यूरोपीय नागरिकों की तुलना में विस्थापितों को बीमारियों का ख़तरा अधिक

21 जनवरी 2019

सुरक्षित देश में शरण लेने के लिए लंबे सफ़र, ख़राब परिस्थितियों में रहने की मजबूरी और जीवनशैली में आए बदलाव से यूरोप में प्रवासियों और शरणार्थियों के स्वास्थ्य को ख़तरे की आशंका बढ़ जाती है. ये निष्कर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ओर से जारी एक नई रिपोर्ट में सामने आए हैं जिसमें पहली बार यूरोप पहुंचने वाले विस्थापितों के स्वास्थ्य से जुड़ी मुश्किलों को समझने का प्रयास किया गया है. 

यूरोप में विश्व स्वास्थ्य संगठन की क्षेत्रीय निदेशक डॉ ज़ुज़सना जकाब ने बताया, "विस्थापन और प्रवासन से उठ खड़ी होने वाली चुनौतियों का सामना मानवीय और सकारात्मक रूप से करने में राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था संघर्ष कर रही है. यह अपनी तरह की एक पहली रिपोर्ट है जिससे यूरोपीय देशों में प्रवासियों और शरणार्थियों के स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी मिलती है."

13 हज़ार से ज़्यादा दस्तावेज़ों को परखने और प्रवासियों और शरणार्थियों के स्वास्थ्य से जुड़े तथ्यों को जांचने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है. इटली में स्वास्थ्य, प्रवासन और ग़रीबी पर राष्ट्रीय संस्थान के साथ तैयार इस रिपोर्ट में यह भी समझने की कोशिश की गई है कि यूरोपीय देश किस प्रकार से विस्थापितों की बेहतर सेहत सुनिश्चित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं. 

मेज़बान देशों के नागरिकों की तुलना में वहां पहुंचने वाले प्रवासियों और शरणार्थियों के ग़ैर-संचारी रोगों से प्रभावित होने की संभावना कम होती है लेकिन ग़रीबी भरे हालात में लंबे समय तक रहने की वजह से उन्हें हृदय रोग और कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है. जीवनशैली बदलने, शारीरिक शिथिलता और कम मात्रा में पौष्टिक भोजन मिलना भी अन्य बीमारियों से घिर जाने की आशंका बढ़ाता है.

विस्थापन की पूरी प्रक्रिया में संक्रामक रोग से ग्रस्त होने का जोख़िम बना रहता है लेकिन आम धारणा के विपरीत प्रवासियों और शरणार्थियों से संचारी रोग मेज़बान देशों के लोगों में फैलने का ख़तरा बेहद कम होता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि एचआईवी वायरस से ग्रस्त अधिकतर प्रवासियों और शरणार्थियों को यह रोग यूरोप पहुंचने के बाद ही हुआ. 

डॉ जकाब का कहना है कि यह रिपोर्ट बताती है कि स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए. "मेज़बानों की तुलना में संचारी और ग़ैर-संचारी रोग होने का ख़तरा जैसे जैसे प्रवासियों और शरणार्थियों के लिए बढ़ेगा, ऐसे में यह ज़रूरी होगा कि उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं मिलें. इलाज में होने वाले ख़र्च को कम करने के लिए, विस्थापितों की जान बचाने के लिए और मेज़बान नागरिकों की सुरक्षा के लिए यही सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है."

रिपोर्ट की मुख्य बातें:

- विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोपीय क्षेत्र की कुल आबादी का सिर्फ़ दस फ़ीसदी - क़रीब 9 करोड़ लोग - अंतरराष्ट्रीय प्रवासी हैं. इनमें से भी लगभग सात फ़ीसदी शरणार्थी  हैं. कुछ यूरोपीय देशों में स्थानीय नागरिकों में धारणा है कि उनकी कुल जनसंख्या से तीन-चार गुना ज़्यादा प्रवासी रहते हैं.

- विस्थापन और प्रवासन से आम तौर पर संचारी रोगों को जोड़ कर देखा जाता है, लेकिन अब जागरूकता बढ़ रही है कि विस्थापितों की पुरानी और एकदम से होने वाली बीमारियों पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है.

- सर्वाइकल कैंसर को छोड़ कर प्रवासियों और शरणार्थियों को कैंसर होने का ख़तरा कम रहता है. लेकिन उनमें कैंसर का पता काफ़ी देर में पता चलने की संभावना ज़्यादा रहती है जिससे मेज़बान नागरिकों की तुलना में उनके सामने चुनौती बड़ी होती है.

- मानसिक अवसाद और व्यग्रता से जुड़ी बीमारियां विस्थापितों को ज़्यादा प्रभावित करती हैं. लेकिन प्रवासी समूहों में भिन्नता और जांचने के अलग तरीक़ों के चलते ठोस नतीजों पर पहुंचना मुश्किल है.

- आम तौर पर प्रवासियों और शरणार्थियों को डायबिटिज़ होने और उससे मौत होने का ख़तरा ज़्यादा होता है. महिलाओं को विशेष रूप से ख़तरा है.

- संक्रामक रोग से ग्रस्त होने की आशंका भी विस्थापितों को अधिक रहती है क्योंकि वे ख़राब परिस्थितियों में रहते हैं और उचित समय पर स्वास्थ्य सेवा उन्हें मिलने की संभावना कम होती है.

- कई बार यूरोप आने वाले विस्थापितों को सही संख्या में ज़रूरी टीके नहीं लगे होते. इसलिए मेज़बान देशों के स्वास्थ्य कार्यक्रम के अनुसार उन्हें तत्काल टीके लगाना सुनिश्चित करना होना है.

- यूरोप के कई देशों में सामाजिक और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने की प्रक्रिया में समानता नहीं है. भाषा संबंधी दिक्कतें, भेदभाव और क़ानूनी प्रक्रिया इन्हें और जटिल बनाती हैं. 

- अकेले आने वाले नाबालिग बच्चों के यौन शोषण का ख़तरा होता है कई बार वे मानसिक अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं. 

पूरी रिपोर्ट यहां पढ़िए.

 

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