बच्चों के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने से 'दूर है' दुनिया

14 जनवरी 2019

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशलेट ने कहा है कि कुछ सदस्य देश बच्चों को बेहतर भविष्य देने में अब भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं. ऐसे देशों में बच्चों की समय से पहले मौतें हो रही हैं या फिर वे ग़रीबी का शिकार हो रहे हैं. 

जिनिवा में बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समिति के 80वें सत्र को संबोधित करते हुए उच्चायुक्त ने ध्यान दिलाया कि 2019 में बाल अधिकार समझौते को 30 साल पूरे हो रहे हैं और मानवाधिकारों पर अब तक होने वाली संधियों में सबसे ज़्यादा देशों से स्वीकृति इस समझौते को मिली है. 

क़रीब हर देश से मंज़ूरी मिल जाने और बाल अधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रयासों में प्रगति के बावजूद कुछ सदस्य देशों में अब भी बच्चों का सही ढंग से संरक्षण और विकास नहीं हो पा रहा है. 

युवाओं की आवाज़, उनके विचारों और समाधानों को सुने जाने की अपील करते हुए बाशलेट ने कहा, "लगभग हर जगह बच्चों की आवाज़ को अनसुना कर दिया जाता है."

इस सप्ताह, 18 स्वतंत्र विशेषज्ञों का एक पैनल बहरीन, बेल्जियम, गिनी, इटली, जापान और सीरिया से मिली रिपोर्टों की समीक्षा करेगा. 

संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडा - 17 टिकाऊ विकास लक्ष्यों - पर मिशेल बाशलेट ने कहा कि अभी हम अपने वादों पर पूरी तरह से खरा उतरने के रास्ते से दूर हैं. "अभी तक जो रूझान हैं उसके अनुसार 60 से ज़्यादा देश नवजात शिशुओं की मौत से बचाव के लक्ष्य को नहीं पूरा कर पाएंगे."

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ़) की रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने कहा कि 2017 से 2030 के बीच पांच साल से कम उम्र के 6 करोड़ से ज़्यादा बच्चों की मौत ऐसी वजहों से हो सकती हैं जिन्हें टाला जा सकता है. 

मानव तस्करी और दासता के मुद्दे पर बाशलेट ने स्पष्ट तौर पर कहा कि इसके सबसे अधिक शिकार बच्चे ही होते हैं. पीड़ित बच्चों को घर में मज़दूरी करने, यौन दासता और जबरदस्ती विवाह के लिए मजबूर होना पड़ता है. 

संयुक्त राष्ट्र की टीम के द्वारा एकत्र की गई जानकारी के अनुसार प्रवासी बच्चे और देश के भीतर ही विस्थापन को मजबूर बच्चे सबसे ज़्यादा जोखिम में हैं और ऐसे बच्चों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. 

संयुक्त राष्ट्र की ओर से नियुक्त किए गए एक स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ककी रिपोर्ट को उद्धत करते हुए बाशलेट ने बताया कि जबरदस्ती मज़दूरी कराने के लिए होने वाली तस्करी में बच्चों की संख्या बढ़ रही है. साथ ही मादक पदार्थों और अराध की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNODC) की नई रिपोर्ट में भी चिंता जताई गई है कि मानव तस्करी के पीड़ितों में लगभग एक तिहाई बच्चे हैं. 

लड़कों की तुलना में लड़कियां ज़्यादा पीड़ित हैं. डिजिटल तकनीक के आने से  तस्करों का तंत्र मज़बूत हुआ है और यौन शोषण के इरादे से होने वाली तस्करी की घटनाएं बढ़ रही हैं.  छोटी उम्र में ही मां बन जाने वाली लाखों लड़कियां ख़राब स्वास्थ्य से पीड़ित हैं और ग़रीबी के बुरे चक्र में फंसी हैं.

दुनिया में युद्धों और संघर्षों का ख़ामियाज़ा भी बच्चों को भुगतना पड़ रहा है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 20 हज़ार से ज़्यादा बच्चों को हथियारबंद गुटों ने जबरन अपने गुटों में शामिल कर लिया है. 

बाशलेट ने कहा, "ये आंकड़े आपदा के समान हैं.  हर आंकड़े के पीछे एक ऐसे बच्चे की कहानी छिपी है जिसकी उम्मीदें और सपनें टूट रही हैं.  बाल अधिकार संधि के सिद्धांतों को पूरा करने के लिए अब भी काफ़ी कुछ किया जाना बाक़ी है."

 

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