नफ़रत ‘हर एक के लिए खतरनाक है’, नफ़रत को समाप्त करने के लिए एकजुट प्रयासों का आग्रह

29 अप्रैल 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतॉनियो गुटेरेश ने कहा है कि सभी धर्मों और मतों के श्रद्धालुओं के प्रति असहिष्णुता और नफ़रत से प्रेरित हिंसा एक बेहद चिंताजनक रुझान है और, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, इस पर तुरंत क़ाबू पाया जाना बहुत ज़रूरी.

उन्होंने पिछले कुछ दिनों में कैलिफोर्निया में एक यहूदी पूजा स्थल और बुर्किना फासो में एक गिरिजाघर पर हुए प्राणघाती हमलों का उल्लेख भी किया.

महासचिव एंतॉनियो गुटेरेश ने सोमवार को अपने वक्तव्य में “मस्जिदों में मुसलमानों की गोली मार कर हत्या, उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट किए जाने; यहूदी धर्मस्थलों में यहूदियों की हत्या, उनकी क़ब्रों पर स्वास्तिक चिन्ह बनाए जाने” और ईसाइयों की “प्रार्थना के दौरान हत्याओं और उनके गिरिजाघर जलाए जाने” की घटनाओं का उल्लेख किया. उन्होंने गंभीर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा, “ऐसी घटनाएं अब आए दिन होने लगी हैं.”

उन्होंने सावधान करने के अन्दाज़ में कहा कि शरण देने वाले पूजा स्थलों को अब निशाना बनाया जा रहा है. उनका कहना था कि “सिर्फ हत्याएं ही नहीं बल्कि घिनौना प्रलाप हो रहा हैः धार्मिक समूहों को ही नहीं, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों औऱ शरणार्थियों को भी विदेशियों या अन्य समूहों के प्रति ऩफरत के भाव का शिकार बनाया जा रहा है, जिस किसी को भी ‘पराया’ मान लिया जाता है उनके प्रति ज़हर उगला जा रहा है.”

ऑनलाइन ‘नफ़रत का चलन’

उन्होंने कहा कि इंटरनेट के कुछ हिस्सों में नफ़रत का चलन बहुत बढ़ गया है, एक जैसी सोच रखने वाले कट्टकपंथी एक दूसरे को ऑनलाइन तलाश कर लेते हैं.”

महासचिव गुटेरेश ने कहा, “अधम सोच अब मुख्यधारा तक फैलने लगी है” और वे इस बात से बहुत चिंतित हैं कि “हम घृणा और उग्रवाद से लड़ाई में निर्णायक पल के निकट पहुँच रहे हैं.”

इसके जवाब में उन्होंने  “तत्काल दो महत्वपूर्ण पहल” शुरु की हैं; नफ़रत की बोली से निपटने में समूचे तंत्र को “पूरी तरह सक्रिय” करने के लिए नरसंहार निरोधक विशेष सलाहकार एडमा डिएंग के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र कार्य योजना तैयार करना; और अलायंस ऑफ सिविलाइज़ेशन्स (UNAOC) के उच्च प्रतिनिधि मिगुएल मोराटिनोस के नेतृत्व में धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद के लिए पहल करना.   

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतॉनियो गुटेरेश ने कहा “यहूदियों से नफ़रत, मुसलमानों से नफ़रत,  ईसाइयों की हत्याएं और नस्लभेद, विदेशियों से नफ़रत, भेदभाव और उकसाने वाली गतिविधियों के हरेक अन्य रूप को मिटाने के लिए दुनिया को अपने प्रयास तेज़ करने होंगे.”

“नफ़रत हर किसी के लिए ख़तरनाक है – इसलिए ये क़दम उठाना हर किसी की ज़िम्मेदारी है. शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की विशेष ज़िम्मेदारी है. मैं सरकारों, प्रबुद्ध समाज और अन्य साझीदारों से अपेक्षा करता हूँ कि वे वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से हमें एक सूत्र में बांधे रखने वाले संस्कारों के पालन की दिशा में मिलकर काम करने में सहयोग देंगे.”

ऩफरत की बोली के ख़िलाफ जिनेवा शिखर सम्मेलन

नफरत की बोली का सामना करने के लिए सोमवार को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में एक प्रमुख शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ जिसके सह-आयोजक एडमा डिएंग थे.

संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों ने धुर राष्ट्रवादी समूहों और दलों के “फिर सिर उठाने” के प्रति सावधान करते हुए कहा कि वे अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति और पहचान के लिए ख़तरा बता कर “हिंसा को वैध” ठहरा देते हैं.

उन्होंने इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर द डिफेंस ऑफ रिलीजियस लिबर्टी (AIDLR) द्वारा सह आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “ये समूह अपनी आग उगलती बोली को राजनीतिक विमर्श की मुख्यधारा में फैला रहे हैं; हम एक नहीं अनेक देशों में ऐसा होते देख रहे हैं. इस चल को हमें मिलकर और बढ़-चढ़ कर रोकना होगा और खुलेपन तथा समावेशन के संदेशों के साथ उनका मुकाबला करना होगा. ”

एक सप्ताह से भी पहले श्रीलंका में गिरिजाघरों और होटलों पर आतंकवादी हमलों में सैंकड़ों लोगों की जान गई, उससे पहले 15 मार्च को न्यूज़ीलैंड में खुद को श्वेत लोगों की श्रेष्ठता का प्रतीक मानने वाले एक उग्रवादी ने मस्जिद में 50 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी थी.

एडमा डिएंग ने मार्च में माली के मध्यवर्ती इलाक़ों में फैलती साम्प्रदायिक हिंसा पर भी चिंता व्यक्त की थी, जहाँ एक ही हमले में महिलाओं और बच्चों सहित 134 ग्रामीणों की जान चली गई थी. उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया तो ये हिंसा और भड़क सकती है.

एडमा डिएंग ने एक वक्तव्य में कहा था, “हाल के महीनों में मध्य माली में जवाबी हमलों के कारण हिंसा अभूतपूर्व स्तर तक पहुँच गई है और मानवाधिकारों का घनघोर उल्लंघन हो रहा है, जिसका असर सभी समुदायों पर पड़ रहा है. अगर इन चिंताओं का तत्काल समाधान नहीं किया गया तो स्थिति और बिगड़ने का ख़तरा बहुत अधिक है जिसमें अत्याचार हो सकते हैं.”

यू एन जिनेवा के महानिदेशक माइकल मोलर ने धार्मिक शांति और सुरक्षा के बारे में दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन में शामिल लोगों से कहा कि ऩफरत की बोली, “सोशल मीडिया से मुख्यधारा में जंगल में आग की तरह फैल रही है.”

उन्होंने कहा, “ये हमारे संस्कारों, सामाजिक स्थिरता और शांति के लिए ख]तरनाक है और नफ़रत की ऐसी बोली अकल्पनीय बुराई को जन्म देती है.”  

उनका कहना था कि न्यूज़ीलैंड और श्रीलंका में हुए हमले “ऐसी अधम सोच के प्रतीक हैं जो दूसरे व्यक्ति को अपने से कमतर और कम इंसान मानती है.”

माइकल मोलर ने ज़ोर देकर कहा कि ऐसी जघन्य घटनाओं को देखते हुए यह याद रखना बेहद ज़रूरी है कि अधिकतर लोगों ने “सद्भाव, दया, न्याय और सुलह-सफ़ाई की भावना से काम किया.”

 

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