मानवाधिकार उच्चायुक्त ने बुरुंडी में कार्यालय बंद होने पर अफ़सोस जताया

हिंसा के डर से पलायन कर रहे लोगों ने रवांडा के शरणार्थी शिविर में शरण ली है.
UNHCR/Kate Holt
हिंसा के डर से पलायन कर रहे लोगों ने रवांडा के शरणार्थी शिविर में शरण ली है.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने बुरुंडी में कार्यालय बंद होने पर अफ़सोस जताया

मानवाधिकार

मंगलवार को जारी एक वक्तव्य में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशलेट ने बुरुंडी में यूएन मानवाधिकार कार्यालय के बंद होने पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है. बुरुंडी की सरकार के निर्णय के चलते दो दशकों पहले शुरू हुए इस कार्यालय को बंद करना पड़ा है. 

बुरुंडी प्रशासन ने अक्टूबर 2016 में ही यूएन कार्यालय के साथ सहयोग करना बंद कर दिया था. यह तब हुआ जब संयुक्त राष्ट्र की ओर से की गई एक स्वतंत्र जांच में मानवता के विरूद्ध अपराधों के लिए सरकार और उसके समर्थकों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था. 

मानवाधिकार उच्चायुक्त बाशलेट ने कहा, "बुरुंडी में यूएन कार्यालय की स्थापना 1995 में हुई थी, हमने सरकार के साथ मिलकर शांति निर्माण, सुरक्षा और न्यायिक क्षेत्र में सुधारों पर काम किया और देश में मानवाधिकारों के मुद्दों पर सांस्थानिक ढांचे और नागरिक समाज की क्षमता को विकसित करने में मदद की."

जांच के दो साल बाद दिसंबर 2018 में सरकार ने दावा किया था कि बुरुंडी ने मानवाधिकार संरक्षण के लिए राष्ट्रीय ढांचे को खड़ा करने में प्रगति की है और ऐसे में वहां यूएन कार्यालय के अस्तित्व का कोई औचित्य नहीं है. हालांकि संयुक्त राष्ट्र कार्यालय को मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगातार मिलते रहे हैं. लेकिन कई अवरोधों के कारण ऐसे मामलों की सही ढंग से जांच नहीं की जा सकी. 

यूएन अधिकारी का कहना है कि उनके कार्यालय ने बुरुंडी पर रिपोर्ट सही भावना से तैयार की थी. ऐसे में हाल के सालों में बुरुंडी सरकार से सहयोग न मिल पाना निराशाजनक है. स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग के सदस्यों पर क़ानूनी कार्रवाई की धमकियां दी गई और संयुक्त राष्ट्र में बुरुंडी के प्रतिनिधि ने आयोग के चेयरमैन की दास व्यापार में शामिल होने वालों से तुलना की. 

बुरुंडी में मानवाधिकार हनन के बड़ी संख्या में मामले सामने आने के  बाद ही संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की स्थापना की गई थी. साल 2000 में गृहयुद्ध समाप्त होन ेके बाद शांति समझौते में मानवाधिकार को भी जगह दी गई और उस दिशा में सुधार के प्रयास किए गए. 

मानवाधिकार कार्यालय ने मानवाधिकारों पर स्वतंत्र राष्ट्रीय आयोग, सत्य और मेलमिलाप समिति का गठन करने और क़ानूनों सुधारों की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई और नागरिक समाज को बढ़ावा भी दिया गया. लेकिन यूएन अधिकारी का कहना है कि जिन मोर्चों पर प्रगति हुई थी, 2015 से वह ख़तरे में पड़ गए हैं.