कश्मीर में भारत सरकार से प्रतिबंध हटाने की पुकार

22 अगस्त 2019

संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत सरकार से उसके प्रशासन वाले कश्मीर में उन प्रतिबंधों को हटाने का आहवान किया है जो अगस्त महीने के आरंभ में लगाए गए थे. इनमें विचार व्यक्त करने पर पाबंदी, सूचना पाने और शांतिपूर्ण तरीक़े से प्रदर्शनों पर प्रतिबंध शामिल हैं. 

भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को 5 अगस्त 2019 को हटा दिया था. 

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने के बाद लगाए गए इन प्रतिबंधों की वजह से क्षेत्र में तनाव और ज़्यादा बढ़ेगा. 

प्राप्त रिपोर्टों में कहा गया है कि 4 अगस्त 2019 की शाम से ही जम्मू कश्मीर में संचार माध्यमों पर लगभग पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है. इसमें इंटरनेट सेवाएँ, मोबाइल फ़ोन नैटवर्क, केबल और कश्मीरी टेलीविज़न चैनलों पर भी पाबंदी शामिल है. 

विशेषज्ञों ने गुरूवार को जारी एक वक्तव्य में कहा, "सरकार द्वारा इंटरनेट और दूरसंचार नैटवर्कों को  ठोस वजह बताए बिना बंद कर देना आवश्यकता और संतुलन के बुनियादी सिद्धांत से मेल नहीं खाता है."

"इतने बड़े पैमाने पर प्रतिबंध जम्मू कश्मीर के लोगों को सामूहिक रूप से दंडित करने का एक तरीक़ा बन गया है, जबकि  उनका कोई क़ुसूर भी नज़र नहीं आता है."

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत सरकार ने पूरे जम्मू कश्मीर में कर्फ्यू लगा दिया है, ख़ासतौर से कश्मीर घाटी में लोगों के आवागमन और शांतिपूर्ण सभाओं को नियंत्रित करने के लिए भारी संख्या में सैनिक व सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं.

उन्होंने कहा, “हम भारतीय अधिकारियों को याद दिलाना चाहते हैं कि भारत सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध बुनियादी तौर पर असंतुलित हैं क्योंकि इन प्रतिबंधों में किसी प्रस्तावित सभा की विशिष्ट परिस्थितियों पर ग़ौर करने के विकल्प को नज़रअंदाज़ किया गया है.”

मानवाधिकार विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि इस तरह की ख़बरें मिली हैं कि राजनैतिक हस्तियों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, प्रदर्शनकारियों और अन्य लोगों की गिरफ़्तारियों में बढ़ोत्तरी हुई है.

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि वो इन ख़बरों पर गंभीर रूप से चिंतित हैं कि भारतीय सुरक्षा बल रात में लोगों के घरों पर छापेमारी कर रही है जिनके बाद युवा लोगों को गिरफ़्तार भी किया जा रहा है.

विशेषज्ञों ने कहा, “लोगों को इस तरह बंदी बनाना मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जा सकता है. अधिकारियों को इस तरह के आरोपों की समुचित जाँच करानी होगी, और अगर ये आरोप सही साबित होते हैं तो ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करनी होगी.”

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा, “हम इन आरोपों पर भी गंभीर रूप से चिंतित हैं कि हिरासत में लिए गए कुछ लोगों के पते ठिकाने के बारे में जानकारी नहीं मिल रही है, साथ ही लोगों को जबरन ग़ायब करने की ख़तरा भी बढ़ गया है, ये ख़तरा विशेष रूप से बड़े पैमाने पर की जा रही गिरफ़्तारियों और इंटरनेट व अन्य संचार माध्यमों पर लगी पाबंदियों के माहौल में और ज़्यादा बड़ा रूप ले सकता है.”

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने प्रदर्शनाकारियों पर किए जा रहे अत्यधिक बल प्रयोग पर भी गंभीर चिंता जताई है, जिसमें जानलेवा गोलियाँ और बारूद का इस्तेमाल भी शामिल है. इसे लोगों के जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है, “भारत सरकार की ये ज़िम्मेदारी है कि प्रदर्शनों के दौरान क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने के तहत कम से कम ताक़त का इस्तेमाल किया जाए. इसका मतलब ये है कि जानलेवा ताक़त का इस्तेमाल अंतिम विकल्प के रूप में सिर्फ़ तभी किया जा सकता है जब किसी की ज़िंदगी बचाने की ज़रूरत हो.”

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संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ

डेविड केय (अमेरिका), विचारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण व प्रोत्साहन पर विशेष रैपोर्टेयर.

माइकल फ़ॉर्स्ट (फ्रांस), मानवाधिकारों के रक्षकों की स्थिति पर विशेष रैपोर्टेयर.

बर्नार्ड दुहाइम, चेयर रैपोर्टेयरजबरन और अनैच्छिक गुमशुदगी पर वर्किंग ग्रुप.

क्लेमेंट न्यालेत्सोस्सी वॉयले, शांतिपूर्ण तरीक़े से इकट्ठा होने और संगठन बनाने के अधिकार पर विशेष रैपोर्टेयर.

सुश्री एगनेस कैलामार्ड, क़ानून के दायरे से बाहर, ग़ैर-न्यायिक और मनमाने तरीक़े से हत्या मामलों पर स्पेशल रैपोर्टेयर.

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं.

 

 

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