पर्यावरणीय कार्रवाई के अभाव में मानव स्वास्थ्य को गंभीर ख़तरा

13 मार्च 2019

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में सचेत किया गया है कि पर्यावरण को इतनी गंभीर क्षति पहुंची है कि अगर ज़रूरी कदम नहीं उठाए गए तो लोगों के स्वास्थ्य पर इसके दुष्परिणाम बढ़ते जाएंगे. पिछले पांच सालों में पर्यावरण की मौजूदा स्थिति पर तैयार की जाने वाली यह सबसे व्यापक समीक्षा है.

नैरोबी में दुनिया भर से विदेश मंत्री पर्यावरण पर चर्चा के लिए उच्चतम स्तरीय पर्यावरण मंच पर एकत्र हुए हैं और इसी अवसर पर 'ग्लोबल एनवार्यमेंटल आउटलुक'  (Sixth Global Environmental Outlook) की छठी किस्त को जारी किया गया है.

इस रिपोर्ट को 70 देशों के 250 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया है. रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण संरक्षण में तत्काल तेज़ी लाने की आवश्यकता है नहीं तो एशिया, मध्य पूर्व और अफ़्रीका के शहरों और क्षेत्रों में लाखों लोगों के सदी के मध्य तक असामयिक मौत का शिकार होन ेकी आशंका है.

ताज़े पानी में प्रदूषकों के घुल जाने से सूक्ष्मजीव रोधी प्रतिरोध (anti-microbial resistance) 2050 तक मौत का एक बड़ा कारण बन जाएगा. साथ ही रसायनों के शरीर में पहुंचने से महिलाओं और पुरुषों की जनन  वजह से प्रजनन क्षमता पर भी प्रभाव पड़ेगा और बच्चों के मस्तिष्क विकास पर भी असर होने की आशंका बढ़ जाएगी. 

रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के पास विज्ञान, तकनीक और वित्तीय संसाधन मौजूद हैं जिनके ज़रिए टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है. हालांकि आम लोगों, व्यवसायों और राजनीतिक नेतृत्व से अब भी पूरा समर्थन इस क्षेत्र में नहीं मिल पा रहा है जिसके चलते पुराने हो चुके उत्पादन और विकास मॉडल अब भी चलन में हैं. 

चौथी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण असेम्बली के दौरान होने वाली वार्ता में खाद्य पदार्थों के नुक़सान को रोकने, बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने और समुद्रों में प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम जैसे अहम विषयों पर चर्चा होनी है.

कोमोरस द्वीपों पर किसान और मछुआरे जलवायु परिवर्तन का सामना कर रहे हैं.
UNDP Comoros/James Stapley
कोमोरस द्वीपों पर किसान और मछुआरे जलवायु परिवर्तन का सामना कर रहे हैं.

भविष्य का रास्ता

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यवाहक कार्यकारी निदेशक जॉयस म्सूया ने कहा कि विज्ञान स्पष्ट है कि मानवता का स्वास्थ्य और समृद्धता पर्यावरण की स्थिति से सीधे तौर पर जुड़ी है. "यह रिपोर्ट मानवता के लिए एक दृष्टिकोण है. हम चौराहे पर खड़े हैं. क्या हम उसी रास्ते पर चलते रहें जिस पर चलते आ रहे हैं, जो हमें मानव जाति के लिए उजाड़ भविष्य की ओर ले जाएगा, या फिर हम और टिकाऊ विकास के रास्ते का रुख़ करते हैं? इसका चयन हमारे राजनीतिक नेताओं को अब करना है."

अभी सिर्फ़ तेज़ी से विकास की परवाह की जाती है जबकि दुष्परिणामों की चिंता बाद के लिए छोड़ दी जाती है. लेकिन स्वस्थ पृथ्वी और स्वस्थ जनसंख्या के लिए यह आवश्यक है कि नए प्रकार को सोच को बढ़ावा दिया जाए. नए मॉडल में 2050 तक ऐसी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की बात कही गई है जिसमें अपशिष्ट या कचरे से पूर्ण रूप से निपट लिया जाएगा.  

अगर देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2 फ़ीसदी  निवेश हरित अर्थव्यवस्था में करते हैं तो इससे उम्मीद के अनुरूप विकास दरों को पाते हुए दीर्घकालीन विकास का  रास्ता खुल जाएगा.  साथ ही जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पारिस्थितकी तंत्रों के खोने के प्रभाव भी कम होंगे. 

रिपोर्ट में आहार में मांस की मात्रा कम करने, खाने की बर्बादी रोकने और समुद्र में हर साल जाने वाले 80 लाख टन प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम को अहम बताया गया है. फ़िलहाल हर साल दुनिया में 33 फ़ीसदी खाने की बर्बादी होती है और 56 फ़ीसदी खाना औद्योगिक देशों में बर्बादी का शिकार होता है.

रिपोर्ट कहती है कि पूरी प्रणाली - भोजन, ऊर्जा, अपशिष्ट - पर आधारित कदमों को उठाना बेहतर है बजाए इसके कि एक-एक विषय को उठाया जाए. उदाहरण के लिए, स्थिर जलवायु और स्वच्छ हवा आपस में जुड़ी हुई हैं. पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के अंतर्गत रखे गए लक्ष्यों को पाने के लिए 22 ट्रिलियन डॉलर की ज़रूरत होगी वहींअगर वायु प्रदूषण को कम कर लिया गया तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में 54 ट्रिलियन डॉलर की बचत हो सकती है. 

 

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