टिकाऊ विकास लक्ष्य-13: जलवायु कार्रवाई

1 अगस्त 2019

पृथ्‍वी की जलवायु बदल रही है जिसका हमारे दैनिक जीवन और समुदायों के सहने की क्षमता पर गंभीर असर पड़ रहा है. चरम मौसम की बढ़ती घटनाओं, प्राकृतिक आपदाओं और समुद्र के चढ़ते जल स्‍तर से नए संकट उपज रहे हैं. जलवायु परिवर्तन की तेज़ी से उभरती चुनौती और उसके दुष्प्रभावों से निपटने के लिए टिकाऊ विकास एजेंडे का 13वां लक्ष्य प्रभावी कार्रवाई पर केंद्रित है. 

टिकाऊ विकास के 2030 एजेंडे से जुड़े 17 लक्ष्यों में से किसी एक लक्ष्य पर हर महीने हम अपना ध्यान केंद्रित करते हैं. इसी कड़ी में इस महीने हम टिकाऊ विकास के 13वें लक्ष्य पर जानकारी साझा कर रहे हैं जिसका उद्देश्य दुनिया में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए महत्वाकांक्षी कार्रवाई को सुनिश्चित करना है.

जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है जो किसी देश की सीमाओं में नहीं बंधी है. कहीं भी होने वाला उत्‍सर्जन हर जगह लोगों को प्रभावित करता है. यह एक ऐसी समस्‍या है जिसके समाधान के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर समन्‍वय की आवश्‍यकता है.

मौजूदा दौर में जलवायु परिवर्तन राष्‍ट्रीय अर्थव्‍यवस्‍थाओं को छिन्न-भिन्न कर रहा है.  मानवीय गतिविधियों की वजह से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगतार बढ़ना जारी है जो इस प्रक्रिया को तेज़ कर रहा है.

कारगर जलवायु कार्रवाई के अभाव में दुनिया में पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ता जाएगा और इस शताब्‍दी में यह वृद्धि 3 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक होगी - दुनिया के कुछ हिस्‍से तो इससे भी अधिक गर्म होने का अनुमान है. 

इसका सबसे विपरीत प्रभाव सबसे गरीब और सबसे लाचार लोगों पर पड़ेगा. जलवायु परिवर्तन, आपदाओं को भी बढ़ाता है और उसका सामना करना हमारे जीवन की रक्षा और आने वाली पीढि‍यों की खुशहाली के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक है. 

जलवायु परिवर्तन की समस्‍या का सामना करने के लिए देशों ने दिसम्‍बर 2015 में पेरिस में कॉप-21 सम्मेलन के दौरान पेरिस समझौते पर सहमति व्‍यक्‍त की. 

इस समझौते के अंतर्गत सभी देशों ने सहमति दी कि दुनिया के तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित रखने के लिए तथा गंभीर जोखिमों को देखते हुए 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए प्रयास किए जाएंगे. पेरिस समझौते पर अमल टिकाऊ विकास लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिए भी परम आवश्‍यक है.

अनेक प्रकार के तकनीकी उपायों के उपयोग और व्‍यवहार में बदलाव के जरिए अब भी संभव है कि दुनिया के औसत तापमान में वृद्धि को औद्योगीकरण के युग से पहले के स्‍तर से 2 डिग्री सेल्सियस ऊपर तक सीमित रखा जाए. आज ऐसे सस्‍ते और व्यवहारिक समाधान उपलब्‍ध हैं जिनकी मदद से अधिक स्‍वच्‍छ, मज़बूत और पर्यावरण के अनुकूल अर्थव्‍यवस्‍थाओं को संभव बनाया जा सकता है.

भारत और एसडीजी लक्ष्य-13

भारत ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्‍सर्जक है और 6.9 फ़ीसदी वैश्विक उत्‍सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है.  इसके बावजूद 2005 और 2010 के बीच भारत के सकल घरेलू उत्‍पाद की उत्‍सर्जन तीव्रता में 12% की कमी आई.

अक्‍टूबर 2015 में भारत ने संकल्‍प लिया कि वह 2005 के स्‍तर की तुलना में अपने जीडीपी की उत्‍सर्जन तीव्रता 2020 तक 20-25 प्रतिशत और 2030 तक 33-35 फ़ीसदी कम करेगा. 

2 अक्टूबर 2016 को भारत ने औपचारिक रूप से ऐतिहासिक पेरिस समझौते का अनुमोदन कर दिया. भारत ने अपने जीडीपी की उत्‍सर्जन तीव्रता में 2020 तक 20-25 प्रतिशत की कमी लाने का संकल्‍प लिया है. 

भारत सरकार ने इस समस्‍या से सीधे निपटने के लिए 'राष्‍ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्रवाई योजना' और 'राष्‍ट्रीय हरित भारत मिशन' को अपनाया है. 

इन राष्‍ट्रीय योजनाओं के साथ-साथ सौर ऊर्जा के इस्‍तेमाल, ऊर्जा कुशलता बढ़ाने, टिकाऊ पर्यावास, जल, हिमालय की पारिस्थितिकी को सहारा देने तथा जलवायु परिवर्तन के बारे में रणनीतिक जानकारी को प्रोत्‍साहित करने के बारे में अनेक विशेष कार्यक्रम भी अपनाए गए हैं.

एसडीजी-13 के मुख्य उद्देश्‍य

- सभी देशों में जलवायु से जुड़े खतरों और प्राकृतिक आपदाओं को सहने तथा उनके अनुरूप ढलने की क्षमता मजबूत करना

- जलवायु परिवर्तन उपायों को राष्‍ट्रीय नीतियों, रणनीतियों और नियोजन प्रक्रिया में शामिल करना

- जलवायु परिवर्तन का असर कम करने, उसके अनुरूप ढलने, प्रभाव घटाने और जल्‍दी चेतावनी देने के बारे में मानवीय और संस्‍थागत क्षमता तथा शिक्षा और जागरूकता पैदा करने की व्‍यवस्‍था में सुधार करना

- 'यूनाइटेड नेशन्स फ़्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' से संबद्ध विकसित देशों के संकल्‍पों पर अमल करना जिससे 2020 तक मिलकर सभी स्रोतों से प्रति वर्ष 100 अरब अमरीकी डॉलर जुटाए जा सकें जिससे जलवायु परिवर्तन को कम करने की सार्थक कार्रवाई और उस पर अमल में पारदर्शिता के संबंध में विकासशील देशों की जरूरतों को पूरा किया जा सके तथा ग्रीन क्‍लाइमेट फंड को जल्‍दी से जल्‍दी पूंजीकरण के जरिए पूरी तरह संचालित किया जा सके

- सबसे कम विकसित देशों और लघु द्वीपीय विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन से संबंधित कारगर नियोजन और प्रबंधन की क्षमता बढ़ाने वाले तंत्रों को प्रोत्‍साहन देना जिनमें महिलाओं, युवा और स्‍थानीय तथा हाशिए पर जीते समुदायों का ध्‍यान रखा जाए

- यह स्‍वीकार करना कि 'यूनाइटेड नेशन्स फ़्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' जलवायु परिवर्तन के बारे में वैश्विक कार्रवाई पर वार्ता का लिए मुख्य अंतरराष्‍ट्रीय, अंतर-सरकारी मंच है

 

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