अफ़ग़ान शांति में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका ज़रूरी

21 जुलाई 2019

संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव आमिना जे मोहम्मद ने रविवार को एक  ज़ोरदारअपील जारी करते हुए कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में सभी पक्षों को अतीत की तकलीफ़ों और मतभेदों को भुलाकर सुलह करनी चाहिए और देश में शांति स्थापना के प्रयासों में महिलाओं को भी अहम भूमिका देनी चाहिए. आमिना मोहम्मद ने संक्षिप्त अफ़ग़ान यात्रा के दौरान रविवार को ये भी कहा कि एक ऐसी राजनैतिक प्रक्रिया क़ायम की जाए जिसमें सभी की भागीदारी हो, ख़ासतौर से महिलाओं की आवाज़ को वास्तविक रूप में प्रमुख जगह मिले.

आमिना मोहम्मद ने दो दिन का मिशन पूरा करने के बाद रविवार को राजधानी काबुल में पत्रकारों से बातचीत में ये बातें कहीं.

इस मिशन में उप महासचिव आमिना मोहम्मद ने संयुक्त राष्ट्र की कुछ वरिष्ठ महिला पदाधिकारियों के दो दिवसीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. इस संक्षिप्त मिशन का उद्देश्य अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के लिए एकजुटता ज़ाहिर करने के साथ-साथ शांति और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना था.

Fardin Waezi / UNAMA
संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव आमिना जे मोहम्मद (मध्य - बाएँ) अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी से काबुल में मुलाक़ात करते हुए (20 जुलाई 2019)

आमिना मोहम्मद के इस मिशन में संयुक्त राष्ट्र के राजनैतिक और शांति स्थापना मामलों की प्रमुख रोज़मैरी डीकार्लो, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की कार्यकारी निदेशक नतालिया कैनेम और संयुक्त राष्ट्र महिला (संगठन) की अध्यक्ष फ्यूमज़िले म्लाम्बो नग्क्यूका भी शामिल थीं.  

महासचिव आमिना मोहम्मद ने कहा कि उन्होंने ये दो दिन का दौरा ख़ासतौर से चुनाव को देखते हुए किया है जो सितंबर में होने वाले हैं. साथ ही उनका ये दौरा शांति प्रक्रिया को समर्थन दिखाने के लिए भी था. उन्होंने कहा कि देश के भविष्य के लिए शांति स्थापना बहुत ज़रूरी है.

साथ ही अफ़ग़ानिस्तान के लोगों व सरकार के प्रयासों और आकांक्षाओं व उम्मीदों के लिए भी शांति स्थापना बहुत महत्वपूर्ण है.

कुछ ही दिन पहले राजधानी में काबुल विश्वविद्यालय के बाहर हुए बम विस्फोट में कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई जिनमें मुख्य रूप से छात्र और एक यातायात अधिकारी शामिल थे. 33 अन्य लोग घायल भी हुए.

इसके अलावा कथित रूप से तालेबान चरमपंथियों ने कंधाहार में पुलिस मुख्यालय के बाहर बम धमाका किया जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई और 90 से ज़्यादा घायल हो गए.

इन हिंसक घटनाओं के बावजूद अफ़ग़ान राजनैतिक नेताओं ने तालेबान प्रतिनिधियों के साथ क़तर में पिछले सप्ताह के आरंभ में बातचीत की जिसे बहुत अहम बताया जा रहा है. दोनों ही पक्षों ने आहवान किया कि आम लोगों की मौत और घायल होने की संख्या में कमी लाना बहुत ज़रूरी है.

आमिना मोहम्मद ने राजधानी काबुल में पत्रकारों से कहा, “दो दिन की अपनी संक्षिप्त यात्रा के दौरान हम सरकार के सभी स्तरों पर नेतृत्व से बहुत प्रभावित हुए हैं – राजधानी काबुल से लेकर स्थानीय इलाक़ों तक, जहाँ आपको नज़र आएगा कि अच्छे भविष्य के लिए किस तरह से लोगों का जीवन बेहतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, ख़ासतौर से महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए.”

संयुक्त राष्ट्र के इस उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और देश के प्रमुख कार्यक्रारी अधिकारी अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह से भी शनिवार को मुलाक़ात की. साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय महिलाओं से भी मुलाक़ात की जिसकी मेज़बानी देश की प्रथम महिला रूला ग़नी ने की.

प्रतिनिधिमंडल की सदस्यों ने देश के धार्मिक नेताओं से भी मुलाक़ात की. ध्यान रहे कि अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया में धार्मिक नेताओं की बहुत अहम भूमिका समझी जाती है. 

बामयान दौरा

संयुक्त राष्ट्र के इस उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को राजधानी काबुल से बाहर निकलकर बामयान का दौरा किया.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष बामयान में प्रजनन सक्रियता वाली उम्र की महिलाओं और परिवारों के कल्याण और लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए चलाई जा रहे अनेक कार्यक्रमों और सेवाओं में सहयोग दे रहा है.

Fardin Waezi / UNAMA
संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव आमिना जे मोहम्मद (दाएँ) अफ़ग़ानिस्तान के बामयान में बारूदी सुरंगें हटाने वालों के साथ बातचीत करते हुए (21 जुलाई 2019)

इन प्रतिनिधियों ने उन इलाकों का भी दौरा किया जहाँ बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय करने का काम चल रहा है.

इस प्रतिनिधिमंडल ने बामयान में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित स्थल का भी दौरा किया जहाँ महात्मा बुद्ध की विशालकाय मूर्ति थी. इस मूर्ति को 2001 में तालेबान ने सत्ता में आने के बाद विस्फोटकों से ध्वस्त कर दिया था.

संयुक्त राष्ट्र उप महासचिव आमिना मोहम्मद ने पत्रकारों से कहा कि इस यात्रा के दौरान महिलाओं से हुई बातचीत से उन्हें ये समझने में देर नहीं लगी कि अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएँ नेतृत्व और महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में बहुत अच्छा काम कर रही हैं.

"उन्हें ये भी अच्छी तरह मालूम है कि उन्हें भविष्य में क्या करना है और किस दिशा में जाना है. साथ ही वो ये भी जानती हैं कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र से क्या सहयोग व समर्थन चाहिए."

आमिना मोहम्मद ने कहा, “हमने उनसे बहुत से संदेश हासिल किए हैं – चुनावों के बारे में ये संदेश कF वो समय पर हों और विश्वसनीय हों, और उनमें सभी की भागीदारी हो, साथ ही महिलाओं की आवाज़ भी सुनी जाए.”

शांति प्रक्रिया पर उन्होंने कहा कि इसका समावेशी होना बहुत अहम है. और समावेशी का मतलब है कि महिलाओं को केंद्रीय महत्व दिया जाए, विशेष रूप में तब जबकि हिंसा के प्रभावितों और पीड़ितों की ज़रूरतों और मुश्किलों को समझने और उनके हल तलाश करने का मुद्दा सामने हो तो.

उप महासचिव आमिना मोहम्मद ने कहा, “जब तक आप अतीत की तकलीफ़ों और मतभेदों को नहीं भुलाएंगे, तब तक आप शांति और स्थिरता हासिल नहीं कर सकते. इसलिए ये हम सभी के लिए बेहतरीन अवसर है.”

उन्होंने कहा कि इस यात्रा के दौरान उन्होंने ये भी देखा कि संयुक्त राष्ट्र और उसके साझीदार संगठनों ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में जो निवेश किया, उसका किस तरह फल मिल रहा है.

‘अफ़ग़ान महिलाओं की हर क़दम पर मदद होगी’

इस मौक़े पर संयुक्त राष्ट्र महिला (संगठन) की अध्यक्ष म्लाम्बो नग्क्यूका का कहना था कि वो उन अफ़गान महिलाओं की आपबीती सुनकर दंग रह गईं कि जो तालेबान के दमनकारी शासन की भारी तकलीफ़ों के बोझ की यादों के साथ किस तरह जीने की कोशिश कर रही हैं.

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संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव आमिना जे मोहम्मद (दाएँ-तीसरी) अफ़ग़ानिस्तान के बामयान में आग़ा ख़ान अस्पताल का दौरा करते हुए (21 जुलाई 2019)

याद रहे कि तालेबान ने लड़कियों और महिलाओं के शिक्षा हासिल करने, कामकाज करने और यहाँ तक कि सार्वजनिक स्थानों पर अपने विचार व्यक्त करने और पुरुष के बिना घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगा दिया था.

उन्होंने कहा, “इन सब महिलाओं ने अपनी आवाज़ और अपने विचारों को अहमियत दिए जाने की लगातार और ज़ोरदार तरीक़े से हिमायत की है. इसमें उनकी प्राथमिकताओं को जगह मिलने और उनके महिला वजूद को सर्वमान्य पहचान मिलने की माँगें शामिल रही हैं.”

संयुक्त राष्ट्र महिला (संगठन) की अध्यक्ष ने ये भी कहा कि इस तरह की माँग करने वाली अफ़ग़ान महिलाएँ अकेली नहीं हैं, संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन और पूरा संयुक्त राष्ट्र उनके हर क़दम पर उनका साथ देने के लिए हमेशा तैयार है.

उन्होंने कहा कि तालेबान के साथ शांति वार्ता की गति जैसे-जैसे बढ़ रही है, ये सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है कि शांति प्रक्रिया व आगामी चुनावों में भी महिलाओं की भागीदारी हो. 

“महिलाओं को भी ये परिभाषित करने का पूरा अधिकार होना चाहिए कि देश में शांति प्रक्रिया के उनके लिए क्या मायने हैं. साथ ही उन्हें उन मेज़ों पर बैठकर अपनी बात कहने का पूरा अधिकार हो जहाँ बैठकर देश के भविष्य को कोई आकार देने के फ़ैसले होते हैं. तभी हम अफ़ग़ानिस्तान में शांति और लोकतंत्र को फलते-फूलते देख सकेंगे.”

लैंगिक हिंसा को रोकना सभी की ज़िम्मेदारी

बामयान में जितनी भी महिलाएं बच्चों को जन्म देती हैं, उनमें से लगभग आधी महिलाओं के बच्चों का जन्म घर पर ही होता है और वो भी प्रशिक्षित दाई की मदद के बिना. बामयान में महिलाओं पर होने वाली हिंसा भी एक गंभीर मुद्दा है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का कहना है कि कम से कम 20 प्रतिशत महिलाएँ किसी ना किसी तरह की घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष अफ़ग़ान सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्रालय के सहयोग से परिवार सुरक्षा केंद्रों का एक नैटवर्क चलाता है.

ये परिवार सुरक्षा केंद्र मुख्य अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं में चलाए जाते हैं.

इस मुहिम के तहत ऐसे लगभग 100 परिवार स्वास्थ्य सुविधाओं को भी सहयोग दिया जाता है जिनमें लगभग तीन लाख ऐसी महिलाओं को प्रजनन, जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य की सेवाएँ दी जाती हैं जिन तक ये सुविधाएं अन्य तरीक़ों से नहीं पहुँचती हैं.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की प्रमुख नतालिया कैनेम का कहना था कि यौन व लैंगिक हिंसा को रोकना हम सभी की सामूहिक ज़िम्मेदारी है.

लैंगिक हिंसा से ना सिर्फ़ महिलाओं की मर्यादा, सम्मान, स्वास्थ्य और सामान्य जीवन पर असर पड़ता है बल्कि इससे समुदाय में उनकी सक्रिय भागीदारी और शांति में सक्रिय योगदान में भी बाधा उत्पन्न होती है.

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष एजेंसी अफ़ग़ानिस्तान में इस जद्दोजहद में मोर्चे पर मौजूद है, साथ ही पूरी दुनिया में इस क्षेत्र में वास्तविक बदलाव लाने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका में सक्रिय योगदान कर रही है.

उन्होंने कहा कि अगर हम लैंगिक समानता, मानवाधिकार व न्याय हासिल करने के लिए एकजुट होकर काम करें तो किसी एक समय में किसी एक महिला, किसी एक समुदाय और किसी एक देश को इस अभिशाप से छुटकारा ज़रूर दिला सकते हैं.

उनका कहना था, “इस यात्रा के दौरान मैंने ऐसी लड़कियों और महिलाओं से मुलाक़ात की है जिन्होंने बहुत तकलीफ़ें उठाई हैं, उनका हौसला और हिम्मत देखकर मेरे अंदर अफ़ग़ानिस्तान के एक बेहतर भविष्य की उम्मीद भरी है.”

उन्होंने कहा कि “संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष अफ़ग़ान महिलाओं के स्वास्थ्य और रोज़मर्रा के जीवन में सुधार लाने के लिए संकल्पबद्ध है जिसमें अपनी पसंद चुनने और समानता वाला जीवन जीने की बुनियाद भी शामिल हैं. हमें इसमें कामयाबी मिल रही है लेकिन अभी मंज़िल बहुत दूर है.”

जनसंख्या कोष की अध्यक्ष का कहना था कि जब महिलाएँ सुरक्षित होती हैं और उन्हें अपने शरीरों और जीवन के बारे में ख़ुद फ़ैसले लेने का अधिकार होता है तभी कोई देश टिकाऊ विकास और शांति के लक्ष्य हासिल करने में कामयाब हो सकता है.

 

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