लाख़ों विकलांग बच्चे झेल रहे हैं पीछे छूट जाने का ख़तरा

4 मार्च 2019

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशलेट ने कहा है कि विकलांगता का दंश झेल रहे 90 लाख से ज़्यादा बच्चों की सहायता के लिए देशों को और प्रयास करने होंगे. जिनिवा में मानवाधिकार परिषद के एक कार्यक्रम में उन्होंने चिंता जताई कि विकलांग बच्चों की आवाज़ नहीं सुनी जा रही है और ऐसे में उनके पीछे रह जाने की संभावना है.

मिशेल बाशलेट ने कहा कि विकलांगता का शिकार युवा बच्चे हिंसा, उपेक्षा और बुरे बर्ताव को झेलने के लिए मजबूर हैं जबकि उनके पास भी वही अधिकार हैं जो सभी बच्चों के पास होते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों का सशक्तिकरण तभी होगा जब उन्हें अपने अधिकारों का सही मायनो में लाभ मिले.

शिक्षा का समान अधिकार इस संदर्भ में बेहद अहम है क्योंकि इससे ग़रीबी और शोषण की दुनिया से बाहर निकल पाने में मदद मिलती है. 

"विकलांग बच्चों के पास उन सभी विषयों पर राय होने का अधिकार होना चाहिए जिससे उनकी ज़िंदगी प्रभावित होती हो. संभावनाओं के अनुरूप जीवन जीने और मानवाधिकार को सही अर्थों में पाने के लिए उनका सशक्तिकरण आवश्यक है. इसके लिए हमें अपने रवैयों और माहौल को बदलना होगा."

मानवाधिकार उच्वायुक्त ने कहा कि विकलांग बच्चों के साथ भेदभाव की शुरुआत उनके जन्म के समय से ही हो जाती है. कभी प्रशासन उनके जन्म को दर्ज नहीं करता तो कभी उन्हें देखभाल करने वाली संस्थाओं के हवाले कर दिया जाता है. 

समान अवसरों की दरकार

विकलांगों के अधिकारों के मामलों के लिए विशेष रूप से नियुक्त  कैटेलिना देवनदास एगुलार ने कहा कि हम बच्चों को अब और छिपाकर या अलग नहीं छोड़ सकते. विकलांग बच्चों के पास भी पूर्ण और ख़ुशहाल जीवन जीने का अवसर होना चाहिए. 

समाज में विकलांगों का पूरी तरह से समावेशन न हो पाने की एक प्रमुख वजह उनके लिए विशेष स्कूलों, संस्थाओं और आश्रय घरों का होना है. "यह एक ऐसा मॉडल है जिसने बच्चों को हाशिए पर धकेल दिया है." परिषद को संबोधित करते हुए एगुलार ने कहा कि हर तीन विकलांग बच्चों में से एक बच्चा प्राथमिक स्कूल नहीं जाता जबकि पढ़ाई में मुश्किलों का सामना करने वालों को अन्य बच्चों से हिंसा का शिकार होने का भी ख़तरा होता है. 

उनके संदेश का समर्थन करते हुए मोल्दोवा में बाल अधिकारों की हिमायती दुमित्रिता क्रोपीविनिची ने विकलांगता और भेदभाव से जुड़े अपने निजी अनुभव साझा किए. 

"मेरी विकलांगता के कारण, पांच साल की उम्र में ही मुझे एक संस्थान में रहने के लिए भेज दिया गया क्योंकि मुझे शिक्षा वहीं मिल सकती थी. आप कल्पना कीजिए कि पांच साल की बच्ची के लिए एक विशाल, बदबूदार और ठंडी इमारत में रहना कैसा होगा. जहां आपके माता पिता की जगह अध्यापक ले लें, जहां आपको 11 अन्य बच्चों के साथ कमरा साझा करना पड़े और संस्थान के नियमों का पालन करना पड़े."

वहां पांच साल रहने के बाद क्रोपीविनिची घर वापस आईं और मुख्यधारा के स्कूलों में लागू हुए सुधारों का उन्हें लाभ मिला. अपने गांव में स्थित ऐसे ही एक स्कूल में उनकी आगे की शिक्षा का रास्ता खुला. 

"यह निर्विवाद है कि बचपन जीवन में सबसे ख़ूबसूरत लेकिन अतिसंवेदनशील अवस्था होती है. बचपन में एक बच्चा वयस्कों पर निर्भर रहता है. विकलांग बच्चों को जीवन भर दूसरों पर निर्भर और कमज़ोर बने रहने को मजबूर होना पड़ सकता है. मैं अब अपने आप से पूछती हूं कि हज़ारों, लाखों बच्चों के साथ दुनिया भर में यह होना सही कैसे है?"

 

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