ओज़ोन परत में बेहतरी से उम्मीद मज़बूत हुई

5 नवंबर 2018

संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में दिखाया गया है कि ओज़ोन परत में लगातार सुधार हो रहा है. इन ताज़ा परिणामों की ये कहते हुए भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही है कि विश्व स्तर पर एकजुट प्रयासों के ज़रिए कितनी बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है. साथ ही इन आँकड़ों को जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप विश्व तापमान में बढ़ोत्तरी को रोकने के प्रयासों में एक प्रेरणा के रूप में भी पेश किया जा रहा है. 

इस अध्ययन रिपोर्ट का नाम है - “Scientific Assessment of Ozone Depletion: 2018”.

वातावरण में ओज़ोन परत की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए हर चार वर्ष में एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की जाती है और ये इस श्रंखला में नवीनतम रिपोर्ट है.

पिछली रिपोर्ट वर्ष 2014 में जारी की गई थी. ग़ौरतलब है कि ओज़ोन परत एक ऐसा कवच है जिसके ज़रिए पृथ्वी पर मौजूद जीवन को सूरज से निकलने वाली हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से सुरक्षित रखने में मदद मिलती है.

इस ताज़ा अध्ययन रिपोर्ट में पाया गया है कि ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचे वाले तत्वों और पदार्थों की मौजूदगी लगातार कम हो रही है. इसका मतलब है कि 2014 में जो तथ्य सामने आए थे, उनकी तुलना में ओज़ोन परत की गुणवत्ता में सुधार देखा गया है.

अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2000 के बाद से Stratosphere यानी समताप मंडल में ओज़ोन की गुणवत्ता में 1-3 प्रतिशत सुधार देखा गया है जोकि अनुमानों के अनुरूप है. Northern Hemisphere यानी उत्तरी गोलार्द्ध और Mid Latitude यानी मध्य अक्षांश में ओज़ोन ख़ुद को वर्ष 2030 तक पूरी तरह से ठीक कर लेगी, ऐसी उम्मीद की जी रही है. ओज़ोन की गुणवत्ता दक्षिणी गोलार्द्ध में वर्ष 2050 तक और पोलर क्षेत्रों में 2060 तक ठीक हो जाने की उम्मीद है. 

विशेषज्ञों का कहना है कि ये सफलता अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सहमत हुई नीतियों और गतिविधियों की बदौलत सम्भव हो सकी है. इनमें मॉट्रियाल प्रोटोकोल भी एक बड़ी कामयाबी थी जो क़रीब 30 वर्ष पहले वजूद में आया था.

उस समय किए गए अध्ययनों से पता चला था कि Chlorofluorocarbons (CFCs) और कुछ अन्य तत्व और पदार्थ ओज़ोन परत में छेद बनाने में सक्षम हो रहे थे. ये पदार्थ एयरोसोल्स, रेफ्रिजरेशन सिस्टम और मौहाल को ठंडा रखने के लिए चलने वाली मशीनों में भारी मात्रा में पाया जाता है.

उस समय की रिपोर्टों में कहा गया था कि ओज़ोन परत में छेद होने की वजह से सूरज से निकलने वाली ख़तरनाक़ अल्ट्रावॉयलेट किरणों का रैडियेशन ज़मीन की तरफ़ आने लगा था.

माँट्रियाल प्रोटोकोल को वर्ष 2019 में किगाली संशोधन (Kigali Amendment) को मंज़ूरी देने के साथ ही और मज़बूत किया जाएगा. किगाली संशोधन में रैफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग और अन्य सम्बन्धित मशीनों में इस्तेमाल होने वाली गैसों को बन्द करने का आहवान किया जा रहा है.

ग़ौरतलब है कि रैफ्रिजरेशन मशीनों से निकलने वाली गैसें पर्यावरण को भीषण नुक़सान पहुँचाती हैं.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुखिया एरिक सोलहीम ने कहा है कि “माँट्रियाल प्रोटोकोल किसी ख़ास मक़सद के लिए किया गया एक कामयाब बहुपक्षीय समझौता है जो इतिहास में बहुत ख़ास मुक़ाम रखता है.”

एरिक सोलहीम का कहना था कि प्रमाणित विज्ञान और सहकारिता यानी एकजुटता के साथ की गई कार्रवाई ने माँट्रियाल प्रोटोकोल को 30 वर्षों तक परिभाषित किया है.

“हम जानते हैं कि माँट्रियाल प्रोटोकोल ओज़ोन परत में आई कमज़ोरी को ठीक करने के लिए वजूद में आया था. बिल्कुल इसी उद्देश्य की ख़ातिर अब किगाली संशोधन तैयार किया गया है जिसका मक़सद भविष्य में वातावरण को बेहतर बनाने के लिए क़दम उठाने का वादा किया जा रहा है.” 

ओज़ोन परत पर ये ताज़ा अध्ययन आँकड़े उम्मीद की किरण दिखाते हैं.

क़रीब एक हीना पहले ही जलवायु परिवर्तन पर अन्तर सरकारी पैनल (IPCC) ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की थी जिसमें दिखाया गया था कि अगर पृथ्वी का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है तो कितने ख़तरनाक़ नतीजे हो सकते हैं. उन हालात को महासचिव एंतॉनियो गुटेरेश ने कान फाड़ देने वाली पुकार क़रार दिया था.

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर किगाली संशोधन को लागू कर दिया जाता है तो इस शताब्दी में पृथ्वी के तापमान में 0.4 प्रतिशत वैश्विक वृद्धि को रोका जा सकता है.

इसका मतलब ये होगा कि इससे पृथ्वी के तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस के दायरे में रखने में ठोस मदद मिलेगी.   
 

 

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