नौकरियां पाने के लिए अब भी संघर्ष करती हैं महिलाएं

पुरुषों की तुलना में महिलाओं का कम मिलता है वेतन.
UN Women/Joe Saade
पुरुषों की तुलना में महिलाओं का कम मिलता है वेतन.

नौकरियां पाने के लिए अब भी संघर्ष करती हैं महिलाएं

आर्थिक विकास

संयुक्त राष्ट्र श्रम विशेषज्ञों ने कहा है कि महिलाओं के लिए नौकरियों के अवसरों में 1990 के दशक की शुरुआत से अब तक कोई विशेष बेहतरी नहीं देखने को मिली है. उन्होंने सचेत किया है कि महिला कर्मचारियों को बच्चे पैदा करने और उनकी देखभाल  करने का ख़ामियाज़ा अब भी उठाना पड़ता है. 

8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से एक दिन पहले अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि 2018 में दुनिया भर में 1.3 अरब कामकाजी महिलाएं थीं वहीं ऐसे पुरुषों की संख्या दो अरब आंकी गई. यानी पिछले 27 साल में स्थिति में सिर्फ़ दो फ़ीसदी का ही सुधार हुआ है.

कार्यक्षेत्र में महिलाओं के वरिष्ठ पदों तक पहुंचने में कायम अवरोधों पर भी चिंता जताई गई है. उदाहरण के तौर पर, महिला प्रबंधकों की संख्या एक तिहाई से भी कम है. 

पुरुषों का दबदबा कायम

रिपोर्ट के अनुसार वरिष्ठ पदों पर महिलाओं को अब भी समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है, और यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पिछले 30 सालों में कम ही बदलाव आया है. कई मामलों में महिलाओं के पुरुषों से ज़्यादा पढ़े लिखे होने की संभावना के बावजूद ऐसा हो रहा है.

महिलाओं के लिए कम वेतन और नौकरियों के पीछे शिक्षा प्रमुख कारण नहीं है बल्कि वजह यह है कि महिलाओं को शिक्षा का लाभ पुरुषों जितना नहीं मिल पाता.

श्रम संगठन की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक औसत के नज़रिए से महिलाएं, पुरुषों की तुलना में 20 फ़ीसदी कम कमाती हैं. इस विसंगति के लिए मां बनने की वजह से वेतन पर लगने वाले 'जुर्माने' को ज़िम्मेदार बताया गया है जबकि इसके विपरीत पिताओं का वेतन बढ़ जाता हैं.   

श्रम संगठन में निदेशक मैनुएला तोमेई ने बताया कि “कई कारक हैं जो रोज़गार के अवसरों में समानता सुनिश्चित करने में रोड़े अटका रहे हैं और इनमें सबसे बड़ा कारण बच्चों की परवरिश और देखभाल है. पिछले 20 सालों में महिलाओं ने जितना समय बिना वेतन वाली देखभाल और घरेूल कार्यों में बिताया है उसमें कोई कमी देखने को नहीं मिली है. वहीं पुरुषों की भागीदारी में सिर्फ़ 8 मिनट प्रतिदिन का इज़ाफ़ा हुआ है. इस गति से ही अगर बदलाव हुआ तो समानता लाने में 200 से ज़्यादा साल लगेंगे." 

यह भी स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं के कम कौशल वाले पेशों में कार्यरत होने की संभावना अधिक होती है और कार्यस्थल पर पुरुषों की तुलना में उन्हें बदतर स्थितियों का सामना करना पड़ता है.  

बेहतरी के लिए चाहिए लंबी छलांग

महिलाओं के लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण करने के लिए रिपोर्ट में ऐसे प्रयासों और नीतियों पर बल दिया गया है जो बड़ी छलांग लगाते हुए स्थिति का काया पलट कर दें. 

सभी के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए कामकाज से जुड़े नए क़ानून बनाने होंगे या मौजूदा क़ानूनों की समीक्षा करनी होगी. साथ ही उन क़ानूनों को रद्द करना होगा जिसके तहत महिलाओं को कुछ पेशों में काम करने की मनाही है. 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 'देखभाल करने के लिए समय निकाले जाने' के लिए प्रयास किए जाने चाहिए. कर्मचारियों का अपने समय पर ज़्यादा अधिकार होना चाहिए ताकि वे काम करने के घंटों का चयन कर सकें और स्थिति उनके नियंत्रण में रह सके. 

इससे परिवारों को ख़ास तौर पर मदद मिलेगी. तोमेई का कहना है कि जब पुरुष बिना वेतन के देखभाल करनें में बराबरी दिखाएंगे हैं तो महिला प्रबंधकों की संख्या में भी वृद्धि देखने को मिलेगी. 

श्रम संगठन और गैलप द्वारा 2017 में कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ 70 प्रतिशत महिलाएं घर पर रहने के बजाए काम करना चाहती हैं. अमूमन पुरुष भी उनकी इस इच्छा से सहमति रखते हैं.