महिलाएं

लड़की: समानता का जन्म-सिद्ध अधिकार

संयुक्त राष्ट्र के अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) की भारत में 'तेजस्विनी' परियोजना के तहत आयोजित कन्या नामकरण समारोह, कन्या भ्रूण हत्या को कम करने और भारत में महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने में मदद कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा लिंग आधारित हिंसा के ख़िलाफ़ 16 दिनों की सक्रियता मुहिम के मौक़े पर भारत के महाराष्ट्र प्रदेश में, IFAD द्वारा वित्त पोषित ये परियोजना, एक बच्ची को जन्म देने और उसके इर्द-गिर्द नकारात्मक धारणाओं को उलटने की कोशिश कर रही है... देखें ये वीडियो...

'लिंग आधारित हिंसा को ख़त्म कर दें, हमेशा-हमेशा के लिये'

संयुक्त राष्ट्र ने तमाम देशों की सरकारों ने लिंग आधारित हिंसा को हमेशा के लिये ख़त्म करने के लिये प्रयास दो गुने करने का आहवान किया है. बुधवार को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का उन्मूलन करने के अन्तरराष्ट्रीय दिवस के मौक़े पर ये आहवान किया गया है.

कोविड-19: एक लड़की की नज़र में असमानता

कोविड-19 महामारी के बढ़ते फैलाव के बीच, लड़कियाँ महिला ख़तना (FGM) से मुक्ति पाने का अधिकार पाने और सुरक्षा व कल्याण के लिये समान अवसरों का उपयोग करने के लिये आवाज़ उठा रही हैं.

निजेर में 15 साल की एस्टा पूछती हैं, "अगर कोई इलाज मिल भी गया, तब भी क्या क्या हमारे जैसे देशों को वो हासिल हो पाएगा?" 

यह वीडियो, लड़कियों ने ख़ुद बनाकर, अपने विचार, अपने शब्दों में व्यक्त किये हैं. (देखिये वीडियो)...

कोविड-19: एक लड़की की नज़र में भविष्य

दुनिया भर की लड़कियाँ एक ऐसे भविष्य की कल्पना करती हैं जो समावेशी और निष्पक्ष हो. माली में 15 साल की मकदीदिया कहती हैं, "मैं सभी बच्चों के अभिभावकों से कहना चाहता हूँ कि वो यह समझें कि हम कुछ कहना चाहते हैं, और हमारे विचार मायने रखते हैं, क्योंकि हम दुनिया का भविष्य हैं." 

यह वीडियो, लड़कियों ने ख़ुद बनाकर, अपने विचार, अपने शब्दों में, कैमरे में समेटे हैं... (वीडियो सौजन्य: यूनीसेफ़)
 

सर्वाइकल कैन्सर से छुटकारा पाने की रणनीति, बचाई जा सकेंगी लाखों जानें

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सर्वाइकल कैन्सर से छुटकारा पाने के लिये मंगलवार को एक रणनीति पेश की है जिसके ज़रिये वर्ष 2050 तक इस कैंसर से अनुमानतः 50 लाख महिलाओं व लड़कियों को मौत के मुँह से बचाया जा सकेगा.

कोविड-19 दौरान शिक्षा - एक लड़की की नज़र से

कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करने के प्रयासों के तहत 194 देशों में राष्ट्रव्यापी तालाबन्दी में लगभग एक अरब 60 करोड़ बच्चों का जीवन भी प्रभावित हुआ है. दुनिया भर के लगभग 90 प्रतिशत छात्र अप्रैल के शुरू से ही स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. आशंका है कि बहुत सी लड़कियाँ शायद कभी भी स्कूली कक्षाओं में वापस नहीं जा पाएँगी, क्योंकि परिवार अपने आर्थिक बोझ कम करने के लिये उन्हें बाल विवाह या बाल श्रम के गर्त में धकेल सकते हैं. 

 

इस वीडियो में मेडागास्कर की 16 वर्षीया अंतासा कहती हैं, "लड़कियों को स्कूल नहीं भेजने का विचार, इन इलाक़ों में वास्तव में संस्कृति का हिस्सा बन गया है".
 

(यह वीडियो, लड़कियों ने ख़ुद बनाकर, अपने विचार, अपने शब्दों में व्यक्ति किये हैं). 

महामारी - एक लड़की की नज़र से

कोविड-19 महामारी से दुनिया भर में करोड़ों बच्चों पर असर पड़ा है. स्कूल बन्द होने और वायरस के प्रसार को रोकने के लिये अपनाए गए तालाबन्दी और अन्य उपायों ने लाखों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,महत्वपूर्ण टीकों और पौष्टिक आहार से दूर कर दिया है. ख़ासतौर पर, लड़कियों के लिये स्थिति और भी ज़्यादा ख़राब हो गई है. इस तरह की संकट स्थितियों के दौरान लिंग आधारित हिंसा और हानिकारक प्रथाओं का ख़तरा बढ़ जाता है – विशेषकर ग़रीब और कमज़ोर वर्ग की लड़कियों के लिये. अनुमानों के मुताबिक, स्कूल फिर से खुलने पर भी शायद बहुत सी लड़कियाँ फिर कभी भी वापस विद्यालय ना जा सकें या फिर हालात से मजबूर होकर बाल विवाह का शिकार हो जाएँ. 

कोविड-19 ने धीमी की लैंगिक समानता की दिशा में प्रयासों की रफ़्तार

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवँ सामाजिक मामलों के विभाग (UNDESA) के प्रमुख लियू झेनमिन ने कहा है कि कोविड-19 महामारी से लैंगिक समानता हासिल करने के प्रयासों में व्यवधान आया है. उनके मुताबिक कोरोनावायरस संकट से पिछले दशकों में कठिनाई से हासिल हुई प्रगति पर भी ख़तरा मँडरा रहा है.  

ग्रामीण महिलाओं को भविष्य के संकटों के मद्देनज़र मज़बूत करने की दरकार

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि ग्रामीण महिलाएँ कृषि, खाद्य सुरक्षा और भूमि व प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन में बहुत अहम भूमिका निभाती हैं मगर फिर भी वो भेदभाव का सामना करती हैं, उनके साथ व्यवस्थागत नस्लभेद होता है और वो ढाँचागत ग़रीबी में जीवन जीती हैं. 

बाधाओं से परे: फ़ातिमा ख़ामिस का शान्ति मिशन

सूडानी मूल की फ़ातिमा ख़ामिस  मध्य अफ्रीकी गणराज्य में संयुक्त राष्ट्र के मिशन में असाधारण योगदान कर रही हैं. कड़ी परम्पराओं वाले समाज में शिक्षा के लिये रास्ता बनाना और एक इजीनियर के रूप में काम करना फ़ातिमा ख़ामिस के लिये आसान नहीं रहा है, मगर उन्होंने बहुत सी बाधाएँ पार की हैं. उनकी कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी - शान्ति ही मेरा मिशन है - वीडियो श्रंखला में...