विनाशकारी भूकंप के 9 साल बाद क्या हैती में आपदा प्रबंधन बेहतर हुआ है?

13 जनवरी 2019

​हैती में 9 साल पहले 12 जनवरी 2010 को आए विनाशकारी भूकंप में राजधानी पोर्त-ओ-प्रांस आधे से ज़्यादा ध्वस्त हो गई थी, दो लाख से ज़्यादा मौतें हुई थीं जबकि दस लाख से अधिक लोग विस्थापित होने को मजबूर हो गए थे. लेकिन सवाल यह है कि क्या स्थानीय प्रशासन इस तरह की आपदाओं को सामना करने के लिए अब पहले से बेहतर ढंग से तैयार है? 

भारी तबाही लाने वाली उस आपदा में हैती में काम कर रही संयुक्त राष्ट्र की टीम के 102 कर्मचारी भूकंप में मारे गए. इनमें संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष प्रतिनिधि हैदी अनाबी और उपप्रतिनिधि लुइज़ कार्लोस दा कोस्ता शामिल थे. संयुक्त राष्ट्र कर्मचारी संघ के तत्कालीन अध्यक्ष स्टीफ़न किसमबीरा ने उस भूकंप से हुए जान माल के नुक़सान के बाद कहा था कि यूएन शांति स्थापना मिशन के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं. 

सोफ़ी दे ला कोम्बे इस आपदा में बाल बाल बची थीं. अब वह हैती में न्याय के लिए काम कर रहे संयुक्त राष्ट्र के मिशन (MINUJUSTH) में संचार प्रमुख के तौर पर काम कर रही हैं. उस दौरान सोफ़ी संयुक्त राष्ट्र स्थायित्व मिशन के लिए कार्यरत थीं और कुछ ही दिन में छुट्टी लेकर घर वापस लौटने वाली थीं.    

जिस इमारत में सोफ़ी काम कर रही थीं वह पूरी तरह ध्वस्त हो गई. लेकिन वह किसी तरह बच निकलने में सफल रहीं. कईं घंटों तक ला कोम्बे और उनके अन्य साथी मलबे से फंसे हुए लोगों को निकालने का प्रयास करते रहे. दो दिन तक वहीं डटे रहने के बाद उन्होंने बेमन से हैती छोड़ा क्योंकि वह वहीं रहकर यूएन और स्थानीय लोगों की मदद करना चाहती थीं. तब सोफ़ी सात महीने से गर्भवती थीं. इसके बाद वह 2013 में फिर हैती लौटीं. उनका लक्ष्य देश के पुनर्निर्माण में अपना सहयोग करना और अपने पूर्व साथियों को सम्मान देना है. 

भूकंप के क़रीब नौ साल बाद हैती में आज हालात काफ़ी अलग हैं. सरकार इस तरह की आपदा का सामना करने के लिए पहले से कहीं बेहतर ढंग से तैयार है. ला कोम्बे ने कहा, "कुछ महीने पहले देश के उत्तरी इलाक़े में भूकंप आया था. लेकिन स्थानीय प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद था और यूएन मिशन की सहायता लिए बग़ैर सरकार ने प्रभावितों की मदद करने के लिए अपनी टीम को भेजा. यह कोई बड़ा भूकंप नहीं था लेकिन आम लोग समझ गए हैं कि बचाव कैसे करना हैं. और सबसे अहम बात यह है कि बार बार सुनने को मिल रहा है कि बेहतर ढंग से मज़बूत निर्माण होना ज़रूरी है ताकि लोगों की जान को जोखिम में न डाला जाए. "

 

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