विश्व भर में 82 करोड़ लोग भुखमरी से पीड़ित

15 जुलाई 2019

दुनिया भर में पिछले तीन वर्षों में भुखमरी का शिकार लोगों की संख्या में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है – वर्तमान में हर नौ में से एक व्यक्ति भुखमरी से पीड़ित है. संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (UNFAO) ने सोमवार को एक नई रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ़ फ़ूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड 2019’ जारी की है जिसमें यह जानकारी सामने आई है.

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में 82 करोड़ लोगों के पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं था जबकि वर्ष 2011 में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 81 करोड़ थी. एशिया में भुखमरी से 51 करोड़ 39 लाख लोग पीड़ित हैं जबकि अफ़्रीका में यह संख्या 25 करोड़ 61 लाख है.

रिपोर्ट बताती है कि 2030 के टिकाऊ विकास एजेंडा में ‘Zero Hunger’ या भुखमरी को पूरी तरह ख़त्म करने के लक्ष्य को हासिल करने में नए आंकड़े एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं.

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उच्च-स्तरीय राजनैतिक मंच (High Level Political Forum) की बैठक चल रही है और उसी दौरान यह रिपोर्ट जारी की गई है.

रिपोर्ट दर्शाती है कि अफ़्रीका के कुछ क्षेत्रों में भुखमरी 20 फ़ीसदी तक बढ़ी है और इन्हीं इलाक़ों में बड़े पैमाने पर अल्पपोषण के भी मामले सामने आए हैं. 

लातिन अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्र में भुखमरी की दर सात प्रतिशत से कम है लेकिन यह बढ़ रही है.

वहीं एशिया में 11 प्रतिशत जनसंख्या अल्पपोषण का शिकार है.

दक्षिणी एशिया में पिछले पांच वर्षों में ज़बरदस्त प्रगति हुई है लेकिन अब भी यहां अल्पपोषण बड़े स्तर पर व्याप्त है.

यूएन खाद्य एवं कृषि संगठन ने इस रिपोर्ट को कृषि विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय फ़ंड (IFAD), संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF), विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ मिलकर संयुक्त रूप से जारी किया है.

रिपोर्ट में भुखमरी के मुद्दे से आगे जाकर खाद्य असुरक्षा के वृहद प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण किया गया है.

इस रिपोर्ट में पहली बार टिकाऊ विकास लक्ष्य एजेंडा के दूसरे लक्ष्य – भुखमरी का अंत - के तहत मध्यम और गंभीर खाद्य असुरक्षा के दायरे की निग़रानी के लिए एक अन्य संकेतक शामिल किया गया है.

यह दर्शाता है कि विश्व आबादी के 17.2 फ़ीसदी हिस्से यानी क़रीब एक अरब 30 लाख लोगों को नियमित रूप से पोषक और पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं है.

रिपोर्ट के अनुसार, “अगर वे भुखमरी का शिकार नहीं भी हैं तो भी उनके कुपोषण और ख़राब स्वास्थ्य से पीड़ित होने का जोखिम बहुत ज़्यादा है."

मध्यम और गंभीर स्तर पर व्याप्त खाद्य असुरक्षा के मामलों को एक साथ जोड़ने पर इस समस्या से पीड़ित लोगों की संख्या क़रीब दो अरब आंकी गई है. हर महाद्वीप पर पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा पीड़ित हैं.

जन्म के समय कम वज़न बड़ी चुनौती

रिपोर्ट में बच्चों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा गया है कि वर्ष 2012 से जन्म के समय बच्चों का वज़न कम होने की समस्या में सुधार के मोर्चे पर कोई प्रगति नहीं हुई है.

नाटेपन का शिकार होने वाले पांच साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या में पिछले छह वर्षों में 10 फ़ीसदी की कमी आई है लेकिन प्रगति की रफ़्तार बेहद धीमी है और टिकाऊ विकास एजेंडा के लक्ष्य को हासिल करने से अभी दुनिया बहुत दूर है.

ज़्यादा वज़न होने और मोटापे  से ग्रस्त लोगों की संख्या सभी क्षेत्रों में बढ़ रही है, विशेषकर स्कूली बच्चों और वयस्कों में.

खाद्य सुरक्षा और पोषण का ख़याल रखने के लिए ऐसी आर्थिक और सामाजिक नीतियों की पैरवी की गई है जिनसे आर्थिक संकट के असर को निष्प्रभावी किया जा सके ताकि ज़रूरी सेवाओं में कटौती की ज़रूरत न पड़े.

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि कई देशों में आर्थिक स्थिति बेहतरी की दिशा में जा रही है लेकिन वहां व्याप्त विषमता के कारण भुखमरी और कुपोषण के विरूद्ध प्रयास कमज़ोर पड़ रहे हैं.

जिन देशों में अर्थव्यवस्था सुस्त हुई या सिकुड़ी है उन देशों में भुखमरी बढ़ रही है और ऐसा अधिकतर मध्यम-आय वाले देशों में हो रहा है.

आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार के सुस्त पड़ने से उन क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा और पोषण पर ज़्यादा असर पड़ता है जहां भारी असमानता व्याप्त है.

“आय असमानता होने से खाद्य असुरक्षा का स्तर गंभीर होने की संभावना बढ़ जाती है और मध्यम-आय वाले देशों की तुलना में अल्प-आय वाले देशों में इसका प्रभाव 20 फ़ीसदी ज़्यादा देखने को मिल सकता है.”

रिपोर्ट में आर्थिक उथल-पुथल की स्थिति में भी खाद्य और पोषण सुरक्षा के ज़रूरी स्तर को बनाए रखने के लिए अल्प समय और दीर्घकाल के लिए नीतियाँ अपनाने के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए हैं.

इसके लिए खाद्य और पोषण सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को ग़रीबी घटाने के प्रयासों के साथ एकीकृत करने पर ज़ोर दिया गया है.

ग़रीबों के हितों को आगे बढ़ाने वाले और समावेशी ढांचागत बदलावों के ज़रिए ऐसा किया जा सकता है.

 

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