आम आबादी की सुरक्षा की हालत से गंभीर चिन्ता वाजिब - महासचिव

23 मई 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि आम आबादी की सुरक्षा के लिए उठाए गए क़दम तो पर्याप्त हैं मगर उन पर अमल करने करने की मंशा और अनुशासन में गिरावट आई है जो गंभीर चिन्ता का विषय है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने बीस वर्ष पहले आम आबादी की सुरक्षा का मुद्दा अपने एजेंडा में शामिल किया था.

महासचिव ने इसी मौक़े पर सुरक्षा परिषद में हुई एक बहस में शिरकत करते हुए कहा, “जब हम आम आबादी की सुरक्षा की स्थिति की बात करते हैं तो आलोचनात्कम होना बिल्कुल वाजिब है क्योंकि गंभीर रूप से चिन्तित होने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं.”

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इस क्षेत्र में बीस वर्षों के दौरान हुई प्रगति का ख़ाका पेश करते हुए कहा कि “आम लोगों (आबादी) को सुरक्षा मुहैया कराने की संस्कृति ने जड़ पकड़ ली थी जिसका ढाँचा अन्तरराष्ट्रीय क़ानून पर आधारित था. पिछले बीस वर्षों के दौरान ये संस्कृति शान्ति और सुरक्षा की संस्था के प्रमुख मुद्दों में से एक बन गई है.”

महासचिव अंतोनियो गुटेरेश ने शान्ति अभियानों में विशेषज्ञ सलाहकारों की तैनाती मानवीय सहायता एजेंसियों के मज़बूत कामकाज को भी ख़ासा श्रेय दिया. इन सभी ने संघर्ष वाले क्षेत्रों में बाल सुरक्षा मज़बूत करने और आम नागरिकों को यौन हिंसा के घृणित हमलों से बचाने में सराहनीय काम किया है.

अंतोनियो गुटेरेश का कहना था कि संघर्षरत इलाक़ों में बच्चों पर होने वाले अत्याचारों पर नज़र रखना और उनकी ख़बर सरकारी और अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों को देने से भी हज़ारों बच्चों की मदद की जा सकी है. साथ ही युद्धरत पक्षों के साथ बातचीत करने से हज़ारों बच्चों के पुनर्वास और सामान्य जीवन जीने में मदद करना संभव हो सका है. उनका ये भी कहना था कि सशस्त्र संघर्ष वाले इलाक़ों में चिकित्सा सहायता मुहैया कराने वाले कर्मियों की सुरक्षा और अत्यन्त ग़रीबी वाले इलाक़ों में सुरक्षा मुद्दे पर सुरक्षा परिषद के अनेक प्रस्तावों की बदौलत भी इन मुद्दों को प्रमुखता मिल सकी है.   

आम आबादी:

हालाँकि एंतोनियो गुटेरेश का ये भी कहना था कि इस प्रगति के बावजूद सशस्त्र संघर्षों और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का पालन नहीं करने की घटनाओं की वजह से बहुत से इंसान भारी तकलीफ़ों का सामना कर रहे हैं. इन घटनाओं में सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले लोग आम आबादी से ही संबंध रखते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018 के दौरान अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, माली, सोमालिया, दक्षिणी सूडान और यमन में 22 हज़ार 800 से भी ज़्यादा लोग हताहत हुए.

इसके अलावा सीरिया के पश्चिमोत्तर इदलिब इलाक़े में अस्पतालों, स्कूलों, बाज़ारों और शिविरों पर अंधाधुंध गोलाबारी और हवाई हमलों में आम लोग हताहत हुए जिनकी वजह से बहुत बड़े पैमाने पर डर और दहशत का मौहाल बन गया है.

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश का कहना था कि जब घनी आबादी वाले इलाक़ों में हमले करने के लिए विस्फोटक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है तो हताहत होने वालों में 90 फ़ीसदी संख्या आम लोगों की ही होती है.

साथ ही गंभीर चिन्ता की बात ये है कि मानवीय सहायता और चिकित्सा कर्मियों के ख़िलाफ़ भी लगातार हिंसा की वजह से उन लोगों तक मदद पहुँचाना मुश्किल साबित होता है जिन आम लोगों को सहायता की सख़्त ज़रूरत होती है. इसलिए मौजूद चुनौतियों में कुछ ये भी शामिल हैं कि संघर्ष वाले इलाक़ों में अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के लिए सम्मान और उसका पालन करने का चलन बढ़ाया जाए.

महासचिव का कहना था कि संयुक्त राष्ट्र को मिली जानकारी में सामने आया है कि बहुत से मामलों में अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के लिए सम्मान ही सवालों के दायरे में है. जबकि कुछ अन्य मामलों में तो अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का खुला उल्लंघन होते देखा गया है.

UN Photo/Manuel Elias

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अन्तरराषट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन के गंभीर आरोपों, उनकी जाँच पड़ताल और अदालती कार्रवाई के बीच मौजूद अन्तर को ख़त्म करते हुए बेहतर जवाबदेही क़ायम की जा सकती है. इसके लिए पहले तो संघर्ष वाले इलाक़ों में आम आबादी  स्पष्ट तौर पर राष्ट्रीय नीतियाँ और ढाँचे तैयार करने होंगे.

साथ ही मानवीय सहायता मुहैया कराने वाले संगठनों को ग़ैर-सरकारी सशस्त्र गुटों के साथ संपर्क बढ़ाकर सुरक्षित और समय रहते हुए मानवीय सहायता पहुँचाने के रास्ते निकालने होंगे. और बहुत महत्वपूर्ण बात ये भी कि गंभीर उल्लंघन के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित की जाए.

महासचिव अंतोनियो गुटेरेश का कहना था, “हमें वैश्विक और अनेक स्तरों पर क़दम उठाने होंगे. साथ ही सुरक्षा परिषद को संघर्ष वाले तमाम इलाक़ों में आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस और लगातार क़दम उठाते रहने होंगे.”

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख का ये भी कहना था सदस्य देशों, साझीदार संगठनों और तमाम सिविल सोसायटी को प्रस्तावों और उपायों पर टिकाऊ रूप से अमल सुनिश्चित करना होगा.

“आम जनसंख्या की हिफ़ाज़त की जो मौजूदा स्थिति को देखते हुए उसमें बहुत सुधार की गुंजाइश है, बशर्ते कि हम सभी ऐसे नियमों और क़ानूनों को बढ़ावा दें और उन पर अमल करें जो युद्ध के वातावरण में इंसानियत को सुरक्षित रखने में हम सभी को एकजुट करें.”

मानवीय सहायता क़ानून के लिए समर्थन

अन्तरराष्ट्रीय रैडक्रॉस कमेटी के अध्यक्ष पीटर मॉरेर ने कहा कि इन मुद्दों पर राजनैतिक सहमति बनना बहुत मुश्किल है मगर, “हम सुरक्षा परिषद से ये आग्रह करते हैं कि अन्तरराष्ट्रीय मानवीय सहायता क़ानून के सम्मान के लिए समर्थन देने में और ज़्यादा मुखरता बरती जाए. साथ ही ये सन्देश भी स्पष्ट तौर पर दिया जाए कि कोई भी व्यक्ति क़ानून से ऊपर नहीं और ये भी कि किसी भी इंसान को सुरक्षा की गारंटी से वंचित नहीं किया जा सकता.”

सुरक्षा परिषद की इस बैठक की अध्यक्षता इंडोनेशियाई विदेश मंत्री रेटनो मरसूदी ने की. उन्होंने कहा कि 20वीं वर्षगाँठ के समारोह के मौक़े पर हम सभी को अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को ना सिर्फ़ फिर से याद करना चाहिए, बल्कि उन प्रतिबद्धताओं को लागू करने के लिए हमारे कर्तव्यों की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए.

उन्होंने इंसानों और इंसानियत की हिफ़ाज़त सुनिश्चित करने की प्रमुखता को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर मिशन की तरफ़ ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा, “हम अपने लोगों को बेसहारा छोड़ने की हिमाकत नहीं कर सकते.”

 

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