आई हैं.”

“ऐसे समूह जिन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है, उनमें आत्महत्याओं की उच्च दर देखी गई है, और आत्महत्या के लिए सबसे ज़्यादा नाज़ुक हालात ऐसी स्थितियों में देखे गए हैं जब ख़ुदकुशी करने की पहले भी कोशिश की गई हो.”

ख़ुदकुशी जैसी जटिल समस्या के समाधान के लिए अनेक पक्षों के बीच इसे रोकने के प्रयासों में एकजुटता और तालमेल की ज़रूरत है. मानसिक दशाओं, आत्महत्याओं को एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या मानने के बारे में जागरूकता की कमी और बहुत से समाजों में इस बारे में खुलकर बातचीत करने से बचने के चलन की वजह से बहुत से ऐसे लोगों को सही समय पर सही मदद नहीं मिल पाती है जिन्हें मदद की सख़्त ज़रूरत होती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसा है कि आत्महत्या का बर्ताव दर्शाने वाले लक्षण पहचाने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों की बेहतर ट्रेनिंग देने की ज़रूरत है ताकि वो सही समय पर इसे रोकने के लिए उपाय कर सकें.

साथ ही मानसिक स्थितियों का समय रहते सटीक इलाज किया जा सके, नशीले पदार्थों और मदिरा पान जैसी आदतों की निगरानी की जा सके, मीडिया द्वारा ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग और आत्महत्या करने के साधनों को सीमित करना भी कारगर उपाय हो सकते हैं.

20 फ़ीसदी ख़ुदकुशियाँ कीटनाशकों से

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पाया है कि दुनिया भर में कीटनाशक पीने से आत्महत्या करने के मामलों की दर वैसे तो बहुत ज़्यादा नहीं है लेकिन ये बहुत घातक साबित होती है. विश्व भर में आत्महत्या के मामलों में से लगभग 20 फ़ीसदी कीटनाशक रसायनों के ज़रिए ही होती है. चूँकि आत्महत्या करने के प्रयासों में अक्सर ख़तरनाक और ज़हरीले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है तो ज़्यादातर ऐसे मामलों में इनके नतीजे मौत के रूप में ही सामने आते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट दर्शाती है कि श्रीलंका में ख़तरनाक कीटनाशकों के बारे में सख़्त नियम और क़ानून बनाने से आत्महत्याओं के मामलों में 70 फ़ीसदी की कमी देखी गई है. इससे दस वर्ष की अवधि में लगभग 93 हज़ार लोगों की ज़िंदगी बचाने में कामयाबी मिली है.

संगठन ने आत्महत्या को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक प्राथमिकता वाला विषय क़रार दिया है. 2008 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मानसिक स्वास्थ्य अंतर कार्रवाई कार्यक्रम (एमएचगैप) शुरू किया था. इसमें मानसिक, न्यूरोलोजिकल और मादक पदार्थों के सेवन के मामलों में चिकित्सा सेवाओं के लिए तथ्यों पर आधारित दिशा-निर्देश जारी किए थे.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2013 से लेकर 2020 तक के एक्श्न प्लैन में वर्ष 2020 तक आत्महत्याओं के मामलों में 10 फ़ीसदी तक कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है, ये टिकाऊ विकास लक्ष्यों के अनुरूप होगा. इन लक्ष्यों में भी आत्महत्या के मामलों में वर्ष 2030 तक एक तिहाई की कमी लाने की बात कही गई है.

इस वर्ष के विश्व आत्महत्या निरोधक दिवस के मौक़े पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के लिए अनेक साझीदारों से हाथ मिलाया है. ये अभियान 10 अक्तूबर तक विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस तक जारी रहेगी जिसमें आत्महत्याओं को रोकने के लिए जागरूकता और प्रयास बढ़ाए जाएंगे.  

 

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