1 अगस्त 2019

पूरे मानव इतिहास पर नज़र डालें तो प्रवासन और जलवायु को हमेशा एक दूसरे से जुड़ा हुआ पाएंगे लेकिन आधुनिक दौर में मानव निर्मित जलवायु संकट के गंभीर प्रभाव पूरी मानव जाति के रहन-सहन का सिलसिला व्यापक रूप से बदलने वाले हैं.

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के तहत एक प्रवासन, पर्यावरण और जलवायु संकट विभाग है जिसकी अध्यक्ष डीना लोनेस्को हैं. ये विभाग प्रवासन, पर्यावरण और जलवायु के बीच घनिष्ठ संबंधों का अध्ययन करने में सक्रिय रहा है.

यूएन समाचार के साथ बातचीत में डीना लोनेस्को ने कहा कि हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं जहाँ गंभीर नतीजों वाली जलवायु संबंधी घटनाएँ मानव निर्नित गतिविधियों से जुड़ी हुई हैं. इसका इंसानों के प्रवासन और किसी ख़ास स्थान पर बस जाने के तरीक़ों पर बहुत बड़ा असर पड़ने वाला है.

डीना लोनेस्को का कहना था, “पर्यावरण प्रवासन एटलस (Atlas of Environmental Migration) 45 हज़ार पहले तक के उदाहरण समेटे हुए है. इस एटलस में नज़र आता है कि पूरे अतीत में पृथ्वी पर जिस तरह से जनसंख्या का वितरण हुआ है उसमें पर्यावरण संबधी परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.”

“ऐसी बहुत संभावना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से उत्पन्न पर्यावरण बदलावों की वजह से मानव निवास के तरीक़ों में व्यापक बदलाव आने वाला है." 

"खेतीबाड़ी के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भूमि का भविष्य में होने वाला क्षरण, नाज़ुक पारिस्थिति-तंत्र में उत्पन्न होने वाली रुकावट और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की कमी के कारण लोगों के जीवन और घरों पर सीधे तौर पर व्यापक असर पड़ने वाला है.”

जलवायु परिवर्तन पहले ही अपना असर दिखाने लगा है: आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र के अनुसार 2018 के दौरान लगभग एक करोड़ 72 लाख लोगों को प्राकृतिक आपदाओं की वजह से अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और उनकी ज़िन्दगी नकारात्मक रूप में प्रभावित हुई.

पर्यावरण में कुछ धीमे बदलाव भी हो रहे हैं, मसलन, समुद्रों में रसायनीकरण बढ़ना, रेगिस्तानों में बढ़ोत्तरी होना और समुद्री तटों का क्षरण, ये भी लोगों की आजीविका को प्रभावित कर रहे हैं. साथ ही इन कारणों से लोगों के मूल स्थानों में बसने और जीवित रहने की क्षमताओं पर भी असर पड़ रहा है.

डीना लोनेस्को का कहना था कि भविष्य में बेहतर हालात की तलाश में और भी ज़्यादा लोगों के विस्थापन या प्रवासन की संभावना होगी क्योंकि उनके मूल स्थानों पर रहने के लिए हालात बेहद ख़राब हो रहे हैं.

उनका कहना था, “ऐसे अनुमान हैं कि इन ख़तरनाक जलवायु संबंधी बदलावों के कारण 21वीं सदी में और भी ज़्यादा संख्या में लोग प्रवास करेंगे. जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) बार-बार कहता रहा है कि जलवायु संकट की वजह से होने वाले बदलावों से लोगों के प्रवासन के तरीक़ों में बदलाव आएगा."

"विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक अगर जलवायु परिवर्तन को रोकने क लिए ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो साल 2050 तक विश्व के तीन क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की वजह से लगभग 14 करोड़ 30 लाख लोग आंतरिक रूप में प्रवासी बनेंगे.”

 

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