रोज़गार मिलना बेहतर जीवन-यापन की गारंटी नहीं

इंडोनेशिया में तोशिबा कंपनी के इलैक्ट्रॉनिक सामान को तैयार करते कर्मचारी.
ILO/A. Mirza
इंडोनेशिया में तोशिबा कंपनी के इलैक्ट्रॉनिक सामान को तैयार करते कर्मचारी.

रोज़गार मिलना बेहतर जीवन-यापन की गारंटी नहीं

आर्थिक विकास

दुनिया के श्रम बाज़ारों में रोज़गार की ख़राब गुणवत्ता एक बड़ी चुनौती बन कर उभर रही है और लाखों लोगों को विषम परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की एक नई रिपोर्ट में रोज़गार, बेरोज़गारी, उत्पादकता और श्रमिकों की भागीदारी सहित अन्य विषयों पर वैश्विक रूझानों के संबंध में जानकारी सामने आई है.

विश्व रोज़गार एवं सामाजिक दृष्टिकोण 2019 (WESO) के आंकड़े दिखाते हैं कि दुनिया भर में इस समय तीन अरब से ज़्यादा लोग काम कर रहे हैं लेकिन अधिकांश को पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा, बराबरी के अवसर और भौतिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध नहीं है. बेरोज़गारी कम करने के लिए उठाए जा रहे प्रयासों में प्रगति हुई है लेकिन ये बदलाव काम की गुणवत्ता में नहीं दिखाई देता है.

रिपोर्ट आगाह करती है कि सभी के लिए उत्कृष्ट रोज़गार के साधनों को सुनिश्चित करने में अब भी कई रोड़े हैं और जिस गति से प्रगति हो रही है उस दृष्टि से टिकाऊ विकास लक्ष्यों के आठवें लक्ष्य को हासिल करना फ़िलहाल अवास्तविक सा लगता है.

श्रम संगठन की नीतिगत मामलों की उपमहानिदेशक डेब्राह ग्रीनफ़ील्ड ने कहा है कि, "टिकाऊ विकास का आठवां लक्ष्य सिर्फ़ पूर्ण रोज़गार के बारे में नहीं है लेकिन उसकी गुणवत्ता से भी जुड़ा है. समानता और उत्कृष्ट कार्य दो ऐसे स्तंभ हैं जो टिकाऊ विकास को मज़बूत सहारा देते हैं."

रिपोर्ट में सचेत किया गया है कि नई तकनीक पर आधारित कुछ नए व्यावसायिक मॉडल ऐसे हैं जो श्रम बाज़ार में अब तक हासिल की गई उपलब्धियों को जोखिम में डाल रहे हैं. सामाजिक सुरक्षा, रोज़गार सुरक्षा और श्रम मानकों के लिए विशेष रूप से ख़तरा पनप रहा है और नीति निर्धारकों को इस चुनौती से निपटने की सलाह दी गई है. 

श्रम संगठन में रिसर्च निदेशक डेमियन ग्रीमशॉ का कहना है कि "रोज़गार होना हमेशा इस बात की गारंटी नहीं देता कि आप उत्कृष्ट जीवन जी पाएंगे.  उदाहरण के तौर पर, 70 करोड़ लोग रोज़गार होने के बावजूद अत्यधिक ग़रीबी या ग़रीबी में जीवन जी रहे हैं."

रिपोर्ट में ख़ास तौर पर जिन बिंदुओं की ओर ध्यान खींचा गया है उनमें श्रम बल में लैंगिक खाई को पाटने में प्रगति का अभाव प्रमुख है. महिलाओं की भागीदारी अब भी कम है. एक दूसरा मुद्दा असंगठित क्षेत्र में रोज़गार है जिसमें दो अरब श्रमिक काम करते हैं जो विश्व में कुल श्रमबल का 61 फ़ीसदी है.  चिंता इस बात पर भी ज़ाहिर की गई है कि हर पांच में से एक युवा (25 साल से कम उम्र) रोज़गार, शिक्षा या प्रशिक्षण  में नहीं है जो भविष्य में उनके लिए  रोज़गार पाने में मुश्किलें खड़ी सकता है. 

लेकिन रिपोर्ट में अब तक कुछ क्षेत्रों में हुई प्रगति को भी रेखांकित किया गया है. जैसे अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी के मंडराते ख़तरों से निपट लेती है तो कई देशों में बेरोज़गारी में और कमी आने की संभावना है. साथ ही शिक्षा या प्रशिक्षण हासिल कर रहे लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है और मध्य आय वाले देशों में ऐसे लोगों की संख्या में भी गिरावट देखने को मिली है जो काम करने के बावजूद ग़रीबी में रहने को मजबूर थे.