म्यांमार: जेल में बंद पत्रकारों की रिहाई का यूएन ने स्वागत किया

7 मई 2019

म्यांमार में रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी के दो पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता पत्रकारों को जेल से रिहा किए जाने के निर्णय का संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने स्वागत किया है लेकिन प्रेस आज़ादी पर मंडराते संकट पर चिंता भी जताई है. 500 दिनों तक जेल में बंद रहने वाले इन दो पत्रकारों ने रोहिंज्या मुस्लिमों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई की रिपोर्टिंग की थी.  

न्यूज़ एजेंसी को दिए अपने एक बयान में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि पत्रकारों की रिहाई की ख़बर सुनकर उन्हें राहत मिली है.

रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी के 33 वर्षीय पत्रकार वॉ लोन और 29 वर्षीय क्यॉ सोइ ऊ को ‘ऑफ़िशियल सीक्रेट्स एक्ट’ के मामले में दोषी पाए जाने के बाद पिछले साल सितंबर में सात साल की सज़ा सुनाई गई थी.

दोनों पत्रकार राखीन प्रांत में 10 रोहिंज्या मुसलमानों के कथित तौर पर सुरक्षा बलों और बौद्ध नागरिकों के हाथों मारे जाने की पड़ताल कर रहे थे. यह घटना अगस्त 2017 की है जब वहां सेना ने अभियान शुरू किया था.

म्यांमार में संयुक्त राष्ट्र की टीम ने एक वक्तव्य जारी कर उनकी रिहाई का स्वागत किया है. बयान में कहा गया है कि प्रेस स्वतंत्रता को बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया एक कदम है और संक्रमण के दौर से गुज़रती लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति सरकार के संकल्प का प्रतीक भी है.

रंगून से जारी बयान में भरोसा दिया गया है कि “इस जटिल संक्रमण प्रक्रिया में म्यांमार को समर्थन देने के लिए संयुक्त राष्ट्र तैयार है.”

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने कहा है कि 500 दिनों की हिरासत के बाद वॉ लोन और क्यॉ सोइ ऊ को रिहा किया जाना अच्छी ख़बर है लेकिन न तो उन्हें दोषी करार दिया जाना चाहिए था और न ही जेल भेजा जाना चाहिए था.

“आपको ध्यान होगा कि पिछले साल सितंबर में हमारे कार्यालय ने एक रिपोर्ट तैयार की थी जो पत्रकारों को सज़ा सुनाए जाने के कुछ ही दिन के भीतर बनी थी. उस रिपोर्ट में विस्तार से म्यांमार में अभिव्यक्ति की आज़ादी की मुश्किल स्थिति पर लिखा गया था और वह नहीं बदला है.” मानवाधिकार प्रवक्ता ने न्यायिक प्रक्रिया की उन कमियों और प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाम कसने वाले क़ानूनों पर भी चिंता जताई जिनके चलते पत्रकारों को सज़ा हुई.

मंगलवार को इन दो पत्रकारों की रिहाई के अलावा 6,000 से ज़्यादा अन्य बंदियों की सज़ा भी माफ़ करते हुए रिहा कर दिया गया. जिस रिपोर्ट पर दोनों पत्रकार काम कर रहे थे उसमें हत्याओं को अंजाम देने वालों, प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ितों के परिजनों की गवाही थी. इस रिपोर्ट को न्यूयॉर्क में प्रतिष्ठित पुलित्ज़र पुरस्कार दिया गया और यूनेस्को / गिलर्मो कानो वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम प्राइज़ भी मिला है.

पत्रकारों के समर्पण और साहस को अन्य के लिए प्रेरणादायी बताते हुए संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की महानिदेशक ऑड्री अज़ोले ने कहा कि उनकी रिहाई से प्रेस की आज़ादी को आगे बढ़ाने में मदद मिली है.  

“यह उनके और उनके परिजनों के लिए राहत लेकिन प्रेस की आज़ादी के लिए भी सकारात्मक कदम है. यूनेस्को का मानना है कि यह लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि पत्रकार अपना मिशन बिना किसी प्रतिशोध की कार्रवाई के डर के बिना कर पाएं.”

रॉयटर्स के पत्रकारों ने अपनी रिपोर्टों में व्यापक सैन्य कार्रवाई को जगह दी जिसके बाद रोहिंज्या समुदाय के हज़ारों लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए सीमा पार कर बांग्लादेश में शरण ली. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के पूर्व प्रमुख ज़ाएद राड अल हुसैन ने इसे जातीय सफ़ाए का एक किताबी उदाहरण करार दिया था.

दस लाख से ज़्यादा रोहिंज्या शरणार्थी दक्षिण बांग्लादेश के शिविरों में रहने को मजबूर हैं. संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में उन्हें वापस भेजे जाने के लिए सुरक्षित माहौल तैयार करने के लिए निरंतर प्रयास हो रहे हैं.

 

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