हिंसा की रोकथाम के लिए एकजुटता और मध्यस्थता ज़रूरी

12 जून 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि विश्व  में व्याप्त मानवीय पीड़ा को कम करने के लिए दो सबसे अहम ज़रिए हैं: हिंसा और संघर्ष की रोकथाम और मध्यस्थता के प्रयास. शांति प्रयासों के सफल होने के लिए आपसी एकजुटता और समावेशी संवाद की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है.

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने सुरक्षा परिषद को बताया कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र कई देशों और क्षेत्रों में हिंसा में शामिल विभिन्न पक्षों और शांति में साझेदारों के साथ मिलकर काम कर रहा है.

“जब हम तत्परता से काम करते हैं और एकजुट होते हैं, तब हम संकटों को बिगड़ने से रोक सकते हैं, ज़िंदगियों को बचा सकते हैं और पीड़ा को कम कर सकते हैं. ऐसा कर हम संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी मैंडेट को पूरा कर सकते हैं.”

उन्होंने बताया कि इस संबंध में कुछ उत्साहजनक संकेत मिले हैं, जैसे माली और मेडागास्कर में सफलतापूर्वक संवैधानिक ढंग से सत्ता का हस्तांतरण कर दिया गया; इथियोपिया और एरीट्रिया के बीच मेलजोल हुआ, दक्षिण सूडान में शांति समझौते को नए सिरे से शुरू किया गया और दशकों से चले आ रहे विवाद के बाद उत्तर मैसेडोनिया गणराज्य को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई.  

लेकिन उन्होंने माना कि कई देशों में अब भी हिंसा और संघर्ष से परिस्थितियां जटिल बनी हुई हैं. यमन में सरकार और हुती विद्रोहियों में स्टॉकहोम शांति समझौता एक ‘महत्वपूर्ण कदम’ रहा है, लेकिन अब इससे आगे बढ़ कर समस्या के निपटारे की ज़रूरत है.

संयुक्त राष्ट्र मध्य अफ़्रीकी गणराज्य में शांति समझौते को अमल में लाने के लिए प्रयासरत है. इस संबंध में सक्रिय रूप से अभियान चलाया जा रहा है ताकि हथियारबंद गुट समझौते का सम्मान करना जारी रखें. बुर्किना फ़ासो में भी यूएन की कई पक्षों से राष्ट्रीय स्तर बातचीत चल रही है और जातीय हिंसा को देखते हुए शांति की नींव मज़बूत करने की कोशिशें हो रही हैं.

UN Photo/Loey Felipe
संघर्षों की रोकथाम और मध्यस्थता के मुद्दे पर सुरक्षा परिषद में बुधवार को बैठक हुई.

शांति के रास्ते पर अवरोध कायम

इन प्रयासों के बावजूद अब भी शांति और सुरक्षा के रास्ते में बाधाएं बनी हुई हैं. उन्होंने क्षोभ ज़ाहिर करते हुए कहा कि कई पक्ष ऐसे हैं जो हिंसा रोकने का प्रयास नहीं करते या फिर आग में घी डालने का काम करते हैं जिससे अस्थिरता बढ़ती है.

चिंता उन देशों में भी बनी हुई है जो सीधे तौर पर हिंसा और संघर्ष से प्रभावित नहीं है लेकिन वहां लोकप्रियवाद के उभरने और नीतिगत ख़ामियों के चलते द्वेष, चरमपंथ और हाशिएकरण जैसी समस्याएं सिर उठा रही हैं.

ऐसे देशों में मानवाधिकारों, लैंगिक समानता और समावेशन जैसे मुद्दों पर हुई प्रगति खटाई में पड़ सकती है जिसके दुष्परिणामों को आम लोगों को भुगतना पड़ सकता है.  

यूएन प्रमुख ने टिकाऊ विकास लक्ष्यों के 2030 एजेंडा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके ज़रिए सहनशील और स्थिर समाजों के निर्माण का प्रयास किया जा रहा है जिससे हिंसा के सभी मूल कारणों को दूर करने में मदद मिलेगी.

औपचारिक शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी अब भी निर्धारित लक्ष्यों से पीछे है. महासचिव गुटेरेश ने कहा कि महिलाओं की हिस्सेदारी को बढ़ावा देने के लिए सृजनशील रणनीतियों का इस्तेमाल जारी रखा जाएगा.

60 करोड़ से ज़्यादा युवा हिंसाग्रस्त क्षेत्रों और नाज़ुक हालात में रहने को मजबूर हैं. मध्यस्थता और शांति निर्माण प्रक्रिया में वे भी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इस दिशा में प्रयासों की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि इस साल पहली बार ‘इंटरनेशनल सिम्पोज़ियम फ़ॉर यूथ पार्टिसिपेशन इन पीस प्रोसेस्स’ का आयोजन किया गया.

लेकिन उन्होंने आगाह किया कि व्यापक राजनीतिक प्रयासों के अभाव में हिंसा और संघर्ष की रोकथाम और मध्यस्थता के प्रयास सफल नहीं होंगे.

यूएन प्रमुख ने सुरक्षा परिषद और सभी सदस्य देशों से अनुरोध किया कि इन प्रयासों में सफलता के लिए आपसी एकता की ज़रूरत है और इसके ज़रिए ही ज़िम्मेदारियों का निर्वहन किया जा सकता है.

समावेशी संवाद की भावना

विश्व नेताओं के स्वतंत्र समूह ‘द एल्डर्स’ की प्रमुख के तौर पर आयरलैंड की पूर्व राष्ट्रपति मैरी रॉबिन्सन ने कहा कि शांति के हित में इन मुद्दों पर समावेशी संवाद, समझौते और आम सहमति की भावना के साथ आगे बढ़ा जाना चाहिए.

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पिछले कुछ दशकों में सुरक्षा परिषद, विशेषकर इसके पांच स्थाई देश, अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह निभाने में विफल रहे हैं. उन्होंने यूएन चार्टर में उल्लेखित संकल्पों के बजाए अपने राजनीतिक फ़ायदे को ज़्यादा ज़रूरी समझा है.

“रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल सहित आम लोगों पर व्यापक पैमाने पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए लाए गए प्रस्तावों पर जिस तरह बार-बार वीटो का इस्तेमाल किया गया उससे यह सीधे तौर पर दिखाई देता है.” उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक बड़े हादसे तक इंतज़ार नहीं करना चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की मून ने विश्वास जताया कि जब सुरक्षा परिषद आपसी सहयोग के साथ आगे बढ़ती है और एक मज़बूत साझा आवाज़ में बोलती है तो उसके निर्णयों का निर्णायक असर होता है.

“इस मज़बूत, साझा आवाज की इस दौर में पहले से कहीं अधिक ज़रूरत है, जब लोकप्रियवाद और अलग थलग रहने की प्रवृत्ति उत्तर और दक्षिण अमेरिका से एशिया, अफ़्रीका और यूरोप में बढ़ रही है.”

 

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