प्रवासियों द्वारा भेजी रक़म से ग़रीबों को बड़ा सहारा

16 जून 2019

अपने घर, गाँव, शहर और देश छोड़कर रोज़ी रोटी कमाने के लिए निकलने वाले लोग दुनिया में जहाँ भी रहते हैं वहाँ से अपने मूल स्थानों में रहने वाले परिवारों व समुदायों को हर साल भारी रक़म भेजते हैं. प्रवासियों के इस योगदान को महत्व देने के लिये हर वर्ष 16 जून को अंतरराष्ट्रीय दिवस (International Day of Family Remittances) मनाया जाता है. 

ये रक़म छोटी-बड़ी कैसी भी हो सकती है, मगर दुनिया भर में एक टिकाऊ जहाँ बनाने में इसकी बहुत अहम भूमिका है. इसकी महत्ता के बारे में और ज़्यादा जानकारी के लिए कुछ महत्वपूर्ण तथ्य प्रासंगिक होंगे: 

1. हर नौ में से एक व्यक्ति को फ़ायदा 

वर्तमान में दुनिया भर में लगभग एक अरब लोग यानी हर सात में से एक व्यक्ति प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म से किसी ना किसी रूप में संबंधित हैं. इनमें या तो रक़म भेजने वाले हैं या रक़म हासिल करने वाले. विश्व भर में लगभग 80 करोड़ यानी हर नौ में से एक व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हेअपने परिवार के प्रवासी सदस्यों द्वारा भेजी गई रक़म मिलती है. ये वो लोग होते हैं जो कामकाज व रोज़गार की तलाश में अपना घर, परिवार, गाँव, शहर व देश छोड़कर जाते हैं. 

2. प्रवासियों की आमदनी का 15 फ़ीसदी 

प्रवासी लोग हर एक या दो महीने में  औसतन 200 से 300 अमरीकी डॉलर के बीच की रक़म अपने परिवारों या मूल स्थानों को भेजते हैं. ये उनकी कुल आय का सिर्फ़ लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा होता है जबकि आम धारणा अक्सर इसके उलट होती है. बाकी 85 प्रतिशत हिस्सा वो वहीं ख़र्च करते हैं जहाँ रहकर वो कामकाज करके ये रक़म अर्जित करते हैं. यानी स्थानीय समुदायों और अर्थव्यवस्था को भी बड़ा फ़ायदा पहुँचाते हैं. 

3. रक़म भेजना बहुत महंगा है 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये धन भेजने में उनका ख़र्चा भी काफ़ी होता है. जिस देश में रहकर वो आय अर्जित करते हैं वहाँ से मुद्रा विनिमय के ज़रिये अपने देश की मुद्रा में परिवर्तित करके ये रक़म काफ़ी महंगा सौदा है. जितनी रक़म वो भेजते हैं उसका लगभग 7 फ़िसदी हिस्सा 

मुद्रा परिवर्तन और उसे भेजने में का ख़र्च आता है. टिकाऊ विकास लक्ष्यों के ज़रिए इस ख़र्च को 7 फ़ीसदी से कम करके 3 फ़ीसदी पर लाने की कोशिश की जा रही है.  

तकनीकी आधुनिकीकरण, मोबाइल टैक्नोलॉजी, डिजिटल तकनीक वग़ैरा आर्थिक और मुद्रा बाज़ारों का चरित्र बदलने की क्षमता रखते हैं. इनकी बदौलत बेहतर नियम-क़ानून लागू करने और मुद्रा विनिमय व रक़म भेजने जैसे काम आसान और कम ख़र्चीले होने की उम्मीद की जा रही है. 

4. भेजी जाने वाली रक़म से ग़रीबी दूर करने में मदद  

अलबत्ता ये रक़म भेजने वालों की कुल आय का मात्र 15 प्रतिशत होता है, मगर जहाँ ये रक़म जाती है वहाँ घर-परिवार की कुल आमदनी का बड़ा हिस्सा होती है.इसलिए इस रक़म से करोड़ों परिवारों बहुत ठोस सहारा मिलता है.  

अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष के अध्यक्ष गिलबर्ट एफ़ हाँगबो का कहना था, “ मुद्दा प्रवासियों द्वारा अपने घर-परिवारों को भेजी जाने वाली रक़म के आकार का नहीं बल्कि असल मुद्दा ये है कि इस रक़म से करोड़ों लोगों के जीवन पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.” 

“हर एक दो महीने में भेजी जाने वाली ये रक़म 200 से 300 अमरीकी डॉलर होती है मगर जिन परिवारों को मिलती है, उनकी कुल आमदनी का ये लगभग 60 फ़ीसदी हिस्सा होती है. इसलिए ये उन परिवारों और समुदायों के अस्तित्व और जीविका के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है.” 

5. ये रक़म टिकाऊ विकास लक्ष्यों में मददगार 

जब प्रवासी लोग अपने घर परिवारों को रक़म भेजते हैं तो उससे 2030 के टिकाऊ विकास एजेंडा के लक्ष्यों को पूरा करने में बड़ी मदद मिलती है. इनमें कुछ महत्वपूर्ण हैं - टिकाऊ विकास लक्ष्य-1 : ग़रीबी का उन्मूलन, टिकाऊ विकास लक्ष्य-2: भुखमरी का ख़ात्मा, टिकाऊ विकास लक्ष्य-3: अच्छा स्वास्थ्य व मानक जीवन यापन, टिकाऊ विकास लक्ष्य-4: गुणवत्ता वाली शिक्षा की उपलब्धता, टिकाऊ विकास लक्ष्य-6: स्वच्छ पानी व स्वच्छता के साधनों की आसान उपलब्धता, टिकाऊ विकास लक्ष्य-8: गुणवत्ता वाले रोज़गार व आर्थिक प्रगति के अवसरों की उपलब्धता, टिकाऊ विकास लक्ष्य-10: असमानता को दूर करना.  

प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म की मौजूदा रफ़्तार अगर यूँ ही जारी रही तो साल 2015 से 2030 के बीच लगभग 8.5 ट्र्लियन यानी 85 खरब डॉलर के बराबर रक़म भेजी जाएगी. इसमें से लगभग दो ट्रिलियन यानी क़रीब 20 खरब डॉलर की रक़म या तो बचत के रूप में रखी जाएगी या निवेश की जाएगी. ये दोनों ही टिकाऊ विकास लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करेंगे.  

अंतरराषट्रीय कृषि विकास कोष के अध्यक्ष गिलबर्ट एफ़ हाँगबो का कहना था कि इस रक़म प्रवाह के अच्छे परिणामों को ज़्यादा सुचारू बनाने में सरकारों, नियामकों और निजी क्षेत्र की बहुत अहम भूमिका है. इससे लगभग एक अरब लोगों को टिकाऊ विकास लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी. 

6. आधी रक़म ग्रामीण इलाक़ों में जाती है 

प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म का लगभग आधा हिस्सा सीधे ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचता है जहाँ बहुत ज़्यादा ग़रीबी देखने को मिलती है. दुनिया भर के ग़रीब और खाने-पीने के सामान की कमी का सामना करने वाले लगभग तीन चौथाई यानी 75 फ़ीसदी लोग ग्रामीण इलाक़ों में ही रहते हैं. एक अनुमान के अनुसार अगले पाँच वर्षों में प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म का लगभग दस खरब हिस्सा ग्रामीण इलाक़ों में पहुँचेगा. 

7. अंतरराष्ट्रीय मदद के मुक़ाबले ज़्यादा अहम 

प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय विकास सहायता और विदेशी निवेश से लगभग तीन गुना ज़्यादा होती है जो निजी स्रोतों से पहुँचती है. वर्ष 2018 में लगभग 20 करोड़ प्रवासियों ने अपने घर परिवारों को 689 अरब डॉलर की रक़म भेजी, इसमें से लगभग 529 अरब डॉलर की रक़म विकासशील देशों में पहुँची थी.  

अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष का अनुमान है कि वर्ष 2019 के दौरान अंतरराष्ट्रीय प्रवासी कामकारों द्वारा अपने परिवारों को भेजी जाने वाली रक़म 550 अरब डॉर होने का अनुमान है. ये वर्ष 2018 के मुक़ाबले लगभग 20 अरब डॉलर ज़्यादा होगी.  

8. इस रक़म प्रवाह में मदद के लिए संयुक्त राष्ट्र सक्रिय 

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि ग्रामीण इलाक़ों में प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म की बदौलत युवा पीढ़ी को अपने स्थान बदलने के बारे में कोई विवशता नहीं होगी, बल्कि उन्हें अपनी पसंद से अपना भविष्य चुनने में मदद मिलती है. 

अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष ने पिछले लगभग एक दशक के दौरान 40 से ज़्यादा देशों में प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म के सही निवेश की परियोजनाओं में मदद की है.

 

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