अशान्ति से छिन रहे शिक्षा के अवसर

21 सितम्बर 2018

ये तो हम सभी जानते हैं कि बचपन एक इंसान के वजूद और आकार की बुनियाद होता है. साथ ही बचपन में सही परवरिश और शिक्षा ही उसके भविष्य का रास्ता तय करने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन क्या किया जाए जब लड़ाई-झगड़े और प्राकृतिक आपदाएँ करोड़ों बच्चों से उनका बचपन और भविष्य दोनों ही छीन लें.

इसी वजह से पाँच से 17 वर्ष की उम्र के क़रीब तीस करोड़ 30 लाख बच्चों को स्कूली शिक्षा की सुविधा उपलब्ध नहीं है. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ) की एक नई रिपोर्ट में ये आंकड़े सामने आए हैं. 

इनमें से क़रीब एक तिहाई यानी क़रीब दस करोड़ 40 लाख बच्चे और किशोर ऐसे देशों में रहते हैं जहाँ युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं वाले हालात के कारणों से स्कूली शिक्षा नहीं मिल पाती.

इस रिपोर्ट का नाम है – A Future Stolen: young and out of school.

इस रिपोर्ट में सभी देशों में प्री प्राईमरी से लेकर अपर सेकंडरी तक की शिक्षा का आकलन किया गया है. इनमें आपात स्थितियों से प्रभावित देश भी शामिल हैं.

यूनीसेफ़ की अध्यक्ष हेनेरिएटा फ़ोर का कहना है कि जब कोई देश लड़ाई-झगड़ों या प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होता है तो वहाँ के बच्चों पर दोहरी मार पड़ती है…

तात्कालिक प्रभाव तो ये होता है कि या तो उनके स्कूल तबाह हो जाते हैं, या सेना या सुरक्षा बल उन पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं, यहाँ तक कि बहुत से स्कूलों पर तो जानबूझकर हमले किए जाते हैं.

इन कारणों से लाखों-करोड़ों बच्चे स्कूली शिक्षा के वंचित हो जाते हैं.

अफ़सोस की बात ये है कि एक बार शिक्षा से बाहर होने के बाद बहुत कम ऐसा होता है कि भविष्य में फिर से औपचारिक शिक्षा हासिल कर पाएँ.

हेनेरीटा फ़ोर का कहना था कि दीर्घकालीन असर ये होता है कि इन बच्चों के इस तरह अशिक्षित रह जाने के बाद ख़ुद उन्हें और उनके देशों को ग़रीबी का कुचक्र देखना पड़ता है.

यूनीसेफ़ की इस रिपोर्ट में संघर्ष और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित देशों में गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए और ज़्यादा धन निवेश करने का आहवान किया गया है ताकि ये बच्चे और किशोर एक सुरक्षित वातावरण में शिक्षा हासिल कर सकें.

 

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