मासिक धर्म संबंधी 'मिथकों और वर्जनाओं को तोड़ना होगा'

चाड के एक स्कूल में युवतियों को मासिक धर्म से जुड़ी जानकारी देने का प्रयास.
UN Photo/Eskinder Debebe
चाड के एक स्कूल में युवतियों को मासिक धर्म से जुड़ी जानकारी देने का प्रयास.

मासिक धर्म संबंधी 'मिथकों और वर्जनाओं को तोड़ना होगा'

महिलाएं

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने अपील जारी कर कहा है कि माहवारी संबंधी अनुचित धारणाओं और वर्जनाओं को तोड़े जाने की आवश्यकता है. दुनिया के कई देशों में महिलाओं और लड़कियों को इस भेदभाव से मुक्ति दिलाए जाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए. 

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा, “माहवारी के विषय में सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ग़लत धारणाएं, वर्जनाएं और मिथक कायम हैं और इनकी वजह से महिलाओं और लड़कियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है.”

माहवारी से जुड़ी अनुचित धारणाओं को चुनौती देते हुए मीडिया, शोध कार्यों, नीति निर्माण प्रक्रिया और सांस्कृतिक विमर्शों में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास हुए हैं लेकिन इस समस्या के निदान के लिए और प्रयास किए जाने की ज़रूरत है.

विशेषज्ञों का कहना है कि कई देशों में अब भी मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अस्वच्छ और अशुद्ध माना जाता है. इस दौरान उनके पानी छूने, खाना बनाने और धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजनों में हिस्सा लेने पर पाबंदी होती है. कई बार उन्हें घर से बाहर धकेल दिया जाता है और बाहर किसी झोंपड़े में रहने के लिए मजबूर किया जाता है और ऐसे में उन्हें सुरक्षा और बीमारी के ख़तरों का सामना करना पड़ता है.

“मासिक धर्म के दौरान पितृसत्तात्मक नियंत्रण और महिलाओं के व्यवहार और आवाजाही पर पाबंदियां उनके समानता के अधिकार को कमज़ोर बनाती हैं. कलंक और शर्मिंदगी का एहसास उन्हें जिस तरह से कराया जाता है वह उन्हें असशक्त करता है.”

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन के लिए स्वच्छ शौचालयों या सुविधाओं तक कई महिलाओं की पहुंच नहीं होती, विशेषकर सार्वजनिक संस्थानों या स्कूलों में. सैनेटरी पैड या तो उनकी पहुंच में नहीं होते या वे बेहद महंगे हैं. सरकारों की नीतियों में इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जाता. ऐसे में महिलाओं को गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ता है जिससे संक्रमण और बीमारी का ख़तरा बना रहता है.

फ़िल्म के ज़रिए जागरूकता का प्रयास

हिंदी फ़िल्म ‘पैडमैन’ में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को होने वाली स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों को ही सिनेमा के पर्दे पर दिखाया गया. फ़िल्म में मुख्य किरदार अक्षय कुमार और राधिका आप्टे ने निभाया है और यह कहानी दक्षिण भारत के अरुणाचलम मुरुगनंथम से प्रेरित है जिन्होंने कम दाम में सैनेटरी पैड बनाने की एक मशीन विकसित करने में अपने जीवन के 20 साल लगा दिए.

पैडमैन के सेट पर फ़िल्म की निर्माता ट्विंकल खन्ना, अभिनेता अक्षय कुमार और अरुणाचलम मुरुगनंथम.
Courtesy of Pad Man
पैडमैन के सेट पर फ़िल्म की निर्माता ट्विंकल खन्ना, अभिनेता अक्षय कुमार और अरुणाचलम मुरुगनंथम.


माहवारी के दौरान उनकी पत्नी के पास स्वच्छ शोषकों या अन्य सुरक्षित माहवारी उत्पादों तक पहुंच नहीं थी और इस वजह से उन्हें गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करना पड़ता था. उनकी परेशानी देख कर मुरुगनंथम के मन में ऐसी मशीन बनाने का ख़्याल आया.

आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में 88 फ़ीसदी महिलाओं की सैनेटरी उत्पादों तक पहुंच नहीं है. फ़िल्म की निर्माता ट्विंकल खन्ना थीं जिन्होंने अपनी लघु कहानी “द सैनेटरी मैन ऑफ सेक्रेड लैंड” को ही रूपान्तरित कर फ़िल्म बनाई है.

फ़िल्म के प्रदर्शित होने से पहले यूएन समाचार से बातचीत में ट्विंकल खन्ना ने बताया कि “यह हमारे जैविक विज्ञान प्रक्रिया का एक स्वाभाविक हिस्सा है. असल में यह सबसे अहम हिस्सा है और अगर यह नहीं होता तो हमारी प्रजाति विलुप्त हो जाती.”

बाज़ार में बिकने वाले उत्पादों की तुलना में अरुणाचलम मुरुगनंथम की मिनी मशीन सिर्फ़ एक तिहाई क़ीमत में सैनेटरी पैड बनाती है. इस मशीन को अब तक भारत के 23 राज्यों में इस्तेमाल में लाया जा रहा है.

एक समय था जब मुरुगनंथम का उनके परिवार और समुदाय ने बहिष्कार कर दिया था लेकिन वह बीते दिनों की बात है. भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनके काम के महत्व को पहचान देते हुए उन्हें सम्मानित किया है.

अब वह महिला स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों का हिस्सा हैं जो टिकाऊ विकास लक्ष्यों के 2030 एजेंडा के अंतर्गत आता है.