क्यों पड़ रहे हैं जीने के लाले!

16 अक्टूबर 2018

मंगलवार 16 अक्तूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाते हुए इन हालात पर गहरी चिन्ता जताई गई कि अब भी लड़ाई-झगड़ों, संघर्षों या फिर राजनातिक अस्थिरता वाले अब भी बहुत से ऐसे देश हैं जहाँ जीवित रहने के लिए खाने-पीने का सामान कम पड़ता जा रहा है.

विश्व खाद्य कार्यक्रम World Food Programme (WFP) का कहना है कि दर्जनों ऐसे देश हैं जहाँ खाने-पीने का सामना इतना महंगा हो रहा है कि लाखों लोगों के लिए पौष्टिक ख़ुराक़ खा पाना असम्भव होने लगा है.

इस रिपोर्ट में 52 विकासशील देशों में एक ख़ुराक़ पर आने वाले ख़र्च की तुलना विकसित देशों से करके तुलनात्मक परिदृश्य पेश करने की कोशिश की गई है.

मिसाल के तौर पर एक व्यक्ति के लिए चावल और दाल की साधारण ख़ुराक़ तैयार करने में अमरीका में क़रीब सवा डॉलर का ख़र्च आता है.

जबकि दक्षिणी सूडान जैसे युद्धरत देश में इतनी रक़म एक व्यक्ति के दो दिन की श्रम आदमनी होती है यानी कोई व्यक्ति दो दिन तक कोई करके क़रीब सवा डॉलर कमा पाता है.

विश्व खाद्य दिवस के मौक़े पर महासचिव एंतॉनियो गुटेरेश का कहना था कि ये जानकर बहुत दुख होता है और इसे कैसे स्वीकार किया जा सकता ह कि हर नौ में से एक व्यक्ति को भरपेट भोजन नसीब नहीं हो पाता है.

उनका कहना था, “दुनिया भर में क़रीब 82 करोड़ लोगों को अब भी भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है. इनमें से ज़्यादा संख्या महिलाओं की है. भेरपेट भोजन नहीं मिलने की वजह से क़रीब साढ़े 15 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. इनमें से बहुत से बच्चे तो ज़िन्दगी भर कुपोषण के प्रभाव झेलते रहते हैं."

"आइए, हम एक ऐसी दुनिया बनाने का संकल्प लें जहाँ किसी को भी भूखा ना रहना पड़े, एक ऐसा विश्व जहाँ सभी को स्वस्थ और पौष्टिक ख़ुराक़ मिल सके.” 

उधर रोम में विश्व खाद्य और कृषि संगठन FAO के महानिदेशक होज़ो ग्रैज़ियैनो डी सिल्वा ने भी कहा कि एक ऐसी दुनिया बनाना मुश्किल नहीं है जहाँ सभी को भरपेट भोजन मिल सके यानू Zero Hunger वाली दुनिया.

उन्होंने ब्राज़ील, पेरू और चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि इन देशों ने बहुत कम समय में खाने-पीने के सामान की क़िल्लत को दूर करने में बड़ी कामयाबी हासिल की है.

 

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