टिकाऊ विकास लक्ष्यों के रास्ते में बाधाओं से जल्द निपटना ज़रूरी

16 जनवरी 2019

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशलेट ने कहा है कि अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करने और उन्हें बढ़ावा देने में  कईं देश विफल हो रहे हैं. 2016 में सभी देशों ने बेहतरी के प्रयास का संकल्प लिया था लेकिन अभी प्रगति बहुत धीमी है जिसे तेज़ किए जाने की आवश्यकता है.

टिकाऊ विकास से जुड़े 17 लक्ष्यों को पाने में हुई प्रगति की समीक्षा के लिए  जिनिवा में बुधवार को मानवाधिकार परिषद की एक विशेष बैठक हुई. इस बैठक में यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशलेट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महत्वाकांक्षी लक्ष्यों तक पहुंचने से हम अभी दूर हैं. 

"समानता आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने के लिए और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 2030 एजेंडे का संकल्प लिया गया. लेकिन इससे इतर यह वंचितों, असशक्तों और मुख्यधारा से दूर समुदायों से किया गया एक वायदा है. लाखों महिलाओं, नस्ली, धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों, मूल निवासियों, विकलांगों और ग़रीबों से किया वायदा."

बाशलेट ने माना कि कुछ देशों ने ग़रीबी को दूर करने, पांच साल से कम शिशुओं की मृत्यु दर कम करने और शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय प्रगति की है. लेकिन सभी लोगों के लिए विकास  सुनिश्चित कर पाने के रास्ते में अब भी अवरोध कायम हैं. 

भूख, युद्ध और जलवायु परिवर्तन के साथ साथ लैंगिक असमानता भी एक बड़ी बाधा है. 

"हिंसक संघर्ष लोगों के जीवन, उनकी आशाओं और रोज़ी रोटी चलाने के अवसरों को वहां तबाह कर रहे हैं जहां उन्होंने जन्म लिया था. 44 हज़ार से ज़्यादा लोग हर दिन अपना घर छोड़कर भागने के लिए मजबूर हैं. जलवायु परिवर्तन के चलते बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय आपदाएं हो रही हैं जिससे आधारभूत ढांचा को नुक़सान हो रहा है और तनाव बढ़ रहा है."

किसी को पीछे न छोड़ने के महान लक्ष्य को पाने में हो रही प्रगति पर सवालिया निशान लगाते हुए बाशलेट ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के ज़रिए बताया कि अमीर और ग़रीब की खाई गहरी हो रही है जबकि श्रमिकों की उत्पादता बढ़ी है. 

"2030 तक पहुंचने में 12 साल बचे हैं.टिकाऊ विकास एजेंडा ने लोगोें से जो वायदे किए हैं उन्होंने पूरा करने के लिए हमें और तेज़ी दिखाने की ज़रूरत है."

पूर्व मानवाधिकार उच्चायुक्त मैरी रॉबिन्सन ने कहा कि संपदा और अवसर कुछ ही लोगों के हाथों में केंद्रित हो रहे हैं और इसलिए आर्थिक असमानता और अन्य क्षेत्रों में बढ़ती खाई को पाटने की ज़रूरत है.

 

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